साइबर अपराधियों ने वरिष्ठ नागरिकों से हजारों करोड़ रुपये लूटे: प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत
पारुल माधव
- 03 Jan 2026, 08:51 PM
- Updated: 08:51 PM
(तस्वीरों के साथ)
पटना, तीन जनवरी (भाषा) प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत ने शनिवार को कहा कि वह देश में साइबर अपराध की बढ़ती घटनाओं से हतप्रभ हैं, जिसके कारण आम लोगों, खासतौर पर वरिष्ठ नागरिकों से हजारों करोड़ रुपये लूट लिए गए हैं।
न्यायमूर्ति सूर्यकांत पटना के बाहरी इलाके पोथाही में एक समारोह को संबोधित कर रहे थे, जहां उन्होंने बिहार न्यायिक अकादमी के एक नये परिसर की आधारशिला रखी।
प्रधान न्यायाधीश ने कहा, “जिला न्यायपालिका के लिए नागरिक या आपराधिक कानूनों में नवीनतम जटिलताओं, जैसे कि तेजी से बढ़ते साइबर अपराधों से अवगत रहने का एकमात्र प्रभावी मंच न्यायिक अकादमी ही है।”
उन्होंने कहा, “आप सभी ने कभी सोचा भी नहीं होगा कि आपको ‘डिजिटल अरेस्ट’ जैसे अपराधों के बारे में सुनने को मिलेगा। साइबर अपराध दिन-रात अंजाम दिए जा रहे हैं और इनके तहत खास तौर पर वरिष्ठ नागरिकों को निशाना बनाया जा रहा है।”
न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा कि ये भारतीय न्यायपालिका के सामने आने वाली नवीनतम चुनौतियां हैं।
उन्होंने कहा, “मैं यह जानकर हतप्रभ रह गया कि अकेले भारत में ही वरिष्ठ नागरिकों से कुछ सौ करोड़ नहीं, बल्कि हजारों करोड़ रुपये साइबर अपराधों के जरिये की गई जबरन वसूली के तहत हड़प लिए गए।”
न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा कि लिहाजा इस तरह की आधुनिक चुनौतियों से निपटने के लिए न्यायिक अधिकारियों को गहन प्रशिक्षण देना और उन्हें अपडेट रखना बेहद जरूरी है।
उन्होंने कहा, “अदालतें न्यायाधीशों के माध्यम से काम करती हैं, लेकिन न्यायाधीशों का व्यक्तित्व उनके प्रशिक्षण से भी प्रभावित होता है। इसलिए न्यायिक अकादमियां न्याय व्यवस्था को बनाए रखने वाली महत्वपूर्ण स्तंभ हैं। ये वह स्थान हैं, जहां कानूनी ज्ञान को परिष्कृत किया जाता है।”
प्रधान न्यायाधीश ने कहा, “हमें यह स्वीकार करना चाहिए कि आज न्यायपालिका अप्रत्याशित बदलावों के दौर में काम कर रही है। अदालतों के सामने तकनीकी नवाचार, आर्थिक जटिलताओं, सामाजिक बदलावों और अधिकार संबंधी न्यायशास्त्र के कारण उपजे विवाद बड़े पैमाने पर आ रहे हैं।”
उन्होंने कहा कि न्याय प्रणाली से जनता की पहले से कहीं अधिक अपेक्षाएं हैं।
न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा कि न्यायिक शिक्षा स्थिर और सीमित नहीं रह सकती, क्योंकि न्यायिक प्रासंगिकता और विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए लगातार सीखते रहना आवश्यक है।
उन्होंने कहा, “न्यायाधीशों को बौद्धिक रूप से चुस्त, सामाजिक रूप से जागरूक और नैतिक रूप से दृढ़ रहना चाहिए। न्यायिक अकादमियां उस संस्थागत तंत्र के रूप में काम करती हैं, जिनके माध्यम से इस सतत शिक्षा को आकार दिया जाता है और बनाए रखा जाता है। वे न्यायाधीशों को कानून की व्याख्या इस तरह से करने के लिए उपकरण प्रदान करती हैं, जो सैद्धांतिक, व्यावहारिक और वादियों के जीवन की वास्तविकताओं के प्रति संवेदनशील हो।”
न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा कि न्यायिक प्रशिक्षण का व्यापक प्रभाव अदालतों और कक्षाओं से कहीं आगे तक फैला हुआ है और यह कानून के शासन में जनता के विश्वास को आकार देता है।
उन्होंने कहा, “जब न्याय कुशलतापूर्वक और मानवीय तरीके से प्रदान किया जाता है, तो यह लोकतांत्रिक विश्वास को मजबूत करता है।”
प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि बिहार की सामाजिक विविधता, ऐतिहासिक अनुभव और क्षेत्रीय चुनौतियां एक विशिष्ट संदर्भ प्रदान करती हैं, जिसके भीतर न्याय किया जाना चाहिए।
उन्होंने कहा, “इसलिए बिहार में एक न्यायिक अकादमी को इन वास्तविकताओं से जुड़ना चाहिए, स्थानीय सामाजिक गतिशीलता, क्षेत्रीय कानूनी मुद्दों और नागरिकों के सामने पेश आने वाली रोजमर्रा की चुनौतियों को समझना चाहिए, साथ ही यह सुनिश्चित करना चाहिए कि न्यायनिर्णय संवैधानिक मूल्यों और राष्ट्रीय न्यायशास्त्र के अनुरूप रहे।”
भाषा पारुल