लोस अध्यक्ष चुनाव: विपक्षी दलों की बैठक में रणनीति पर चर्चा हुई, तृणमूल भी हुई शामिल
हक प्रशांत
- 25 Jun 2024, 10:59 PM
- Updated: 10:59 PM
नयी दिल्ली, 25 जून (भाषा) विपक्षी गठबंधन ‘इंडियन नेशनल डेवलपमेंटल इंक्लूसिव अलायंस’ (इंडिया) के घटक दलों के नेताओं ने मंगलवार को बैठक कर लोकसभा अध्यक्ष के चुनाव से जुड़ी रणनीति पर चर्चा की। इस बैठक में तृणमूल कांग्रेस भी शामिल हुई जिसने पहले कहा था कि उसे भरोसे में लिए बिना कोडिकुनिल सुरेश का नाम विपक्ष के उम्मीदवार के तौर पर घोषित कर दिया गया।
कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के आवास ‘10 राजाजी मार्ग’ पर हुई बैठक में राहुल गांधी, समाजवादी पार्टी के नेता रामगोपाल यादव, तृणमूल कांग्रेस के नेता डेरेक ओब्रायन, शिवसेना (यूबीटी) के नेता अरविंद सावंत, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरदचंद्र पवार) की नेता सुप्रिया सुले, द्रमुक नेता टीआर बालू तथा कई अन्य दलों के नेता शामिल थे।
कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों का कहना था कि परंपरा के अनुसार लोकसभा उपाध्यक्ष का पद विपक्ष को मिलना चाहिए और यदि सरकार पर इस सहमति देती है तो वह अध्यक्ष पद के लिए सरकार का समर्थन करेंगे।
कांग्रेस ने कहा कि गेंद अब सरकार के पाले में है कि वह इस मुद्दे पर आम सहमति बनाये क्योंकि परंपरा के मुताबिक उपाध्यक्ष का पद विपक्ष को मिलना चाहिए।
दूसरी तरफ, आज दिन में तृणमूल सांसद अभिषेक बनर्जी ने यह बयान देकर कांग्रेस के लिए असहज स्थिति पैदा कर दी थी कि कि इस पद के लिए ‘इंडिया’ के संयुक्त उम्मीदवार के रूप में कांग्रेस के कोडिकुनिल सुरेश को उम्मीदवार बनाने पर उनकी पार्टी से सलाह नहीं ली गई।
उन्होंने यह भी कहा था कि सुरेश को समर्थन देने को लेकर पार्टी प्रमुख ममता बनर्जी निर्णय लेंगी।
अभिषेक बनर्जी ने कहा था, ‘‘किसी ने हमसे संपर्क नहीं किया। कोई बातचीत नहीं हुई, दुर्भाग्य से यह एकतरफा फैसला है।’’
अध्यक्ष पद के लिए चुनाव बुधवार सुबह होगा और राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) के पास चुनाव जीतने के लिए पर्याप्त संख्या है।
कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने कहा कि विपक्ष का प्रस्ताव था कि सरकार पिछली परंपराओं के मुताबिक उसे उपाध्यक्ष का पद दे और बदले में वह बिरला की उम्मीदवारी को समर्थन देगी।
सरकार का कहना है कि बिरला की उम्मीदवारी का समर्थन सशर्त नहीं हो सकता क्योंकि अध्यक्ष सभी दलों का होता है और उनके नाम पर सर्वसम्मति होनी चाहिए।
रमेश ने कहा कि संसदीय लोकतंत्र इस भरोसे पर चलता है कि सत्तारूढ़ दल क्या कहता है, और इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि वह जो करता है उसमें कितना विश्वास झलकता है।
उन्होंने ‘एक्स’ पर पोस्ट किया, ‘‘नॉन-बायोलॉजिकल प्रधानमंत्री को 17वीं लोकसभा (2019-2024) बिना उपाध्यक्ष के चलाने को मिली। ऐसा होना अभूतपूर्व था। 16वीं लोकसभा (2014-2019) में उन्होंने यह पद अपने एक गुप्त सहयोगी को दे दिया था।’’
रमेश का कहना है कि मनमोहन सिंह, अटल बिहारी वाजपेयी और पीवी नरसिम्हा राव के शासनकाल के दौरान लोकसभा का उपाध्यक्ष एक विपक्षी सांसद हुआ करते थे।
उन्होंने कहा, ‘‘इंडिया जनबंधन का प्रस्ताव बहुत ही सीधा और सरल था। यह लोकसभा अध्यक्ष के लिए भाजपा उम्मीदवार का समर्थन करेगा लेकिन उपाध्यक्ष ‘इंडिया जनबंधन’ का होना चाहिए। संसदीय परंपराओं को ध्यान में रखते हुए यह पूरी तरह से वैध प्रस्ताव था। इसके जवाब में सत्तारूढ़ दल ने कहा कि अभी हमें अध्यक्ष के लिए समर्थन दीजिए और हम बाद में उपाध्यक्ष पर चर्चा करेंगे।’’
रमेश ने कहा, ‘‘यह ‘नॉन-बायोलॉजिकल’ प्रधानमंत्री के ट्रैक रिकॉर्ड को देखते हुए अस्वीकार्य था। तथास्तु!’’
कांग्रेस नेता के.सी. वेणुगोपाल और दीपेंद्र हुड्डा ने कहा कि गेंद अब भी सरकार के पाले में है जो विपक्ष को उपाध्यक्ष का पद दे सकती है।
हुड्डा ने कहा कि अगर सरकार उपाध्यक्ष का पद विपक्ष को देने का फैसला करती है तो विपक्ष अब भी बिरला के पक्ष में चुनाव से पीछे हट सकता है।
भाषा हक