हिमाचल उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार को 30 अप्रैल से पहले पंचायती राज चुनाव कराने का निर्देश दिया
रवि कांत रवि कांत सुभाष
- 09 Jan 2026, 09:23 PM
- Updated: 09:23 PM
शिमला, नौ जनवरी (भाषा) हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय ने पंचायती राज चुनाव छह महीने के लिए स्थगित करने के अनुरोध संबंधी राज्य सरकार की याचिका शुक्रवार को खारिज कर दी और उसे 30 अप्रैल से पहले चुनाव कराने का निर्देश दिया।
पंचायती राज चुनाव स्थगित करने को चुनौती देने वाली अधिवक्ता मनदीप चंदेल की जनहित याचिका का निस्तारण करते हुए उच्च न्यायालय ने हिमाचल प्रदेश सरकार और राज्य निर्वाचन आयोग को 30 अप्रैल तक समग्र चुनाव प्रक्रिया पूरी करने का निर्देश दिया।
राज्य सरकार ने कहा है कि प्रदेश में सार्वजनिक और निजी संपत्तियों और सड़कों को व्यापक नुकसान हुआ है, और उसने आयोग से आग्रह किया है कि जब तक जमीनी स्थिति में सुधार नहीं हो जाता, चुनाव प्रक्रिया को स्थगित कर दिया जाए। सरकार ने यह भी कहा कि राज्य में आपदा अधिनियम लागू है।
हालांकि, न्यायमूर्ति विवेक ठाकुर और न्यायमूर्ति रमेश वर्मा की एक खंडपीठ ने लगातार तीन दिनों तक दलीलें सुनने के बाद सरकार को 30 अप्रैल से पहले चुनाव कराने का निर्देश दिया।
याचिकाकर्ता का प्रतिनिधित्व कर रहे अधिवक्ता नंद लाल ने कहा कि अदालत ने यह समयसीमा इस बात को ध्यान में रखते हुए तय की है कि बोर्ड परीक्षाएं मार्च में स्कूलों में आयोजित की जाएंगी और उस दौरान मतदान केंद्र स्थापित करना अव्यावहारिक होगा।
राज्य सरकार ने दलील दी कि हालिया आपदा और अन्य चुनौतियों के कारण चुनाव कराने में कम से कम छह महीने लगेंगे, लेकिन अदालत ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया।
आयोग ने यह भी कहा कि चुनावों को स्थगित करने से और अधिक कठिनाइयां पैदा होंगी, क्योंकि जनगणना का कार्य मई में शुरू होगा तथा जुलाई और अगस्त के मानसून महीनों के दौरान चुनाव कराना लगभग असंभव होगा।
पंचायती राज संस्थाओं का पांच वर्षीय कार्यकाल 31 जनवरी को समाप्त हो जाएगा, जबकि 50 शहरी स्थानीय निकायों का कार्यकाल 18 जनवरी को समाप्त होगा। राज्य में 3,577 ग्राम पंचायतें, 90 पंचायत समितियां, 11 जिला परिषदें और 71 शहरी स्थानीय निकाय हैं।
विपक्ष ने पंचायती राज चुनावों को स्थगित करने की आलोचना करते हुए सरकार पर चुनावों का सामना करने से बचने का आरोप लगाया।
इसी बीच, उच्च न्यायालय के आदेश पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने उस कानून पर सवाल उठाया जिसके तहत ये आदेश जारी किए गए थे, क्योंकि राज्य में आपदा अधिनियम लागू था।
सुक्खू ने कहा, ‘‘क्या आपदा अधिनियम निष्प्रभावी हो गया है और उसका कोई अर्थ नहीं रह गया है, यह सवाल हम न्यायालय से करेंगे। ’’
उन्होंने कहा कि अगर अदालत ने सरकार से पूछा होता तो बेहतर होता।
सुक्खू ने आरोप लगाया कि उच्च न्यायालय के कई निर्णयों की कोई कानूनी व्याख्या नहीं है।
मुख्यमंत्री ने कहा कि अब सवाल पंचायत चुनावों का नहीं, बल्कि केंद्र सरकार द्वारा बनाए गए आपदा अधिनियम की कानूनी व्याख्या का है और क्या इसकी कोई प्रासंगिकता है।
उन्होंने संवाददाताओं से कहा, ‘‘ हम फैसले का अध्ययन करेंगे और उचित कार्रवाई करेंगे।’’
सुक्खू ने कहा कि शिमला और कुछ अन्य क्षेत्रों में पंचायत चुनाव दिसंबर और जनवरी में निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार, बर्फबारी के कारण नहीं हो पाए, जबकि निचले इलाकों में ये चुनाव हुए।
हिमाचल प्रदेश विधानसभा में विपक्ष के नेता जयराम ठाकुर ने पंचायत चुनावों को लेकर उच्च न्यायालय के फैसले का स्वागत करते हुए शुक्रवार को कहा कि राज्य की कांग्रेस सरकार हार के डर से यह चुनाव टालने की कोशिश कर रही है।
भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नेता ठाकुर ने यहां एक बयान में आरोप लगाते हुए कहा कि कांग्रेस संविधान की किताब को पूरे देश में लेकर घूम रही है और ‘‘संविधान को बचाने’’ का दिखावा कर रही है, लेकिन जब भी कांग्रेस को मौका मिलता है, पार्टी इसका उल्लंघन करने से नहीं हिचकिचाती।
विपक्ष के नेता ने कहा कि हिमाचल प्रदेश में ग्राम पंचायत, नगर निगम और अन्य स्थानीय निकाय चुनावों में सरकार जिस मनमाने ढंग से काम कर रही है, उससे यह स्पष्ट हो जाता है कि सरकार को किसी भी नियम, विनियम या संविधान की कोई परवाह नहीं है।
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