रेल नीर घोटाला: जांच एजेंसियों के खुलासे से संबंधित आरटीआई डेटा देने से इनकार पर आईआरसीटीसी को फटकार
रंजन
- 05 Apr 2026, 06:12 PM
- Updated: 06:12 PM
(मोहित सैनी)
नयी दिल्ली, पांच अप्रैल (भाषा) केंद्रीय सूचना आयोग ने भारतीय रेलवे की खानपान इकाई भारतीय रेलवे खानपान और पर्यटन निगम (आईआरसीटीसी) को, एक आरटीआई अर्जी पर सूचना देने से इनकार करने के लिए फटकार लगाई है।
उक्त अर्जी में यह सवाल किया गया था कि क्या रेलवे निविदाओं के लिए बोली लगाने वाली कंपनियों ने रेल नीर 'घोटाले' और केंद्रीय एजेंसियों द्वारा जांच किए जा रहे संबंधित मामलों से अपने कथित संबंधों का खुलासा किया था।
आरटीआई आवेदक ने आईआरसीटीसी से सवाल किया था कि क्या बोली लगाने वालों ने अपने टेंडर दस्तावेजों में अपने खिलाफ जारी केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) या प्रवर्तन निदेशालय मामलों, यदि हैं तो, का स्पष्ट उल्लेख किया है।
रेल नीर ''घोटाला'' 2015 का एक भ्रष्टाचार का मामला था, जिसकी जांच सीबीआई ने की। इसमें निजी खानपान कंपनियों ने प्रीमियम ट्रेनों (जैसे राजधानी और शताब्दी) में निर्धारित "रेल नीर" पानी की जगह सस्ता बोतलबंद पानी की आपूर्ति की जिससे रेलवे को करीब 19.5 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ।
आरटीआई में विशेष रूप से सवाल किया गया था कि क्या बोली लगाने वालों यह घोषित किया था कि वे "कुख्यात रेल नीर घोटाले में आरोपी" हैं और सीबीआई ने "उनके खिलाफ प्राथमिकी (आरसी-डीएआई-2015-ए-0032) दर्ज की है।''
इसमें यह भी सवाल किया गया था कि क्या उन्होंने यह खुलासा किया था कि ईडी ने आईपीसी की धारा 120बी और धारा 420 तथा भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 13(2) और 13(1)(डी) के तहत मामला दर्ज किया था।
आवेदक यह भी सवाल किया कि क्या बोली लगाने वालों ने इन मामलों में हुई महत्वपूर्ण घटनाओं के बारे में अधिकारियों को सूचित किया था, जैसे कि छापेमारी, नकदी जब्ती और यह बताया था कि क्या एजेंसियों द्वारा अदालत में कोई ''आरोपपत्र'' या ''शिकायत'' दाखिल की गई थी।
कुल मिलाकर, आरटीआई का उद्देश्य यह जांचना था कि क्या सरकारी निविदाओं में भाग लेते समय कंपनियां अपने खिलाफ जारी जांचों के बारे में पारदर्शी थीं।
हालांकि, आईआरसीटीसी ने आंकड़े देने से इनकार करते हुए कहा, "मांगी गई जानकारी को सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की धारा 8 (डी) के तहत खुलासा करने से छूट है।"
सुनवाई के दौरान, अपीलकर्ता ने दलील दी कि जानकारी "व्यापक जनहित" में मांगी गई थी और उसे "गलत तरीके से देने से इनकार कर दिया गया।" अपीलकर्ता ने दावा किया कि वह आरटीआई कानून के तहत ऐसी जानकारी प्राप्त करने का हकदार है।
प्रतिवादी अधिकारियों ने अपने रुख का बचाव करते हुए कहा कि उन्होंने ''अपीलकर्ता को छूट के बारे में स्पष्ट रूप से सूचित किया था'' और प्रथम अपीलीय प्राधिकारी ने उनके जवाब को सही ठहराया था।
केंद्रीय सूचना आयोग (सीआईसी) ने मामले की पड़ताल करते हुए, जवाब को अपर्याप्त पाया और कहा कि इसमें "केवल छूट खंड का उल्लेख है, कोई कारण या औचित्य नहीं दिया गया है।''
सीआईसी ने कहा, ''यदि कोई सिर्फ किसी छूट की धारा का नाम बताता है, बिना यह बताए कि वह जानकारी पर कैसे लागू होती है, तो इसे आरटीआई अधिनियम के तहत वैध या स्पष्ट जवाब नहीं माना जाएगा।''
आयोग ने कानूनी आवश्यकता पर जोर देते हुए कहा कि सूचना से इनकार के पीछे "ठोस कारण" होने चाहिए और यह भी कहा कि ''छूट की प्रासंगिकता साबित करने की जिम्मेदारी पूरी तरह से सार्वजनिक प्राधिकार पर है।''
जवाब को अपर्याप्त मानते हुए, सीआईसी ने कहा कि यह "सूचना के अधिकार अधिनियम के प्रावधानों के अनुरूप नहीं है" और आईआरसीटीसी को सूचना के अधिकार आवेदन पर पुनर्विचार करने और "नया, तर्कसंगत जवाब" देने का निर्देश दिया।
भाषा अमित रंजन
रंजन
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