उच्च न्यायालय के निर्देश पर एमसीडी ने रामलीला मैदान से अवैध निर्माण हटाने का आदेश दिया
नोमान पवनेश
- 24 Dec 2025, 10:31 PM
- Updated: 10:31 PM
नयी दिल्ली, 24 दिसंबर (भाषा) दिल्ली नगर निगम (एमसीडी) ने रामलीला मैदान से अवैध अतिक्रमण हटाने और अनधिकृत वाणिज्यिक गतिविधियों को रोकने का आदेश दिया है।
यह आदेश एक जांच के बाद आया है जिसमें पाया गया कि सरकारी भूमि का उपयोग एक बड़े मस्जिद जैसे ढांचे के लिए किया जा रहा था जो अनुमोदित मानचित्रों में नहीं है, और एक बारात घर का उपयोग निजी आयोजनों के लिए किया जा रहा था।
आधिकारिक आदेश के अनुसार, यह कार्रवाई 'सेव इंडिया फाउंडेशन' की एक शिकायत के बाद हुई है, जिसमें आरोप लगाया गया था कि तुर्कमान गेट के पास रामलीला मैदान के बड़े हिस्सों पर अतिक्रमण किया गया है और धार्मिक एवं धर्मार्थ गतिविधियों की आड़ में इनका उपयोग वाणिज्यिक उद्देश्यों के लिए किया जा रहा है।
शिकायत में अनधिकृत संरचनाओं को चिन्हित किया गया था, जिनमें विशाल मस्जिद/मरकज का ढांचा, एक बारात घर और वाणिज्यिक पैथोलॉजी एवं डायग्नोस्टिक सेंटर शामिल हैं जो जनता से शुल्क वसूल रहे हैं।
नगर निगम ने भूमि एवं विकास कार्यालय (एल एंड डीओ) और दिल्ली विकास प्राधिकरण (डीडी) के साथ मिलकर 16 अक्टूबर को एक संयुक्त सर्वेक्षण किया था।
सर्वेक्षण में खुलासा हुआ कि लोक निर्माण विभाग द्वारा अनुरक्षित सड़क और फुटपाथ के लगभग 2,512 वर्ग फुट हिस्से पर अतिक्रमण किया गया था, जबकि नगर निगम को लाइसेंस पर दी गई रामलीला मैदान की लगभग 36,428 वर्ग फुट भूमि अनधिकृत कब्जे में है, जहां एक बारात घर, एक पार्किंग स्थल और एक निजी डायग्नोस्टिक सेंटर चल रहे है।
शिकायतकर्ता द्वारा दायर एक रिट याचिका के माध्यम से यह मामला दिल्ली उच्च न्यायालय पहुंचा।
उच्च न्यायालय ने 12 नवंबर को नगर निगम को तीन महीने के भीतर अतिक्रमण और अवैध वाणिज्यिक गतिविधियों को हटाने के लिए उचित कार्रवाई करने का निर्देश दिया।
अदालत के निर्देशों के अनुपालन में, नगर निगम ने उपायुक्त (भूमि एवं संपदा) की अध्यक्षता में 24 नवंबर और 16 दिसंबर को सुनवाई की।
कार्यवाही के दौरान प्रबंधन समिति के प्रतिनिधियों, दिल्ली वक्फ बोर्ड, एल एंड डीओ, डीडीए और राजस्व अधिकारियों का पक्ष सुना गया।
सुनवाई के दौरान, मस्जिद की प्रबंधन समिति ने बारात घर के होने से इनकार किया और दावा किया कि परिसर के कुछ हिस्सों का उपयोग केवल कभी-कभी शादियों के लिए किया जा रहा था और क्लिनिक एक धर्मार्थ संस्था है, जो जरूरतमंदों के लिए चलाई जा रही है।
दिल्ली वक्फ बोर्ड ने 1970 के गजट नोटिफिकेशन का हवाला देते हुए जमीन को वक्फ संपत्ति होने का दावा किया और स्वामित्व के दस्तावेज पेश करने के लिए समय मांगा।
हालांकि, रिकॉर्ड और दलीलों के परीक्षण के बाद, नगर निगम इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि भारत सरकार या एल एंड डीओ से दिल्ली वक्फ बोर्ड या प्रबंधन समिति को भूमि के स्वामित्व हस्तांतरण को स्थापित करने के लिए कोई दस्तावेजी सबूत पेश नहीं किया गया है।
आदेश में उल्लेख किया गया कि रिकॉर्ड पर एकमात्र वैध दस्तावेज 15 फरवरी, 1940 का पट्टा विलेख है, जो एल एंड डीओ द्वारा 0.195 एकड़ क्षेत्र के लिए किया गया था।
डीडीए ने नगर निगम को सूचित किया कि राजस्व रिकॉर्ड के अनुसार, भूमि सरकारी स्वामित्व के अंतर्गत आती है और दिल्ली वक्फ बोर्ड या किसी अन्य निकाय को आवंटन का कोई रिकॉर्ड दर्ज नहीं है।
आदेश में कहा गया कि राजस्व अधिकारियों ने भी स्पष्ट किया कि कब्जेदारों के दावों का समर्थन करने वाला कोई भी स्वामित्व रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है।
एमसीडी ने 22 दिसंबर को अपने अंतिम आदेश में माना कि 0.195 एकड़ के पट्टे वाले क्षेत्र से परे कोई भी ढांचा अतिक्रमण की श्रेणी में आता है और उसे हटाया जाए।
नगर निकाय ने कहा कि धार्मिक या कब्रिस्तान की भूमि का उपयोग विवाह स्थल या क्लिनिक के रूप में नहीं किया जा सकता है, और मौजूदा गतिविधियों को "सार्वजनिक भूमि का घोर दुरुपयोग" करार दिया।
भाषा
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