अरावली पर्वतमाला का एक तिहाई हिस्सा पारिस्थितिकी जोखिम में: अध्ययन
पृथ्वी बाकोलिया खारी
- 03 Jan 2026, 08:03 PM
- Updated: 08:03 PM
जयपुर, तीन जनवरी (भाषा) एक गैर-राजनीतिक पर्यावरण संरक्षण समूह ने अरावली पर्वतमाला पर उपग्रह-आधारित एक विस्तृत अध्ययन रिपोर्ट शनिवार को जारी की जिसमें दावा किया गया है कि इस पर्वत शृंखला का लगभग एक तिहाई हिस्सा गंभीर पारिस्थितिकी जोखिम में है।
‘वी आर अरावली’ नाम के समूह ने पूरे क्षेत्र में खनन पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने की मांग की है।
समूह का दावा है कि यह स्वतंत्र विश्लेषण जीआईएस वैज्ञानिकों की एक टीम द्वारा ‘ब्रिस्टल एफएबीडीईएम’ (बेयर अर्थ मॉडल) के आधार पर किया गया है।
‘ब्रिस्टल एफएबीडीईएम’ एक उन्नत उपग्रह-आधारित मॉडल है जिसका उपयोग धरती की वास्तविक सतह (पेड़-पौधों, इमारतों आदि को हटाकर) की ऊंचाई मापने के लिए किया जाता है, इसमें एक ऐसा थ्री-डी नक्शा है जो दिखाता है कि जमीन वास्तव में कहां कितनी ऊंची या नीची है-बिना जंगल, मकान या किसी भी मानवीय संरचना के।
अध्ययन के अनुसार अरावली की कुल पहाड़ी भूमि का 31.8 प्रतिशत हिस्सा 100 मीटर से कम ऊंचाई का है, जिसे मौजूदा सरकारी मानकों के तहत कानूनी संरक्षण से बाहर कर दिया गया है।
समूह ने कहा कि सरकार द्वारा बताया गया 0.19 प्रतिशत का आंकड़ा अरावली की वास्तविक भूवैज्ञानिक संरचना को नजरअंदाज करता है।
समूह से जुड़े जलवायु वैज्ञानिक एवं पर्यावरण कार्यकर्ता डॉ. सुधांशु ने कहा कि यह निष्कर्ष गंभीर नीतिगत खामी को उजागर करते हैं।
उन्होंने कहा, ‘‘कम ऊंचाई वाली पहाड़ियों को गलत तरीके से बंजर भूमि के रूप में खारिज किया जा रहा है, जबकि यही क्षेत्र राजस्थान, हरियाणा और दिल्ली के लगभग 30 करोड़ लोगों के लिए भूजल पुनर्भरण और धूल-रेत को रोकने वाली सबसे बड़ी प्राकृतिक दीवार हैं।’’
अध्ययन के अनुसार इन निम्न-ऊंचाई वाली पहाड़ियों से संरक्षण हटने का सीधा असर करीब 30 करोड़ लोगों पर पड़ेगा।
इसके मुताबिक ये पहाड़ियां उन ‘खाली जगहों’ में स्थित हैं, जहां थार रेगिस्तान पहले से फैल रहा है। इन्हें नष्ट किए जाने से उपजाऊ मैदान भी रेगिस्तान में बदल सकते हैं। जयपुर, गुरुग्राम और फरीदाबाद जैसे जल-संकटग्रस्त शहरों के लिए यही क्षेत्र प्रमुख भूजल पुनर्भरण क्षेत्र हैं।
समूह का कहना है कि अरावली धूल को रोकने वाली प्राकृतिक दीवार की तरह काम करती है। इन पहाड़ियों में खनन से दिल्ली-राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में प्रदूषण और बढ़ेगा, जिससे स्वास्थ्य संकट गहराएगा।
समूह के अनुसार अध्ययन से जुड़ा पूरा आंकड़ा और मानचित्र सार्वजनिक रूप से उपलब्ध कराया गया है। पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए सभी ‘मैपिंग कोड’ और ‘एल्गोरिदम’ सभी की पहुंच में रखे गए हैं ताकि सरकार और वैज्ञानिक समुदाय इनकी स्वतंत्र जांच कर सके।
इन निष्कर्षों के आधार पर समूह ने मांग की है कि पूरी अरावली पर्वतमाला को पूर्ण संरक्षित क्षेत्र घोषित किया जाए और पहाड़ तथा पर्वत को ऊंचाई के आधार पर अलग करने की व्यवस्था समाप्त की जाए। इसने सभी प्रकार के खनन पर तत्काल रोक लगाने की मांग भी की।
भाषा पृथ्वी बाकोलिया