बंगाल में एसआईआर के बीच खुद को वैध मतदाता साबित करने के लिए संघर्ष कर रहे बुजुर्ग, बीमार और दिव्यांग
जोहेब मनीषा
- 05 Jan 2026, 10:43 AM
- Updated: 10:43 AM
कोलकाता, पांच जनवरी (भाषा) पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के दूसरे चरण के तहत ब्लॉक कार्यालयों में तनाव फैला हुआ है, जहां बुजुर्ग, दिव्यांग और संवेदनशील मतदाता शारीरिक परेशानियों, लंबी यात्राओं और आजीविका का नुकसान सहते हुए यह साबित करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं कि वे "वैध" मतदाता हैं।
पश्चिम बंगाल के ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में, सुनवाई केंद्रों पर इस प्रक्रिया से जुड़े गहन भावनात्मक मुद्दों को महसूस किया जा सकता है।
ऑक्सीजन मास्क लगाकर रिश्तेदारों द्वारा लाए जा रहे 80 साल के बुजुर्ग, कार्यालय के फर्श पर रेंगकर पहुंचते दिव्यांग व्यक्ति, और मतदाता सूची से नाम हटाए जाने से डरे दिहाड़ी मजदूरों सभी ने प्रशासनिक वादों और जमीनी हकीकत के बीच एक बढ़ते हुए अंतर को उजागर किया है।
निर्वाचन आयोग ने पहले चरण के एसआईआर के बाद 16 दिसंबर को मसौदा मतदाता सूची प्रकाशित की, जिसमें 58 लाख से अधिक नाम हटाए जाने के बाद मतदाताओं की संख्या 7.66 करोड़ से घटकर 7.08 करोड़ रह गई।
दूसरे चरण की शुरुआत 27 दिसंबर को हुई, जिसमें 1.67 करोड़ मतदाताओं के दस्तावेजों की जांच हो रही है। इनमें से 1.36 करोड़ को तार्किक विसंगतियों के कारण चिह्नित किया गया है और 31 लाख के रिकॉर्ड में समस्या है।
पश्चिम मेदिनीपुर के देबरा ब्लॉक में 87 वर्षीय स्नेहलता भक्त 32 किलोमीटर की यात्रा के बाद एसआईआर कार्यालय पहुंचीं। उनकी नाजुक हालत देख ब्लॉक विकास अधिकारी बाहर आए, दस्तावेजों की जांच की और उन्हें वाहन में लौटने की अनुमति दी।
उन्होंने कहा, “मैं क्यों इतना पैसा खर्च करूं और कष्ट सहूं, सिर्फ यह साबित करने के लिए कि मैं एक मतदाता हूं?”
पास ही में गंभीर रूप से बीमार और चलने में असमर्थ 65 वर्षीय झरना दास को उनके भाई कंधे पर उठाकर सुनवाई केंद्र में लाए।
उन्होंने कहा, “अगर हम नहीं आते, तो उनका नाम हटा दिया जाता। इस डर के कारण हमें लगता है कि हमारे पास कोई विकल्प नहीं है।”
जन्म से दृष्टिहीन दीपांकर दास का नाम 2002 की मतदाता सूची में था।
उन्होंने कहा, “मैं देख नहीं सकता, मैं बहुत ध्यान से चलता हूं। फिर भी, मुझे आना पड़ा।”
साउथ कोलकाता के गर्फा से एक सेवानिवृत्त केंद्रीय सरकारी कर्मचारी ने 2002 की सूची में अपना नाम गायब होने के बाद लगभग 150 किलोमीटर यात्रा की।
उन्होंने कहा, “अधिकारियों ने अच्छा व्यवहार किया। लेकिन इस उम्र में इतनी लंबी यात्रा करना बहुत मुश्किल है।”
दिहाड़ी मजदूरी करने वालों को इस सुनवाई के लिए अपना काम छोड़ना पड़ा है।
नारायणगढ़ के एक मिस्त्री श्यामल कोटल ने सुनवाई में शामिल होने के लिए काम छोड़ दिया।
उन्होंने कहा, “मेरे परिवार का गुजारा मेरी दैनिक मजदूरी पर निर्भर है। लेकिन अगर मेरा नाम हटा दिया जाता, तो वह इससे भी बुरा होता।”
पुरुलिया के बालारामपुर में, जन्म से 80 प्रतिशत दिव्यांग श्याम सिंह सरदार को सुनवाई में बुलाए जाने के बाद ब्लॉक कार्यालय के फर्श पर रेंगते हुए पहुंचना पड़ा। वहां कोई व्हीलचेयर उपलब्ध नहीं थी।
उन्होंने कहा, “कम से कम हम जैसे लोगों के लिए घर पर सुनवाई की व्यवस्था की जानी चाहिए थी। यह असहनीय उत्पीड़न है।”
हुगली के तारकेश्वर नामक 72 वर्षीय व्यक्ति सुनवाई पर जाने के दौरान गिर पड़े और सिर में चोट लग गई।
एक ओर निर्वाचन आयोग के दिशानिर्देशों में घर पर सुनवाई और छूट दी गई है, फिर भी संवेदनशील मतदाताओं को बुलाए जाने के मामले बार-बार सामने आने से कार्यान्वयन में खामियां उजागर हुई हैं। इस दौरान परिवारों को मौखिक आश्वासन मिलता है लेकिन लिखित नोटिस में भौतिक रूप से पेश होने के लिए कहा जाता है।
राज्य में सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) ने इन मुद्दों को उठाते हुए आरोप लगाया कि एसआईआर के कारण वास्तविक मतदाता 2026 के विधानसभा चुनाव से पहले वोट देने से वंचित हो सकते हैं।
हालांकि, भाजपा का कहना है कि यह पुनरीक्षण मतदाता सूची में पारदर्शिता और शुचिता सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक है और इसे राजनीति से जोड़कर नहीं देखना चाहिए।
भाषा जोहेब