पवित्र पिपरहवा रत्नों की ‘घर वापसी’ खुशी और उत्सव का विषय: शेखावत
नेत्रपाल रंजन
- 03 Jan 2026, 08:34 PM
- Updated: 08:34 PM
(तस्वीरों के साथ)
नयी दिल्ली, तीन जनवरी (भाषा) केंद्रीय संस्कृति मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने शनिवार को कहा कि औपनिवेशिक शासनकाल के दौरान पवित्र पिपरहवा अवशेषों का एक हिस्सा देश से बाहर ले जाया गया था, और अब उत्तर भारत में 1898 में हुई खुदाई के दौरान मिली बुद्ध से संबंधित कलाकृतियों की प्रदर्शनी, साथ ही हाल ही में वापस लाए गए रत्नों की प्रदर्शनी खुशी और उत्सव का विषय है।
राय पिथोरा सांस्कृतिक परिसर में आयोजित भव्य प्रदर्शनी ‘लाइट एंड द लोटस: रेलिक्स ऑफ अवेकंड’ का उद्घाटन आज सुबह प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने किया।
इन अवशेषों की खोज मूल रूप से 1898 में पिपरहवा (वर्तमान में उत्तर प्रदेश में) में विलियम क्लैक्सटन पेप्पे द्वारा की गई थी।
संस्कृति मंत्रालय ने कहा कि यह ऐतिहासिक घटना भगवान बुद्ध के पिपरहवा रत्न अवशेषों के पुनर्मिलन का प्रतीक है, जिन्हें 127 वर्षों के बाद वापस लाया गया है, साथ ही 1898 की खुदाई और उसके बाद 1971-1975 में पिपरहवा स्थल पर हुई खुदाई से प्राप्त अवशेषों, रत्न अवशेषों और अवशेष पात्रों का भी पुनर्मिलन हुआ है।
इसने कहा कि इसमें छठी शताब्दी ईसा पूर्व से लेकर वर्तमान तक की 80 से अधिक वस्तुएं शामिल हैं, जिनमें मूर्तियां, पांडुलिपियां, थांगका और अनुष्ठानिक वस्तुएं शामिल हैं।
संस्कृति मंत्रालय ने शुक्रवार को बताया कि इनकी खोज के बाद, इनके कुछ हिस्सों को विश्व स्तर पर वितरित किया गया, जिनमें से एक हिस्सा सियाम के राजा को उपहार में दिया गया, दूसरा इंग्लैंड ले जाया गया और तीसरा हिस्सा कलकत्ता (अब कोलकाता) स्थित भारतीय संग्रहालय में संरक्षित किया गया।
ब्रिटिश मूल के पेप्पे के वंशजों द्वारा संरक्षित अवशेषों का एक चयन पिछले साल सात मई को सोथबीज हांगकांग द्वारा नीलामी के लिए सूचीबद्ध किया गया था।
मंत्रालय के अनुसार, हालांकि, नीलामी रोक दी गई और मंत्रालय के ‘‘विश्व भर के बौद्ध समुदायों के समर्थन से किए गए निर्णायक हस्तक्षेप’’ के माध्यम से 2025 में अवशेष वापस कर दिए गए।
शेखावत ने कहा कि 127 साल बाद ‘‘यह पवित्र पिपरहवा रत्नों की घर वापसी का प्रतीक है।’’
उन्होंने कहा कि इसके दो अलग-अलग रखे गए हिस्सों को अब इस प्रदर्शनी के माध्यम से फिर से एक साथ लाया जा रहा है, ताकि लोग उन्हें देख सकें।
मंत्री ने कहा, ‘‘यह खुशी और उत्सव का विषय है, और हमारे लिए यह वैश्विक प्रेरणा का क्षण भी है।’’
उन्होंने कहा कि औपनिवेशिक शासन के दौरान अवशेषों का कुछ हिस्सा देश से बाहर ले जाया गया था। मंत्री ने बताया कि प्रदर्शनी में खुदाई से संबंधित 1898 की कलाकृतियां और उससे जुड़े रिकॉर्ड प्रदर्शित किए गए हैं।
शेखावत ने अपने संबोधन में गोदरेज फाउंडेशन को भी धन्यवाद दिया।
जुलाई में अवशेषों को भारत लाए जाने पर मंत्रालय ने कहा था, ‘‘यह सफल वापसी सांस्कृतिक कूटनीति और सहयोग में एक मिसाल कायम करती है, यह दर्शाती है कि सार्वजनिक संस्थानों और निजी उद्यमों के बीच रणनीतिक साझेदारी वैश्विक विरासत की रक्षा और संरक्षण कैसे कर सकती है।’’
भाषा नेत्रपाल