कभी वामपंथ के गढ़ रहे कटवा में चुनावी चर्चाओं में किसानों की समस्याएं व युवाओं की आकांक्षाएं हावी
अविनाश
- 27 Apr 2026, 03:37 PM
- Updated: 03:37 PM
(सुप्रतीक सेनगुप्ता)
कोलकाता, 27 अप्रैल (भाषा) पश्चिम बंगाल के पूर्व वर्धमान जिले के कटवा क्षेत्र पर इस विधानसभा चुनाव में सभी की नजरें हैं, जहां मुख्य मुकाबला तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के बीच माना जा रहा है। इस सीट पर किसानों की समस्याएं और युवाओं की आकांक्षाएं चुनावी चर्चा के केंद्र में हैं।
कटवा एक सामान्य (अनारक्षित) सीट है और यह पूर्व वर्धमान लोकसभा क्षेत्र के सात विधानसभा क्षेत्रों में से एक है। यहां लगभग 65.40 प्रतिशत मतदाता गांवों में और 34.60 प्रतिशत शहरी क्षेत्रों में रहते हैं। सामाजिक रूप से यह क्षेत्र मिश्रित है, जहां अनुसूचित जातियों की हिस्सेदारी करीब 27.41 प्रतिशत और मुस्लिम आबादी लगभग 21.80 प्रतिशत है।
ऐतिहासिक रूप से यह क्षेत्र वामपंथ का गढ़ रहा है। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (भाकपा) ने यहां दो बार और मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) ने छह बार जीत दर्ज की। कांग्रेस का भी यहां मजबूत प्रभाव रहा, खासकर वरिष्ठ नेता रवीन्द्रनाथ चटर्जी के नेतृत्व में, जिन्होंने 1996 में जीत हासिल की और फिर लगातार कई चुनाव जीते।
बाद में चटर्जी 2016 में तृणमूल कांग्रेस में शामिल हो गए और 2016 व 2021 के विधानसभा चुनावों में भी पार्टी के उम्मीदवार के रूप में जीत दर्ज की।
साल 2016 के चुनाव में कड़ा मुकाबला देखने को मिला था, जिसमें चटर्जी ने कांग्रेस उम्मीदवार श्यामा मजूमदार को केवल 911 वोटों से हराया था। 2021 में भाजपा उम्मीदवार के तौर पर मजूमदार 9,155 मतों से चटर्जी से हार गए थे।
इस बार चुनाव में चटर्जी का मुकाबला भाजपा उम्मीदवार कृष्णा घोष और माकपा के संजीब दास से है, हालांकि मुकाबला मुख्यतः दो दलों के बीच माना जा रहा है।
इस विधानसभा क्षेत्र का नाम कटवा शहर के नाम पर पड़ा है, जिसका ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व है। यह अजय और हुगली नदी के संगम के पास स्थित है। मुगल और नवाब काल के दौरान यह सामरिक रूप से महत्वपूर्ण था और मुर्शिदाबाद की राजधानी तक पहुंचने का एक प्रवेश द्वार माना जाता था।
स्थानीय अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार कृषि है, जहां उपजाऊ जलोढ़ मिट्टी में धान, जूट और मौसमी सब्जियां उगाई जाती हैं। छोटे उद्योग और व्यापार भी लोगों की आजीविका में योगदान देते हैं। पहले नदी मार्ग से व्यापार, खासकर नमक का व्यापार, भी यहां महत्वपूर्ण भूमिका निभाता था।
हुगली विमेंस कॉलेज की छात्रा और कटवा निवासी प्रियंका अधिकारी ने कहा कि शहर का बुनियादी ढांचा कमजोर हो रहा है, जबकि युवाओं के लिए रोजगार के अवसर कम होते जा रहे हैं।
उन्होंने कहा, "मैं आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) में करियर बनाना चाहती हूं, लेकिन मुझे अपने जिले या कोलकाता में भी इंटर्नशिप के सही अवसर नहीं मिल रहे हैं। हम ऐसी सरकार चाहते हैं जो पश्चिम बंगाल को विकास के रास्ते पर ले जाए।"
कटवा के किसान भी कृषि संकट से जूझ रहे हैं। खासकर आलू और धान जैसी प्रमुख फसलों के कम बाजार भाव के कारण उनकी आय लगातार घट रही है और आर्थिक अनिश्चितता बढ़ रही है।
इस क्षेत्र की मुख्य फसल आलू इस समय स्थानीय मंडियों में लगभग 650-700 रुपये प्रति क्विंटल बिक रहा है। किसानों का कहना है कि यह कीमत बढ़ती लागत को पूरा करने के लिए काफी नहीं है।
आलू उत्पादक दूधकुमार जना ने कहा, "हमें व्यापारियों द्वारा तय की गई कीमत पर ही फसल बेचने के लिए मजबूर होना पड़ता है।"
धान उगाने वाले किसानों को भी इसी तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। सामान्य धान का न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) 2,203 रुपये प्रति क्विंटल है, लेकिन कई किसानों का आरोप है कि खरीद में देरी और नकदी की जरूरत के कारण उन्हें स्थानीय बिचौलियों को एमएसपी से कम कीमत पर फसल बेचनी पड़ती है।
एक अन्य किसान ने कहा, "यहां राजनीतिक गतिविधियां तो बहुत हैं, लेकिन हमारी समस्याओं पर कम चर्चा होती है।"
मुर्शली गांव के किसान पुषन मंडल ने बताया कि थोक और खुदरा कीमतों के बीच का अंतर भी चिंता बढ़ा रहा है।
उन्होंने कहा कि 12 बोरी धान की फसल में से 6 बोरी उन्हें कर्ज चुकाने के लिए साहूकार को देनी पड़ी, जिससे उनकी आर्थिक स्थिति और कमजोर हो गई।
भाषा जोहेब अविनाश
अविनाश
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