उत्तराखंड के राज्यपाल ने पत्रकारों से देश को विकसित भारत बनाने में भूमिका निभाने का आग्रह किया
राजकुमार
- 05 Feb 2026, 12:19 AM
- Updated: 12:19 AM
हरिद्वार, चार फरवरी (भाषा) उत्तराखंड के राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत) गुरमीत सिंह ने बुधवार को पत्रकारों से जनहित एवं लोकतांत्रिक मूल्यों और राष्ट्र पुनर्निर्माण के अपने दायित्वों को संकल्प के रूप में स्वीकार करने तथा भारत को 2047 तक विकसित, आत्मनिर्भर और विश्वगुरू बनाने में अपनी भूमिका निभाने का आग्रह किया ।
राज्यपाल हिंदी पत्रकारिता के 200 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में हरिद्वार प्रेस क्लब के तत्वावधान में आयोजित श्रृंखलाबद्ध कार्यक्रमों के तीसरे चरण में "आज़ादी के बाद राष्ट्र के पुनर्निर्माण में हिंदी पत्रकारिता की भूमिका" विषयक कार्यक्रम को संबोधित कर रहे थे।
राज्यपाल ने कहा कि पत्रकारों की यह जिम्मेदारी है कि वे अपनी लेखनी के माध्यम से करोड़ों लोगों तक राष्ट्रनिर्माण का सकारात्मक संदेश पहुंचाएं।
उन्होंने कहा कि पत्रकारिता सत्य, विवेक और मूल्यों के साथ सत्ता से प्रश्न पूछती है एवं जनहित को केंद्र में रखती है, यही लोकतंत्र की वास्तविक चेतना है।
राज्यपाल ने कहा कि हिंदी भारत की आत्मा है और हिंदी पत्रकारिता का देश की आजादी एवं उसके बाद राष्ट्र निर्माण में बड़ा योगदान रहा है।
'उदन्त मार्तण्ड' के प्रकाशन से आरंभ हुई हिंदी पत्रकारिता की यात्रा को राष्ट्र चेतना के जागरण का माध्यम बताते हुए उन्होंने कहा कि हिंदी पत्रकारिता का 200 वर्ष तक निरंतर सक्रिय रहना उसकी गहराई, प्रतिबद्धता और समर्पण का प्रतीक है।
समारोह में बतौर मुख्य वक्ता अपना विचार व्यक्त करते हुए वरिष्ठ पत्रकार और समाचार एजेंसी 'पीटीआई -भाषा' के संपादक निर्मल पाठक ने कहा कि स्वतंत्रता के बाद की पत्रकारिता ने सरकार और समाज में सामंजस्य बनाये रखते हुए नए राष्ट्र के निर्माण में योगदान देने तथा समाज को दिशा देने का कार्य किया ।
उन्होंने समय और परिस्थितियों के अनुसार बदलते दौर में पत्रकारिता के मूल मूल्यों को बनाए रखने की आवश्यकता जताई तथा कहा कि मूल्यों और सिद्धांतों पर चलते हुए हिंदी पत्रकारिता 200वें वर्ष में प्रवेश कर रही है एवं राष्ट्र निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है।
उन्होंने कहा कि अंग्रेजों की हुकूमत में हिंदी पत्रकारिता ने बहुत संघर्ष किया, मगर देश को आजादी दिलाने के लिए अपने उद्देश्यों से नहीं डिगी।
उन्होंने कहा कि हिंदी अखबार सामाजिक चेतना का माध्यम बने और सामाजिक समरसत्ता बनाए रखने में अखबारों की अच्छी भूमिका रही है।
पाठक ने कहा कि वर्ष 1920 के आसपास आजादी के आंदोलन में अखबारों ने तेवर दिखाने शुरू किए और हिंदी पत्रकारों ने महात्मा गांधी के आंदोलन को धार दी। उन्होंने कहा कि आजादी से पूर्व हिंदी समाचार पत्रों ने सामाजिक बिखराव और चुनौतियों का सामना भी किया।
पाठक ने कहा कि देश की आधी से अधिक आबादी हिंदी का इस्तेमाल करती है, इसलिए हिंदी पत्रकारिता और हिंदी अखबारों की लोकप्रियता आज भी बनी हुई है ।
भाषा सं दीप्ति
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