एआई सामग्री पर लगातार दिखाना होगा चिन्ह, स्वतंत्र समाचार सामग्री को दायरे में लाने का प्रस्ताव
रमण
- 21 Apr 2026, 08:46 PM
- Updated: 08:46 PM
नयी दिल्ली, 21 अप्रैल (भाषा) सरकार ने कृत्रिम मेधा (एआई) से बनाई गई सामग्री के लिए सख्त खुलासा मानदंड प्रस्तावित करते हुए मंगलवार को ऐसी सामग्रियों पर अनिवार्य, लगातार और स्पष्ट रूप से दिखने वाला पहचान चिन्ह लगाने का सुझाव दिया।
इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय की तरफ से जारी मसौदा संशोधनों के तहत, अब 'प्रमुख रूप से दिखाई देने' की जगह पूरे वीडियो या विजुअल कंटेंट की अवधि के दौरान निर्धारित पहचान चिन्ह को लगातार और स्पष्ट रूप से प्रदर्शित करना होगा।
इन संशोधनों में स्वतंत्र रूप से समाचार सामग्री तैयार करने वालों को भी नियामकीय दायरे में लाने और उनके लिए सरकारी परामर्शों का पालन अनिवार्य करने का भी प्रावधान किया गया है।
मंत्रालय ने सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) नियमों में संशोधन के मसौदे में इन बदलावों को प्रस्तावित किया है।
मंत्रालय ने हितधारकों से सुझाव और टिप्पणियां आमंत्रित करने की समय-सीमा को भी बढ़ाकर सात मई कर दिया है, जो पहले 29 अप्रैल निर्धारित थी।
मंत्रालय ने मसौदा दस्तावेज जारी करते हुए कहा, "नियम 3(3)(ए)(आईआई) में संशोधन कर 'विजुअल प्रदर्शन में प्रमुख रूप से दिखाई देने' वाले शब्दों की जगह यह सुनिश्चित करने का प्रावधान किया गया है कि ऐसे पहचान चिन्ह उस सामग्री की पूरी अवधि के दौरान लगातार और स्पष्ट रूप से प्रदर्शित हों।"
प्रस्तावित बदलावों का उद्देश्य एआई-जनित या कृत्रिम रूप से तैयार सामग्री की पहचान को अधिक पारदर्शी बनाना और उपयोगकर्ताओं को भ्रामक कंटेंट से बचाना है।
मंत्रालय ने कहा कि इन अतिरिक्त संशोधनों को सार्वजनिक परामर्श के लिए जारी किया गया है ताकि सभी पक्ष पहले से जारी मसौदे के साथ इन नए प्रस्तावों पर भी अपने सुझाव दे सकें।
मंत्रालय ने लोगों से बेहिचक सुझाव मिलने के लिए यह स्पष्ट किया कि सभी सुझावों को गोपनीय रखा जाएगा और किसी भी स्तर पर उन्हें सार्वजनिक नहीं किया जाएगा।
सरकार ने इस साल की शुरुआत में यूट्यूब और एक्स जैसे सोशल मीडिया मंचों के लिए नियमों को कड़ा किया था। इसके तहत गैरकानूनी सामग्री को तीन घंटे के भीतर हटाना और एआई से बनी सामग्री पर स्पष्ट पहचान चिह्न लगाना अनिवार्य किया गया था।
सरकार ने उस समय कहा था कि एआई के दुरुपयोग से भ्रामक, अश्लील और फर्जी सामग्री के प्रसार को रोकने के लिए यह कदम जरूरी है।
वहीं, नए प्रस्तावों में एआई निर्मित सामग्री की समूची अवधि तक स्पष्ट पहचान चिह्न प्रदर्शित करने का प्रावधान किया गया है।
डिजिटल अधिकारों के लिए काम करने वाले संगठन 'इंटरनेट फ्रीडम फाउंडेशन' (आईएफएफ) ने आईटी नियमों में प्रस्तावित संशोधनों पर चिंता जताते हुए कहा कि पहले से चल रही सार्वजनिक परामर्श प्रक्रिया के बीच नए प्रस्ताव जोड़ना 'परामर्श थकान' पैदा कर सकता है और यह नीति निर्माण में असंगठित दृष्टिकोण को दर्शाता है।
आईएफएफ ने कहा कि पूरी सामग्री के दौरान लगातार और बिना रुकावट के खुलासा को अनिवार्य करने वाला नियम केवल डिजिटल समाचार मंचों तक सीमित नहीं होगा, बल्कि सोशल मीडिया और एआई टूल्स का उपयोग करने वाले सभी उपयोगकर्ताओं पर लागू होगा।
इसके अलावा, इन्फ्लुएंसर और कंटेंट क्रिएटर जैसे गैर-पंजीकृत उपयोगकर्ताओं की तरफ से पोस्ट 'समाचार और समसामयिक विषयों' वाली सामग्री को भी उसी कानूनी ढांचे में लाने का प्रस्ताव रखा गया है, जो फिलहाल पंजीकृत समाचार प्रकाशकों पर लागू होता है।
इस मसले पर बढ़ते विरोध के बीच मंत्रालय ने सात अप्रैल को सोशल मीडिया कंपनियों और नागरिक समाज समूहों के साथ बैठक की थी। आईटी सचिव एस. कृष्णन ने तब कहा था कि सरकार सुझावों के लिए 'खुली' है और सभी कदम संविधान एवं मौजूदा नियमों के दायरे में उठाए जा रहे हैं।
मध्यस्थ मंचों को मंत्रालय द्वारा जारी परामर्श, दिशा-निर्देश और मानक संचालन प्रक्रिया का पालन अनिवार्य करने के बिंदु पर भी नागरिक समाज ने आपत्ति जताई है। उनका कहना है कि इससे ऐसे निर्देशों को कानूनी दायरे में लाया जा रहा है, जो मूल कानून का हिस्सा नहीं हैं।
भाषा प्रेम प्रेम रमण
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