माकपा ने यूजीसी से भेदभाव-विरोधी नए नियमों में मौजूद 'गंभीर खामियों' को दूर करने का आह्वान किया
अविनाश
- 28 Jan 2026, 09:15 PM
- Updated: 09:15 PM
नयी दिल्ली, 28 जनवरी (भाषा) मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) ने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) से बुधवार को आग्रह किया कि वह परिसरों में जाति आधारित भेदभाव रोधी नए विनियम को भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी), भारतीय प्रबंधन संस्थान (आईआईएम) और अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) तक विस्तारित करे।
माकपा ने कहा कि समता समितियों के गठन का निर्णय संस्थानों के प्रमुखों पर छोड़ने के बजाय एक लोकतांत्रिक प्रक्रिया के माध्यम से किया जाना चाहिए।
यूजीसी द्वारा 13 जनवरी को उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने संबंधी विनियम 2026 को अधिसूचित किए जाने के बाद विवाद पैदा हो गया है।
विनियम के तहत यूजीसी से संबद्ध सभी उच्च शिक्षा संस्थानों के लिए भेदभाव संबंधी शिकायतों की जांच करने और समता को बढ़ावा देने के वास्ते ओबीसी, एससी और एसटी समुदायों के सदस्यों से युक्त 'समता समितियों' का गठन अनिवार्य किया गया है।
इस कदम की कई हलकों से कड़ी आलोचना हुई है, जिनमें से कई का दावा है कि इन नियमों का दुरुपयोग जाति-आधारित असंतोष को भड़काने और शैक्षणिक वातावरण को दूषित करने के लिए किया जा सकता है।
यहां जारी एक बयान में माकपा ने यूजीसी से विनियमों में मौजूद ''गंभीर खामियों'' को तत्काल दूर करने का आग्रह किया, खास तौर पर भेदभाव से निपटने के लिए समता समितियों के गठन से संबंधित खामियां। वामपंथी दल ने कहा कि ऐसी समितियों का गठन एक सकारात्मक कदम है, लेकिन उन पर कड़ी निगरानी रखी जानी चाहिए।
माकपा ने कहा कि नया नियम केवल विश्वविद्यालयों और उनसे संबद्ध कॉलेजों तक ही सीमित है और आईआईटी, आईआईएम, एम्स तथा अन्य समान निकायों में लागू नहीं होगा।
उसने कहा, ''यह अत्यावश्यक है कि सरकार इस गंभीर खामी को दूर करे और इन संस्थानों में भी प्रभावी समानता तंत्र का विस्तार करे।''
माकपा ने कहा, ''समता समितियों का गठन संस्था प्रमुख की मर्जी पर नहीं छोड़ा जाना चाहिए। इसके बजाय, विश्वसनीयता और जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए इसे छात्रों, शिक्षकों और गैर-शिक्षण कर्मचारियों के लोकतांत्रिक रूप से निर्वाचित प्रतिनिधियों के माध्यम से कार्यान्वित किया जाना चाहिए।''
पार्टी ने यह भी कहा कि यूजीसी ने 'समता समिति' के फैसलों के खिलाफ अपीलों पर फैसला सुनाने के लिए लोकपाल नियुक्त करने का अधिकार अपने हाथ में ले लिया है''।
भाषा यासिर अविनाश
अविनाश
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