पश्चिम बंगाल: खून खराबे का दौर देख चुके नेताई के लोग शांति की तलाश में
आशीष रंजन
- 19 May 2024, 07:05 PM
- Updated: 07:05 PM
(सौगत मुखोपाध्याय)
नेताई (पश्चिम बंगाल), 19 मई (भाषा) पश्चिम बंगाल के जंगल महल क्षेत्र में स्थित नेताई गांव के निवासी 13 साल पहले के नरसंहार से अब भी उबर नहीं पाए हैं। हिंसा में नौ लोगों की मौत हुई थी और कई लोग घायल हुए थे।
खून-खराबे का दौर देख चुके नेताई के लोग स्थायी शांति की तलाश में हैं। आगामी संसदीय चुनाव को लेकर गहमागहमी के बावजूद स्थानीय लोग राजनीति के प्रति उदासीन नजर आते हैं।
तपन मंडल (70) की पत्नी आरती मंडल नेताई की हिंसा की पीड़ितों में से थीं। मंडल ने कहा, ‘‘हमारे गांव में शांति बनी रहे। हमें इसकी परवाह नहीं है कि कौन शासक बनता है।’’
मंडल की पत्नी की 2011 में गोली लगने से मौत हो गई थी। मंडल ने स्वीकार किया कि उन्हें राज्य सरकार से आर्थिक मुआवजा और उनके दो बेटों के लिए कनिष्ठ पुलिस कांस्टेबल की नौकरियां मिली थीं। उन्होंने कहा कि अब पुरानी चीजों को भुलाने का समय है।
बिनपुर ब्लॉक में पूर्व माओवादियों के गढ़ लालगढ़ की सीमा से लगा और झारग्राम लोकसभा सीट के अंतर्गत आने वाला गांव नेताई उस समय चर्चा में आया जब सात जनवरी, 2011 को तत्कालीन सत्तारूढ़ मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा कथित रूप से आश्रय प्राप्त सशस्त्र लोगों ने ग्रामीणों पर गोलीबारी की। हिंसा में चार महिलाओं समेत नौ लोगों की मौत हो गई तथा 28 अन्य घायल हो गए।
नेताई मामले की जांच केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) ने की। मामला अदालतों में पहुंचा और अब अधिकतर आरोपी जमानत पर रिहा हैं। यह गांव ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) और शुभेंदु अधिकारी के नेतृत्व वाली भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की प्रदेश इकाई की जंग का मैदान रहा है।
इस साल जनवरी के अंत में अधिकारी ने नेताई में एक रैली आयोजित करने और मृतक के प्रति श्रद्धांजलि की अनुमति के लिए कलकत्ता उच्च न्यायालय का रुख किया, क्योंकि प्रशासन ने उन्हें उस गांव में जाने से इनकार कर दिया था। वहीं, तृणमूल कांग्रेस समर्थित नेताई शहीद स्मृतिरक्षा समिति ने मारे गए लोगों की याद में बनाई गई समाधि पर माल्यार्पण किया।
गांव के टीएमसी कार्यकर्ता सरजीत रॉय ने कहा, ‘‘शांति ही वह चीज है जिसकी हमें जरूरत है। हम उन दिनों में वापस नहीं जाना चाहते जिनकी याद हमें आज भी सताती है। हम और अधिक खून-खराबा नहीं देखना चाहते और नहीं चाहते कि राजनीति हमारे जीवन पर हावी हो।’’
रॉय के कथन को दोहराते हुए एक किसान आशीष घोराई ने कहा, ‘‘यहां किसी भी बदलाव की कोई आवश्यकता नहीं है। बदलाव लाने के किसी भी प्रयास के परिणामस्वरूप शांति भंग होगी।’’
वर्ष 2019 में टीएमसी को हराने के बाद झाड़ग्राम सीट वर्तमान में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के पास है। इस सीट पर 25 मई को मतदान होगा।
टीएमसी ने 2021 में राज्य विधानसभा के चुनाव और 2023 में पंचायत चुनावों में इस क्षेत्र से जीत हासिल की थी।
ग्रामीणों ने क्षेत्र में युवाओं के लिए नौकरी के अवसरों की आवश्यकता पर जोर दिया और राजनीतिक दलों पर इस ओर से आंखें मूंदने का भी आरोप लगाया।
स्थानीय लोगों ने बताया कि 2022 से क्षेत्र में मनरेगा का काम बंद होने और चुनाव खत्म होने के बाद राजनीतिक नेताओं द्वारा कोई प्रदर्शन न करने की प्रवृत्ति ने उन्हें अधर में छोड़ दिया है।
निकटवर्ती गांव सहरसाही में भाजपा के लिए स्पष्ट समर्थन दिखा, जहां 2011 के पीड़ितों के परिवार भी रहते हैं।
भागबत सिंग ने आरोप लगाया, “मुआवजा के लिए पीड़ितों को चुनने में भाई-भतीजावाद हुआ। 28 घायलों में से केवल 10 को सरकारी खजाने से पैसा या नौकरी मिली। शेष 18 को नजरअंदाज कर दिया गया। भागवत के पिता शक्तिपद सिंग गोलीबारी में घायल हुए थे।
सिंग ने कहा कि यह ग्रामीणों के संयुक्त प्रयासों का नतीजा था कि अधिकारी इस साल सात जनवरी को नेताई पहुंचे।
इस बीच, नेताई में शहीद स्तंभ वीरान नजर आया, जो उस अव्यक्त राजनीतिक तनाव को उजागर करता है जो अभी भी मौजूद है।
भाषा आशीष