न्यायालय ने संसदीय पैनल की वैधता को चुनौती देने वाली न्यायमूर्ति वर्मा की याचिका खारिज की
सुरेश माधव
- 16 Jan 2026, 10:21 PM
- Updated: 10:21 PM
नयी दिल्ली, 16 जनवरी (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने शुक्रवार को इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश यशवंत वर्मा की उस याचिका को खारिज कर दिया जिसमें उन्होंने लोकसभा अध्यक्ष के उन्हें पद से हटाने की मांग वाले प्रस्ताव को स्वीकार करने के फैसले और उनके खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच कर रहे संसदीय पैनल की वैधता को चुनौती दी थी।
न्यायालय ने कहा कि कानून के किसी प्रावधान का इस्तेमाल संसदीय कार्यवाही को बाधित करने के हथियार के रूप में नहीं किया जा सकता है।
चौदह मार्च को न्यायमूर्ति वर्मा के राष्ट्रीय राजधानी स्थित आधिकारिक आवास पर जले हुए नोटों के बंडल मिलने के बाद उन्हें दिल्ली उच्च न्यायालय से अपने मूल कैडर इलाहाबाद उच्च न्यायालय में भेज दिया गया था।
न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने न्यायमूर्ति वर्मा की इस दलील को खारिज कर दिया कि जहां दोनों सदनों में एक ही दिन प्रस्तावों के नोटिस दिए गए हों, वहां एक सदन (राज्यसभा) में नोटिस की अस्वीकृति स्वतः ही दूसरे सदन (लोकसभा) में नोटिस की अस्वीकृति का कारण बन जाएगी।
पीठ ने वर्मा की याचिका पर आठ जनवरी को अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था।
न्यायाधीश जांच अधिनियम की धारा 3(2) के प्रावधान-एक का विश्लेषण करते हुए पीठ ने कहा कि पहला प्रावधान संपूर्ण नहीं है, बल्कि प्रकृति में परिस्थितिजन्य है और इसमें ऐसे परिदृश्य की परिकल्पना नहीं की गई है जहां एक सदन में प्रस्ताव की सूचना स्वीकार कर ली जाती है और दूसरे में अस्वीकार कर दी जाती है।
अधिनियम की संबंधित धारा संसद द्वारा न्यायाधीश को हटाने के लिए अपनाई जाने वाली प्रक्रिया का प्रावधान करती है।
पीठ ने एक विस्तृत फैसले में कहा, ‘‘न्यायाधीशों के लिए संवैधानिक सुरक्षा उपाय बर्खास्तगी की प्रक्रिया को ही पंगु बनाने की कीमत पर नहीं आ सकते।’’
पीठ ने यह भी कहा कि जांच अधिनियम में ऐसा कुछ भी नहीं है जो यह सुझाव दे कि एक सदन में किसी प्रस्ताव को खारिज करने से दूसरा सदन कानून के अनुसार आगे बढ़ने में असमर्थ हो जाएगा।
न्यायालय ने अपने 60 पन्नों के फैसले में कहा कि संसद सदस्यों को फिर से शुरुआत करनी होगी और दोनों सदनों में से किसी एक में प्रक्रिया को नये सिरे से शुरू करना होगा।
इससे पहले आठ जनवरी को उच्चतम न्यायालय ने कहा था कि यदि उपराष्ट्रपति राष्ट्रपति की अनुपस्थिति में राष्ट्रपति के कार्यों का निर्वहन कर सकते हैं, तो राज्यसभा के उपसभापति, सभापति की अनुपस्थिति में उनके कार्यों का निर्वहन क्यों नहीं कर सकते?
ये टिप्पणियां पीठ ने कीं और न्यायमूर्ति वर्मा के इस तर्क से असहमत होने से इनकार कर दिया कि राज्यसभा के उपसभापति के पास किसी प्रस्ताव को अस्वीकार करने का अधिकार नहीं है और न्यायाधीश (जांच) अधिनियम 1968 के तहत, केवल अध्यक्ष और सभापति के पास ही किसी न्यायाधीश के खिलाफ प्रस्ताव को स्वीकार या अस्वीकार करने का अधिकार है।
नयी दिल्ली स्थित न्यायमूर्ति वर्मा के आधिकारिक आवास पर 14 मार्च को जले हुए नोटों के बंडल मिलने के बाद उन्हें दिल्ली उच्च न्यायालय से इलाहाबाद उच्च न्यायालय में स्थानांतरित कर दिया गया था।
भाषा सुरेश