शबरिमला तंत्री की गिरफ़्तारी से ऐतिहासिक ‘थझामोन मदोम’ चर्चा में आया
धीरज पवनेश
- 09 Jan 2026, 09:27 PM
- Updated: 09:27 PM
तिरुवनंतपुरम, नौ जनवरी (भाषा) केरल के प्रसिद्ध शबरिमला मंदिर के प्रमुख पुजारी (तंत्री) कंदरारु राजीवरु की सोने की चोरी के मामले में गिरफ्तारी से प्राचीन ‘थझामोन मदोम’ एक बार फिर सुर्खियों में आ गया है।
यह वही पुरोहित परिवार है जिसने पीढ़ियों से भगवान अय्यप्पा मंदिर के अनुष्ठानों का नेतृत्व किया है। यह परिवार अपनी प्राचीन परंपरा के लिए जाना जाता है, लेकिन उसने कठिन दौर भी देखे हैं
थझामोन परिवार की जड़ें बहुत गहरी हैं और भगवान परशुराम की कथा से जुड़ी हुई हैं। यह परिवार अलाप्पुझा के चेंगन्नूर में रहता है।
उन्हें केरल के सबसे प्राचीन तंत्री परिवारों में गिना जाता है, जो एट्टुमनूर और चेंगन्नूर में भगवान शिव के मंदिरों सहित कई प्रमुख प्राचीन मंदिरों की देखरेख करते हैं।
यहां तक कि शबरिमला मंदिर में भगवान अय्यपा के विग्रह की पूजा की जाती है, उसकी प्राण प्रतिष्ठा भी 1951 में एक थझामोन तंत्री द्वारा कराई गई थी। उनके नामों के आगे लगा ‘कंदरारु’ शीर्षक स्वयं एक विरासत है जिसे ऋषि परशुराम द्वारा प्रदत्त माना जाता है।
शबरिमला में मंदिर के कपाट खोलने और सभी प्रमुख अनुष्ठानों में तंत्री की उपस्थिति अनिवार्य है। दैनिक पूजा-पाठ मुख्य पुजारी (मेलशांति) द्वारा संपन्न की जाती हैं, लेकिन तंत्री के मार्गदर्शन में। हालांकि, इस प्रतिष्ठित पद पर पहले भी विवाद हो चुके हैं।
राजीवरु इस परिवार के पहले सदस्य नहीं हैं जिन पर गंभीर आरोप लगे हैं।
एक अन्य तंत्री कंदरारु मोहनारु को मंदिर प्रबंधन बोर्ड (त्रावणकोर देवस्वओम बोर्ड) ने 2006 में उनके पद से हटा दिया था। वह एक ऐसे मामले में फंसे जिसमें कथित तौर पर कोच्चि में एक यौन अपराधी ने उन्हें बंदूक की नोक पर धमकाया और लूट लिया था। वर्ष 2012 में एक अदालत ने उन्हें आरोपों से बरी कर दिया, लेकिन उनकी छवि को काफी नुकसान पहुंच चुका था।
उनकी नकारात्मक चर्चा की वजह का असर यह रहा कि वह शबरिमला के शक्तिशाली पद पर कभी दोबारा आसीन नहीं हो सके।
शबरिमला मंदिर शुभ मकरज्योति उत्सव की तैयारियों में जुटा है और ऐसे समय में राजीवरु की गिरफ्तारी से इस पुरोहित परिवार के इतिहास का नए सिरे से अवलोकन किया जा रहा है। इसका ऐसा इतिहास है जहां गहरी आध्यात्मिक परंपरा मानवीय कमजोरियों और आधुनिक समय की जांचों से जुड़ती है।
श्रद्धालु बड़ी उत्सुकता से देख रहे हैं कि भगवान अय्यपा के अनुष्ठानों के संरक्षक एक और संकट का सामना कैसे करते हैं। उनकी प्राचीन विरासत एक बार फिर जनता की नजरों में परखी जा रही है।
भाषा धीरज