भारत और अमेरिका के बीच रणनीतिक तालमेल का एक मजबूत आधार है: कोंडोलीजा
अमित दिलीप
- 14 May 2024, 06:23 PM
- Updated: 06:23 PM
(ललित के झा)
वाशिंगटन, 14 मई (भाषा) अमेरिका की पूर्व विदेश मंत्री कोंडोलीजा राइस ने कहा है कि भारत और अमेरिका के बीच रणनीतिक तालमेल का ऐसा मजबूत आधार है कि दोनों देशों में इस साल के चुनावों के बाद चाहे जो भी सत्ता में आए, दोनों के संबंध और प्रगाढ़ ही होंगे।
अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव पांच नवंबर को होगा, जबकि भारत में आम चुनाव के बाद अगले महीने नयी सरकार का गठन होगा।
राइस ने पिछले सप्ताह कहा था, ‘‘मुझे लगता है कि भारत में जो भी चुना जाएगा, जो भी अमेरिका में निर्वाचित होगा, हमारे पास रणनीतिक तालमेल का ऐसा मजबूत आधार है कि यह समय-समय पर भले ही अलग-अलग लग सकता है, लेकिन मेरा अभी भी विश्वास है कि देश अंततः अपने हितों का पालन करते हैं।''
राइस छह मई को कैलिफोर्निया में ‘हूवर इंस्टीट्यूट’ और ‘स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी’ द्वारा आयोजित "भारत के साथ विश्वास को मजबूत करना: 2008 अमेरिका-भारत असैन्य परमाणु समझौते के निहितार्थ" विषयक एक पैनल चर्चा के दौरान एक सवाल का जवाब दे रही थी। इसका वीडियो सोमवार को जारी किया गया।
राइस ने भारत-अमेरिका संबंधों की स्थिति जुड़े एक सवाल के जवाब में कहा, ‘‘हमारे हित बहुत हद तक जुड़े हुए हैं। यदि आपके मन में यह धारणा है कि आप एक लोकतंत्र हैं और आपका एक लंबा इतिहास है, तो हमारे मूल्य भी जुड़े हुए हैं। लेकिन सबसे महत्वपूर्ण बात, जैसा कि मैंने कहा है कि इस बिंदु पर हमारे हितों का सम्मिलन खामियों से रहित है। इसलिए मैं उम्मीद करती हूं कि यह द्विपक्षीय होगा, जो भी जीते।’’
राइस (69) ने दर्शकों से कहा कि इस रिश्ते की प्रगति अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्रित्व काल के दौरान शुरू हुई।
राइस ने वर्ष 2005 से 2009 तक विदेश मंत्री और 2001 से 2005 तक राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार के रूप में कार्य किया। उन्होंने बुश प्रशासन के दौरान भारत-अमेरिका संबंधों में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी।
उन्होंने कहा, ‘‘यह जितना कठिन था, यह भविष्य के लिए एक सकारात्मक कदम भी था। जब आप उस दुनिया के साथ काम कर रहे हैं, जिसके साथ हम 9/11 के बाद काम कर रहे थे, तो वास्तव में एक ऐसे लोकतंत्र के साथ काम करना बहुत अच्छा था जहां एक रणनीतिक संबंध का भविष्य था, जो अविश्वसनीय रूप से आशाजनक दिखता था।’’
उन्होंने कहा, ‘‘भले ही हम जानते थे कि यह बहुत कठिन होने वाला था और मुझे बस यह उल्लेख करना चाहिए कि यह केवल भारत के साथ बातचीत नहीं थी, आपको बाकी दुनिया को भी साथ लाना था, क्योंकि भारत परमाणु अप्रसार संधि से बाहर था। इसलिए बहुत सारे देश थे, जो ऐसा नहीं होने देना चाहते थे।’’
राइस ने कहा, ‘‘आपको कांग्रेस (संसद) को भी साथ लेना था। इसे संभव बनाने के लिए हमें अमेरिकी कानून में बदलाव करना पड़ा। लेकिन जब आप अफगानिस्तान और पाकिस्तान और 9/11 से निपट रहे हों, तो भारत के साथ काम करना एक अच्छी बात है। इसलिए, कुछ इतना सकारात्मक या संभावित रूप से इतना सकारात्मक होना बहुत अच्छा था।’’
पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार एम के नारायणन ने कहा कि असैन्य परमाणु समझौते की उत्पत्ति संयुक्त राष्ट्र महासभा की बैठक से इतर न्यूयॉर्क में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश के बीच बैठक के दौरान हुई थी। मुलाकात के दौरान सिंह ने बुश से परमाणु ऊर्जा के जरिए भारत के ऊर्जा संकट को सुलझाने में मदद करने को कहा।
नारायणन ने कहा, ‘‘राष्ट्रपति बुश ने कहा, मैं आपके लिए क्या कर सकता हूं? उन्होंने कहा कि हमारे सामने ऊर्जा की दिक्कत है। उन्होंने कहा कि हर बैरल की कीमत दिन-ब-दिन बढ़ती जा रही है। इसलिए हमारे पास काफी मजबूत परमाणु ऊर्जा प्रतिष्ठान है। यदि आप हम पर लगाए गए कई प्रतिबंधों को दूर करने में हमारी मदद कर सकते हैं, तो इससे हमें मदद मिलेगी। उनका बहुत ही सीमित अनुरोध था। अंततः जो बदला वह अलग है, यह भारत-अमेरिका संबंधों का आधार बन गया, कुछ ऐसा जो मुझे लगता है कि पहले कभी नहीं हुआ, कम से कम हाल की शताब्दियों में।’’
पूर्व विदेश सचिव एवं पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार शिव शंकर मेनन ने कहा कि परमाणु समझौता भारत की बुनियादी रणनीतिक स्थिति और लक्ष्यों के अनुरूप है। उन्होंने कहा, "क्योंकि विदेश नीति का उद्देश्य भारत को एक आधुनिक, समृद्ध, सुरक्षित देश में बदलने में मदद करना है।"
उन्होंने कहा, ‘‘अगर अमेरिका के साथ हमारा रिश्ता उदासीन है, तो ऐसा कोई तरीका नहीं है, जिससे हम ऐसा कर सकें। अमेरिका के साथ अच्छे मजबूत संबंध रखने में भारतीय रणनीतिक रुचि है और सच कहूं तो, भारतीय लोग इसे भारत में नेताओं से बहुत पहले से समझते हैं।''
भाषा अमित