सबूतों से दिल्ली दंगों में खालिद और इमाम की संलिप्तता का पता चलता है: उच्चतम न्यायालय
नेत्रपाल संतोष
- 05 Jan 2026, 08:05 PM
- Updated: 08:05 PM
नयी दिल्ली, पांच जनवरी (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने सोमवार को कहा कि अभियोजन पक्ष के साक्ष्यों से पता चलता है कि उमर खालिद और शरजील इमाम वर्ष 2020 के दिल्ली दंगों की ‘‘साजिश रचने, लामबंदी करने और रणनीतिक दिशा-निर्देश देने’’ में शामिल थे। इसके साथ ही इसने साजिश के मामले में दोनों की जमानत याचिका खारिज कर दी।
उच्चतम न्यायालय ने यूएपीए की धारा 43डी (5) का हवाला दिया, जिसके अनुसार यदि किसी मामले की डायरी या आरोपपत्र की पड़ताल करने पर न्यायालय को यह विश्वास करने के लिए उचित आधार मिलते हैं कि किसी व्यक्ति के खिलाफ आरोप प्रथम दृष्टया सही है, तो न्यायालय को जमानत देने से इनकार करना होगा।
न्यायमूर्ति अरविंद कुमार और न्यायमूर्ति एनवी अंजारिया की पीठ ने कहा कि इस स्तर पर अपेक्षित एवं अभियोजन पक्ष द्वारा प्रस्तुत सामग्री से प्रथम दृष्टया कथित साजिश में उमर खालिद और शरजील इमाम की भूमिका का प्रमाण मिलता है।
पीठ ने कहा कि सामग्री से ‘‘साजिश, लामबंदी और रणनीतिक दिशा-निर्देश के स्तर पर भागीदारी का संकेत मिलता है, जो छिटपुट या स्थानीय कृत्यों से कहीं आगे तक फैला है’’।
इसने कहा कि इसके अलावा, यूएपीए की धारा 43डी (5) के तहत यह वैधानिक सीमा इन अपीलकर्ताओं के संबंध में लागू होती है।
गैरकानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम (यूएपीए) के प्रावधान के अनुसार, यदि मामले की डायरी या संहिता की धारा 173 के तहत बनाई गई रिपोर्ट का अवलोकन करने पर न्यायालय की यह राय हो कि यह मानने के लिए उचित आधार हैं कि ऐसे व्यक्ति के खिलाफ आरोप प्रथम दृष्टया सत्य है, तो ऐसे आरोपी व्यक्ति को जमानत पर या स्वयं के निजी मुचलके पर रिहा नहीं किया जाएगा।
शीर्ष अदालत ने कहा कि जब अभियोजन सामग्री प्रथम दृष्टया अपराध को उजागर करती है, तो वैधानिक प्रतिबंध प्रभावी होना चाहिए, और यदि ऐसा नहीं है, तो स्वतंत्रता प्रभावी होनी चाहिए।
हालांकि, उच्चतम न्यायालय ने गुलफिशा फातिमा, मीरान हैदर, शिफा उर रहमान, मोहम्मद सलीम खान और शादाब अहमद को यह कहते हुए जमानत दे दी कि इससे उनके खिलाफ लगे आरोपों की गंभीरता में कोई कमी नहीं आती।
फातिमा के मामले के संबंध में, शीर्ष अदालत ने कहा कि नागरिकता संशोधन अधिनियम के खिलाफ आंदोलन के दौरान विभिन्न प्रदर्शन स्थलों पर किसी प्रकार के स्वतंत्र नेतृत्व, संसाधनों पर नियंत्रण या रणनीतिक निगरानी में उसकी कोई सीधी भूमिका नहीं थी।
पीठ ने कहा, “यह आरोप कि गुलफिशा फातिमा ने स्थानीय महिलाओं को संगठित किया और प्रदर्शन स्थलों की व्यवस्थाओं का समन्वय किया, अभियोजन पक्ष के मामले के लिए भले ही प्रासंगिक हो, लेकिन फिलहाल इससे यह स्पष्ट नहीं होता कि उसने विभिन्न प्रदर्शन स्थलों पर स्वतंत्र कमान, संसाधनों पर नियंत्रण या रणनीतिक निगरानी की।’’
इसने कहा, “अभियोजन पक्ष खुद यह दावा करता है कि कथित पदानुक्रम में उससे ऊपर के लोगों द्वारा उसे निर्देश दिए गए थे। ऐसी परिस्थितियों में, यह न्यायालय मानता है कि जिस स्तर की भूमिका और नियंत्रण उसके बारे में बताया गया है, वह उस स्थिति में निरंतर कारावास को उचित नहीं ठहराता, जब जांच का उद्देश्य काफी हद तक पूरा हो चुका है।”
इमाम को नागरिकता (संशोधन) अधिनियम (सीएए) विरोधी प्रदर्शनों के दौरान दिए गए भाषणों के लिए 28 जनवरी, 2020 को गिरफ्तार किया गया था। बाद में अगस्त 2020 में उसे एक बड़े षड्यंत्र के मामले में गिरफ्तार किया गया। खालिद को 13 सितंबर, 2020 को गिरफ्तार किया गया था।
दिल्ली पुलिस ने शीर्ष अदालत को बताया था कि खालिद, इमाम और अन्य लोगों ने ‘‘शांतिपूर्ण विरोध’’ की आड़ में ‘‘सत्ता परिवर्तन अभियान" चलाकर देश की संप्रभुता और अखंडता पर हमला करने की साजिश रची थी।
इसने कहा था कि कथित अपराधों में देश को अस्थिर करने का जानबूझकर प्रयास शामिल था, जिसके लिए ‘‘जमानत नहीं बल्कि जेल’’ की सजा होनी चाहिए। पुलिस ने कहा था कि उसने आरोपियों के खिलाफ प्रत्यक्ष, दस्तावेजी और तकनीकी साक्ष्य एकत्र किए हैं जो सांप्रदायिक आधार पर राष्ट्रव्यापी दंगों को भड़काने में उनकी अंतर्निहित, गहरी और प्रबल संलिप्तता को दर्शाते हैं।
दिल्ली पुलिस ने दावा किया कि दंगे स्वत: नहीं हुए थे बल्कि ये सुनियोजित, पूर्व-नियोजित और सुव्यवस्थित हमला थे।
इसने कहा, ‘‘षड्यंत्र को अंजाम देने से पहले की अवधि से जुटाए गए साक्ष्य; दस्तावेजी संचार, समन्वित योजनाएं और विभिन्न पक्षों के बीच तालमेल; विचारों की स्पष्ट सहमति स्थापित करते हैं।’’
पुलिस ने आरोप लगाया कि सामग्री न केवल जानकारी बल्कि इरादे को भी दर्शाती है, जिससे लक्षित और रणनीतिक कार्रवाइयों के माध्यम से देश को बदनाम करने की एक सोची-समझी योजना का पता चलता है।
इसने कहा कि याचिकाकर्ताओं ने ‘‘दुर्भावनापूर्ण और शरारती कारणों से मुकदमे की शुरुआत में देरी कराई है ताकि वे पीड़ित होने का नाटक कर सकें और लंबे समय तक कारावास के आधार पर जमानत मांग सकें’’।
कानून प्रवर्तन एजेंसी ने शीर्ष अदालत में दायर एक हलफनामे में कहा, ‘‘यह निवेदन किया जाता है कि अभियुक्तों का आचरण, उनके विरुद्ध उपलब्ध अकाट्य और प्रत्यक्ष साक्ष्यों के अतिरिक्त, उन्हें इस न्यायालय से जमानत की कोई भी राहत मांगने का अधिकार नहीं देता है।’’
पुलिस ने 900 गवाहों के कारण मुकदमे के पूरा होने की संभावना नहीं होने के तर्क का खंडन करते हुए कहा कि यह बयान न केवल समय से पहले दिया गया है, बल्कि जमानत प्राप्त करने के लिए गढ़ा गया एक ‘‘भ्रमित करने वाला’’ बयान भी है।
इसने दावा किया कि खालिद और इमाम ने जेएनयू के ‘‘धर्मनिरपेक्ष ताने-बाने’’ को भंग किया और ‘मुस्लिम स्टूडेंट्स ऑफ जेएनयू’ नाम से एक सांप्रदायिक व्हाट्सऐप ग्रुप बनाया तथा उन्हें उकसाने एवं संगठित करने के लिए जामिया मिलिया इस्लामिया के छात्रों का भी इस्तेमाल किया।
पुलिस ने कहा, ‘‘उन्होंने जामिया और शाहीन बाग में छात्रों को भड़काना शुरू कर दिया। उन्होंने विरोध के नाम पर चक्का-जाम का मॉडल अपनाया और उचित समय आने पर इसे हिंसक चक्का-जाम में बदलने की साजिश रची, जिससे सामान्य जनजीवन के लिए आवश्यक आपूर्ति और सेवाओं में बाधा उत्पन्न हो तथा भारत के घटक प्रांतों को भारत संघ से अलग करने का प्रयास किया जा सके।’’
इसने दावा किया कि ‘चक्का-जाम’ के पीछे का मकसद सांप्रदायिक दंगे के जरिए बड़े पैमाने पर पुलिसकर्मियों और ‘‘गैर-मुसलमानों’’ की हत्या करना तथा उन्हें घायल करना था।
पुलिस ने कहा, ‘‘उमर खालिद और अन्य शीर्ष षड्यंत्रकारियों के निर्देशन में इमाम ने 13 दिसंबर से 20 दिसंबर, 2019 तक दिल्ली दंगों के पहले चरण की साजिश रची और उसे अंजाम दिया।’’
इसने आरोप लगाया, ‘‘शरजील इमाम दिल्ली दंगों के पहले चरण को अंजाम देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा था और यह बात शरजील इमाम की चैट से साबित हो सकती है।’’
पुलिस ने कहा कि जनवरी 2020 में, खालिद ने सीलमपुर में गुलफिशा फातिमा, नताशा नरवाल, देवांगना कलिता और अन्य लोगों के साथ एक ‘‘गुप्त बैठक’’ की थी, जहां उसने कथित तौर पर उन्हें सीलमपुर की स्थानीय महिलाओं को चाकू, बोतलें, तेजाब, पत्थर, मिर्च पाउडर और अन्य दंगा-रोधी सामग्री जमा करने के लिए उकसाने का निर्देश दिया था।
इसने कहा कि हलफनामे में फातिमा पर प्रमुख समन्वयक के रूप में काम करने का आरोप लगाया गया है, जिसने शांतिपूर्ण धरने को हिंसक प्रदर्शनों में बदलने में मदद की।
पुलिस ने कहा कि जामिया समन्वय समिति की सदस्य मीरान हैदर पर कई दिन तक चले विरोध प्रदर्शन स्थलों की देखरेख करने, धन इकट्ठा करने और प्रदर्शनकारियों को पुलिस तथा गैर-मुसलमानों पर हमला करने के लिए उकसाने करने का आरोप है।
खालिद, इमाम, गुलफिशा फातिमा और मीरान हैदर के खिलाफ गैरकानूनी गतिविधियां यूएपीए और पूर्ववर्ती भादंसं के प्रावधानों के तहत मामला दर्ज किया गया था, क्योंकि उन पर 2020 के दिल्ली दंगों में ‘‘मुख्य साजिशकर्ता’’ होने का आरोप था।
उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुए दंगों में 53 लोग मारे गए थे और 700 से अधिक लोग घायल हुए थे। क्षेत्र में नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) और राष्ट्रीय नागरिक पंजी (एनआरसी) के खिलाफ व्यापक विरोध-प्रदर्शनों के दौरान हिंसा भड़क उठी थी।
आरोपियों ने दिल्ली उच्च न्यायालय के दो सितंबर के एक आदेश को चुनौती देते हुए उच्चतम न्यायालय का रुख किया था। शीर्ष अदालत ने 22 सितंबर को दिल्ली पुलिस को नोटिस जारी कर जवाब मांगा था।
उच्च न्यायालय ने खालिद और इमाम समेत नौ लोगों की जमानत याचिका खारिज कर दी थी और कहा था कि विरोध प्रदर्शनों की आड़ में नागरिकों द्वारा की जाने वाली ‘‘षड्यंत्रकारी’’ हिंसा को बर्दाश्त नहीं किया जा सकता।
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