सूरत की अदालत ने सात वर्षीय जैन बच्ची की दीक्षा पर रोक लगायी
शुभम सुभाष
- 22 Dec 2025, 07:31 PM
- Updated: 07:31 PM
सूरत, 22 दिसंबर (भाषा) गुजरात के सूरत शहर के एक कुटुम्ब न्यायालय ने सोमवार को सात वर्षीय जैन बच्ची की दीक्षा पर रोक लगा दी, क्योंकि उसके पिता ने याचिका दायर कर दावा किया था कि उससे अलग रह रही पत्नी ने उसकी इच्छा के विरुद्ध बच्ची को भिक्षु बनाने का निर्णय लिया।
न्यायाधीश एस वी मंसूरी ने मुंबई में आठ फरवरी 2026 को होने वाली उसकी दीक्षा पर रोक लगा दी।
याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील एस. मेहता ने कहा, "अदालत ने लड़की की दीक्षा पर अंतरिम रोक लगाने की हमारी याचिका स्वीकार कर ली और अगली सुनवाई दो जनवरी के लिए तय की है। अदालत ने लड़की की मां को एक हलफनामा दाखिल करने को कहा है जिसमें यह बताया जाए कि बच्ची दीक्षा समारोह में भाग नहीं लेगी।’’
अदालत को बताया गया कि इस मुद्दे पर हुए विवाद के बाद, महिला लगभग एक साल पहले अपना ससुराल छोड़कर बेटी और बेटे को लेकर मायके चली गई थी।
लड़की के पिता ने 10 दिसंबर को कुटुम्ब न्यायालय में उसके संरक्षण की मांग करते हुए दावा किया था कि उससे अलग रह रही पत्नी ने उसकी इच्छा के विरुद्ध यह फैसला लिया कि बच्ची को जैन भिक्षु बनने के लिए दीक्षा लेनी चाहिए।
न्यायाधीश मंसूरी ने याचिकाकर्ता की पत्नी को नोटिस जारी कर 22 दिसंबर तक जवाब मांगा था।
याचिकाकर्ता ने बताया कि उसने प्रतिवादी से 2012 में शादी की थी और उनके दो बच्चे हैं। दंपति 2024 से एक दूसरे से अलग रह रहे हैं।
याचिका में कहा गया है कि उन्होंने अपनी बेटी के भिक्षु बनने के मुद्दे पर पत्नी के साथ चर्चा की थी और इस बात पर सहमति जताई थी कि लड़की को बालिग होने के बाद भिक्षु बनना चाहिए।
याचिकाकर्ता ने कहा कि हालांकि, उसकी पत्नी ने इस बात पर जोर दिया था कि बच्ची को फरवरी 2026 में मुंबई में एक सामूहिक समारोह में दीक्षा दिलाई जाए।
याचिका में आरोप लगाया गया कि अप्रैल 2024 में उसकी पत्नी अपने दो बच्चों के साथ घर छोड़कर चली गई और अपने माता-पिता के साथ रहने लगी। साथ ही, महिला ने कहा था कि वह तभी वापस आएगी जब वह बेटी की दीक्षा के लिए सहमत हो जाएंगे।
याचिकाकर्ता ने कहा कि बाद में पत्नी ने उसकी असहमति के बावजूद समारोह में जाने पर जोर दिया।
याचिकाकर्ता ने बताया कि उसकी बेटी केवल सात वर्ष की है और वह स्वयं ऐसा निर्णय नहीं ले सकती।
उसने दावा किया कि उसकी पत्नी बेटी को धार्मिक समागम में ले जाती थी और एक बार उसकी सहमति के बिना ही बच्ची को अहमदाबाद स्थित आश्रम में एक गुरु के साथ अकेला छोड़ दिया था।
याचिकाकर्ता ने यह भी आरोप लगाया कि उसकी पत्नी ने एक बार बच्ची को मुंबई में एक अन्य जैन भिक्षु के आश्रम में छोड़ दिया था और उसे वहां उससे मिलने नहीं दिया गया।
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