केंद्र ने राज्यों को पत्र लिखकर विकास गतिविधियों के बाधित होने का मामला उठाया
धीरज माधव
- 15 Mar 2024, 06:30 PM
- Updated: 06:30 PM
नयी दिल्ली, 15 मार्च (भाषा) केंद्र ने राज्यों को पत्र लिखकर ऐसे मामलों को उजागर किया है जिसमें वन अधिकार धारकों के लिए विकासात्मक गतिविधियों, जैसे स्कूलों, अस्पतालों और जल आपूर्ति बुनियादी ढांचे के निर्माण की अनुमति नहीं दी जा रही है और इससे उनकी समग्र सामाजिक-आर्थिक प्रगति बाधित हो रही है।
पर्यावरण और जनजातीय मामलों के मंत्रालय ने संयुक्त रूप से बृहस्पतिवार को सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के मुख्य सचिवों को पत्र लिखकर वन अधिकार अधिनियम (एफआरए), 2006 के उचित कार्यान्वयन के लिए दिशानिर्देशों और स्पष्टीकरणों का एक व्यापक मसौदा भेजा।
एफआरए जंगल में रहने वाली अनुसूचित जनजातियों और अन्य पारंपरिक वन निवासियों के वन अधिकार और वन भूमि पर कब्जे को स्वीकार करता है और उन्हें अधिकार देता है जो पीढ़ियों से जंगलों में निवास करते हैं, लेकिन जिनके अधिकारों का दस्तावेजीकरण नहीं किया गया है।
केंद्रीय मंत्रालयों ने कहा कि केंद्र ने लगातार राज्य विभागों से वन अधिकार धारकों को सभी आवश्यक सहायता, दावा-पश्चात सहायता और मार्गदर्शन प्रदान करने और उनकी आजीविका बढ़ाने के लिए विशिष्ट परियोजनाएं और कार्यक्रम शुरू करने का आग्रह किया है।
राज्यों के मुख्य सचिवों को लिखे पत्र में केंद्र ने कहा, ‘‘ राज्यों से वन अधिकार धारकों के समग्र सामाजिक-आर्थिक विकास को सुनिश्चित करने के लिए सभी संबंधित विभागों के साथ समन्वय करने का भी अनुरोध किया गया है।’’
पत्र में कहा गया, ‘‘ हालांकि, यह भारत सरकार के संज्ञान में आया है कि अभी भी राज्यों में वन अधिकार धारकों को आवास, कृषि और आजीविका योजनाओं के तहत लाभ सहित दावा-पश्चात सहायता और सहायता प्रदान करने में समस्या आ रही है।’’
मंत्रालयों ने बताया कि एफआरए, 2006 की धारा 3(2) 13 विकासात्मक गतिविधियों या सरकार द्वारा दी जानी वाली सुविधाओं के लिए वन भूमि के उपयोग में बदलाव की अनुमति है। इनमें स्कूल, औषधालय, अस्पताल, आंगनवाड़ी, उचित मूल्य की दुकानें, बिजली और दूरसंचार लाइनें, पानी की टंकी, पेयजल आपूर्ति, सिंचाई नहरें, गैर-पारंपरिक ऊर्जा स्रोत, कौशल वृद्धि या व्यावसायिक प्रशिक्षण केंद्र, सड़कें और सामुदायिक केंद्र शामिल हैं।
पीएम-जेएएनएमएएन योजना इन सुविधाओं से वंचित बस्तियों के लिए सड़कों, छात्रावासों, बहुउद्देश्यीय केंद्रों, आंगनवाड़ी केंद्रों और दूरसंचार संपर्क के निर्माण का प्रावधान करती है।
मंत्रालयों ने कहा, ‘‘हालांकि, सरकार के संज्ञान में लाया गया है कि कुछ मामलों और राज्यों में, इन सुविधाओं के निर्माण की अनुमति नहीं दी जा रही है।’’
पत्र में कहा गया, ‘‘ 2009 में जनजातीय मामलों के मंत्रालय द्वारा जारी दिशानिर्देशों के अनुसार, प्रभागीय वन अधिकारी (डीएफओ) उपयोगकर्ता एजेंसियों की ओर से पेश प्रस्तावों पर विचार करने और अनुमोदन करने के लिए अधिकृत हैं। यदि कोई प्रस्ताव डीएफओ द्वारा अनुमोदित नहीं किया जाता है, तो जिला स्तरीय समिति को बिना देरी किए अंतिम निर्णय लेना चाहिए।’’
पत्र में कहा गया, ‘‘ तदानुसार, राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की सरकारों से अनुरोध है कि वे एफआरए, 2006 की धारा 3 (2) के तहत सरकार द्वारा प्रबंधित 13 सुविधाओं के लिए वन भूमि के उपयोग में बदलाव की मंजूरी लेने के लिए इन प्रावधानों के संबंध में जनजातीय मामलों के मंत्रालय द्वारा जारी दिशानिर्देशों का पालन करें। समय-समय पर संशोधित अनुसूचित जनजाति और अन्य पारंपरिक वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) नियम, 2007 के नियम 16 में भी इसका उल्लेख किया गया है।’’
भाषा धीरज