डिजिटल युग में सुनना सबसे महत्वपूर्ण लोकतांत्रिक कौशल क्यों है?
वैभव
- 04 May 2026, 03:52 PM
- Updated: 03:52 PM
( सारा केल्स, आईई यूनिवर्सिटी )
मैड्रिड, चार मई (द कन्वरसेशन) डिजिटल युग में यह समझना कठिन नहीं है कि किसी बातचीत के दौरान लोग कब वास्तव में सुनना बंद कर देते हैं। उनकी नजरें भटकने लगती हैं, प्रतिक्रिया बहुत जल्दी आ जाती है, या पास रखी स्क्रीन की ओर ध्यान खिंच जाता है। बातचीत चलती रहती है, लेकिन संवाद का एक महत्वपूर्ण हिस्सा पहले ही खो चुका होता है।
आज हम पहले से कहीं अधिक विभिन्न मंचों, उपकरणों और डिजिटल स्थानों पर एक-दूसरे से बात करते हैं, लेकिन सवाल यह है कि क्या हम वास्तव में एक-दूसरे को सुन भी रहे हैं?
सार्वजनिक बहसें आज मुख्य रूप से बोलने पर केंद्रित हैं—कौन बोल सकता है, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर क्या सीमाएं होनी चाहिए, और क्या मुक्त अभिव्यक्ति खतरे में है। ये सभी महत्वपूर्ण प्रश्न हैं, लेकिन ये इस बुनियादी धारणा पर आधारित हैं कि "बोलना" अपने आप में "सुने जाने" की गारंटी है—जिस पर बहुत कम विचार किया जाता है।
प्राचीन एथेंस वासियों के संदर्भ का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि उस समय लोकतांत्रिक संवाद दो समान तत्वों पर आधारित माना जाता था—बोलने का अधिकार और सत्य बोलने का साहस। लेकिन ये दोनों ही तब तक सार्थक नहीं होते जब तक कोई ऐसा श्रोता मौजूद न हो जो वास्तव में बात को ग्रहण करने के लिए तैयार हो। अर्थात् बोलना और सुनना प्रतिस्पर्धी नहीं बल्कि लोकतांत्रिक अभ्यास के दो पूरक हिस्से हैं, और एक के बिना दूसरे की रक्षा संभव नहीं है।
आज स्थिति यह है कि बोलने के अधिकार को विस्तार देने पर तो बहुत ध्यान दिया गया है, लेकिन यह समझने पर बहुत कम ध्यान दिया गया है कि जब कोई बोलता है तो सामने वास्तव में क्या हो रहा होता है।
सुनना कोई निष्क्रिय प्रक्रिया नहीं है। यह केवल चुप रहकर सुनने जैसा नहीं है और न ही यह केवल शब्दों को ग्रहण करना है। अच्छी तरह सुनने का अर्थ है किसी व्यक्ति के कथन को एक अर्थपूर्ण बात के रूप में स्वीकार करना, उसे समझना, उसकी व्याख्या करना और फिर उस पर प्रतिक्रिया देना।
दार्शनिक इसे "अपटेक" कहते हैं—यानी प्रतिक्रिया देने से पहले यह इच्छा कि सामने वाले की बात को सही ढंग से ग्रहण किया जाए।
व्यावहारिक रूप में इसका अर्थ है कि किसी तर्क को पूरी तरह समझने के लिए उसे पर्याप्त समय देना, न कि उसके विकृत या सरल संस्करण पर प्रतिक्रिया देना। इसका मतलब यह भी है कि यह समझना कि किसी व्यक्ति ने वास्तव में क्या कहा है और हमने यह मानकर क्या समझ लिया है, दोनों में फर्क है।
यह भी महत्वपूर्ण है कि बोलने वाले व्यक्ति को किसी बाधा के रूप में नहीं, बल्कि एक साझा संवाद के सहभागी के रूप में देखा जाए। लेकिन यह अपेक्षा जितनी सरल लगती है, उतनी है नहीं। आम तौर पर लोग सुनते समय समझने के बजाय जवाब देने की तैयारी कर रहे होते हैं। वे तर्क की कमजोरी, विरोध के अवसर या अपने विचार रखने का मौका खोजते रहते हैं। यह सुनना नहीं है, बल्कि प्रतीक्षा करना है।
लोकतांत्रिक जीवन में यह अंतर बेहद महत्वपूर्ण है। जब नागरिक किसी विरोधी विचार को उसके वास्तविक रूप में समझने के बजाय उसके विकृत रूप पर प्रतिक्रिया देते हैं, तो सार्वजनिक बहस शोर में बदल जाती है।
ऐसी स्थिति में असहमति एक प्रदर्शन बन जाती है, तर्क एक नाटकीय प्रस्तुति में बदल जाता है और वास्तविक संवाद की संभावना धीरे-धीरे खत्म हो जाती है।
जिन डिजिटल मंचों पर आज सार्वजनिक संवाद होता है, उन्हें सुनने के लिए डिजाइन नहीं किया गया है, बल्कि "संवाद" के लिए बनाया गया है।
यह संवाद क्लिक, शेयर, प्रतिक्रिया और स्क्रीन पर बिताए गए समय से मापा जाता है। ऐसे में जो सामग्री तीव्र भावनाएं—जैसे गुस्सा, आक्रोश या नैतिक चिंता—उत्पन्न करती है, वह अधिक फैलती है। जबकि विचारशील और संतुलित सामग्री अक्सर पीछे रह जाती है।
इसके परिणामस्वरूप एक ऐसा सूचना वातावरण बनता है जो तेज, सीधे, भावनात्मक और प्रतिक्रिया-उन्मुख संचार को बढ़ावा देता है—जो सुनने की प्रक्रिया के बिल्कुल विपरीत है।
इसके अलावा, एल्गोरिदम लोगों तक विचारों को उनके पूरे संदर्भ में नहीं पहुंचाते। अधिकतर लोग तर्कों के टुकड़े, स्क्रीनशॉट, संक्षेप या तोड़े-मरोड़े गए अंशों के माध्यम से विचारों से परिचित होते हैं।
ये अंश अक्सर इसलिए चुने जाते हैं ताकि उन्हें आसानी से खारिज किया जा सके या मजाक का विषय बनाया जा सके। इस प्रकार लोग वास्तविक विचारों के बजाय उनके "कार्टून रूप" से संवाद करने लगते हैं, जिसमें सुनने की आवश्यकता ही समाप्त हो जाती है।
ऐसे वातावरण का लोकतांत्रिक जीवन पर गंभीर प्रभाव पड़ता है। एक ऐसा सार्वजनिक क्षेत्र जहां लोग लगातार बोलते हैं लेकिन महसूस करते हैं कि उन्हें सुना नहीं जा रहा, वह स्वस्थ लोकतंत्र नहीं हो सकता। ऐसी स्थिति में असंतोष बढ़ता है, विचार और कठोर होते जाते हैं, और सामूहिक निर्णय के लिए आवश्यक साझा आधार कमजोर पड़ता जाता है।
यह समस्या केवल तकनीक की नहीं है, बल्कि नागरिक समाज की है और इसका समाधान भी नागरिक स्तर पर ही खोजना होगा।
अच्छी बात यह है कि सुनना, एल्गोरिदम की तरह जटिल नहीं, बल्कि एक सीखा जाने वाला कौशल है। शिक्षा के क्षेत्र में इसे अभ्यास के रूप में विकसित किया जा सकता है। उदाहरण के तौर पर, छात्रों को यह निर्देश दिया जा सकता है कि वे किसी सहपाठी के तर्क की आलोचना करने से पहले उसे उसकी संतुष्टि के अनुसार सही ढंग से दोहराएं।
इसी तरह यह अभ्यास भी कराया जा सकता है कि किसी भी लेख, वीडियो या पॉडकास्ट को सुनने के बाद पहले उसका तर्क निष्पक्ष रूप से समझाया जाए और फिर उस पर राय दी जाए। यह अभ्यास केवल कक्षा तक सीमित नहीं है। रोजमर्रा के जीवन में भी इसे अपनाया जा सकता है—किसी प्रतिक्रिया देने से पहले यह जांचना कि क्या आप वास्तव में बात को समझ चुके हैं।
किसी विचार की आलोचना करने से पहले उसे उसके मूल स्वरूप में प्रस्तुत करना, और व्यक्ति के कथन को उसकी अपनी भाषा में समझना—ये छोटे लेकिन महत्वपूर्ण परिवर्तन हैं।
केवल बोलने की स्वतंत्रता लोकतंत्र का आधा हिस्सा है।
प्राचीन यूनान में अगोरा केवल एक मंच नहीं था, बल्कि विचारों के आदान-प्रदान का स्थान था। उसी भावना को आज के डिजिटल, शैक्षिक और सामाजिक वातावरण में पुनः स्थापित करने की आवश्यकता है। और इसकी शुरुआत किसी बड़े बदलाव से नहीं, बल्कि एक शांत और अधिक कठिन कौशल से होती है। यह कौशल 'सुनना' है।
( द कन्वरसेशन ) मनीषा वैभव
वैभव
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