न्यायालय ने सात साल से जेल में बंद विचाराधीन कैदी की सुनवाई में विलंब पर अप्रसन्नता जाहिर की
सुरेश
- 25 Jan 2026, 06:22 PM
- Updated: 06:22 PM
नयी दिल्ली, 25 जनवरी (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने हत्या के आरोप में गिरफ्तार एक विचाराधीन कैदी को सात वर्षों से जम्मू-कश्मीर की जेल में रखे जाने पर अप्रसन्नता जाहिर की है और सुनवाई में हो रहे विलंब पर सवाल उठाए हैं।
न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति के.वी. विश्वनाथन की पीठ ने कहा कि अब तक अभियोजन पक्ष के 19 गवाहों में से केवल चार के ही बयान दर्ज किए गए हैं।
पीठ ने इस बात का संज्ञान लिया कि अभियोजन के 19 गवाहों में से अभी तक केवल चार की गवाही हो सकी है। पीठ ने कहा कि जम्मू-कश्मीर सरकार और संबंधित निचली अदालत यह स्पष्ट करे कि पिछले सात वर्षों से सुनवाई लंबित क्यों है।
न्यायालय ने राज्य सरकार के वकील से कहा, "यदि गवाहों की पड़ताल में विलंब का उचित कारण नहीं बता पाए तो हम राज्य सरकार और अभियोजन एजेंसी के खिलाफ सख्त रुख अपनाएंगे। सुनवाई पूरी होने में विलंब का संतोषजनक कारण देना होगा।"
इस पर वकील ने हत्या के मामले में गिरफ्तार अनूप सिंह की जमानत याचिका पर राज्य सरकार का जवाब दाखिल करने के लिए समय मांगा। सिंह पर रणबीर दंड संहिता के तहत हत्या का आरोप है।
शीर्ष अदालत ने जम्मू कश्मीर सरकार को नोटिस जारी करते हुए 22 जनवरी के अपने आदेश में कहा, "अभियोजन का पूरा मामला परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर आधारित है। यह तथ्य चिंताजनक है कि याचिकाकर्ता 2018 से विचाराधीन कैदी के रूप में हिरासत में है। अब तक 19 में से केवल चार की गवाही हो सकी है। सुनवाई में विलंब को लेकर राज्य सरकार को स्पष्टीकरण देना होगा।"
पीठ ने उच्चतम न्यायालय की रजिस्ट्री को यह निर्देश भी दिया कि वह निचली अदालत से मुकदमे की स्थिति और इसके सात वर्षों से लंबित रहने के कारणों पर रिपोर्ट मांगे।
अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि सिंह को जम्मू-कश्मीर उच्च न्यायालय ने नियमित जमानत देने से इनकार कर दिया था। सिंह के खिलाफ 18 अक्टूबर 2018 को जम्मू-कश्मीर केंद्र शासित प्रदेश के सांबा जिले में बाड़ी ब्राह्मण थाने में रणबीर दंड संहिता (अब भारतीय दंड संहिता) की धारा 302 के तहत प्राथमिकी दर्ज की गई थी।
उच्च न्यायालय ने 30 जून 2025 को सिंह की याचिका खारिज करते हुए अधीनस्थ अदालत को निर्देश दिया था कि वह किसी भी पक्ष को अनावश्यक स्थगन दिए बिना मुकदमे की सुनवाई में तेजी लाए।
उच्च न्यायालय ने यह भी कहा था कि याचिकाकर्ता शीघ्र सुनवाई का हकदार है और अधीनस्थ अदालत को निर्देश दिया था कि वह मामले का निपटारा यथाशीघ्र करने का हरसंभव प्रयास करे।
भाषा खारी सुरेश
सुरेश
2501 1822 दिल्ली