अवमानना की शक्ति न्यायाधीशों की ना तो व्यक्तिगत ढाल है और ना ही आलोचना को दबाने की तलवार है: न्यायालय
संतोष प्रशांत
- 10 Dec 2025, 09:07 PM
- Updated: 09:07 PM
नयी दिल्ली, 10 दिसंबर (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने बुधवार को कहा कि अवमानना की शक्ति का प्रयोग करते समय न्यायालयों को इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि यह शक्ति न तो न्यायाधीशों के लिए व्यक्तिगत सुरक्षा कवच है और न ही आलोचना को दबाने की तलवार है।
यह टिप्पणी न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने की। बंबई उच्च न्यायालय द्वारा स्वतः संज्ञान लेते हुए आपराधिक अवमानना के मामले में एक महिला को दी गई एक सप्ताह की सजा को पीठ ने माफ कर दिया।
सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि दया न्यायिक विवेक का अभिन्न अंग बनी रहनी चाहिए, और अवमानना करने वाले व्यक्ति द्वारा अपनी गलती को ईमानदारी से स्वीकार करने और उसके लिए प्रायश्चित करने की इच्छा व्यक्त करने पर दया दिखाई जानी चाहिए।
न्यायालय ने कहा कि दंड देने की शक्ति में क्षमा करने की शक्ति भी निहित है, बशर्ते न्यायालय के समक्ष उपस्थित व्यक्ति अपने उस कृत्य के लिए वास्तविक पश्चाताप प्रदर्शित करे जिसके कारण वह इस स्थिति में पहुंचा है।
पीठ ने कहा, ‘‘इसलिए अवमानना के अधिकार क्षेत्र का प्रयोग करते समय न्यायालयों को इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि यह शक्ति न तो न्यायाधीशों के लिए व्यक्तिगत सुरक्षा कवच है और न ही आलोचना को दबाने की तलवार है।’’
इसमें कहा गया है, ‘‘आखिरकार, अपनी गलती के लिए पश्चाताप के लिए साहस की आवश्यकता होती है और गलती करने वाले को क्षमा करने के लिए उससे भी बड़े सदगुण की आवश्यकता होती है।’’
उच्च न्यायालय के 23 अप्रैल के उस आदेश के विरुद्ध दायर अपील पर पीठ ने अपना फैसला सुनाया, जिसमें अपीलकर्ता को आपराधिक अवमानना का दोषी ठहराया गया था।
उच्च न्यायालय ने उन्हें एक सप्ताह के साधारण कारावास की सजा सुनाई थी और उन पर 2,000 रुपये का जुर्माना लगाया था।
उच्च न्यायालय ने गौर किया कि अपीलकर्ता कल्चरल ऑफ सीवुड्स एस्टेट्स लिमिटेड हाउसिंग कॉम्प्लेक्स की पूर्व निदेशक थीं।
अदालत ने यह भी गौर किया कि पशु जन्म नियंत्रण नियम, 2023 के नियम 20 की वैधता को चुनौती देने वाली एक लंबित याचिका में, एक हस्तक्षेपकर्ता ने हलफनामा दायर कर कहा था कि अपीलकर्ता ने जनवरी 2025 में एक परिपत्र जारी किया था जिसमें कथित ‘कुत्ता माफिया’ के बारे में टिप्पणियां थीं।
उच्च न्यायालय ने परिपत्र को ‘अपमानजनक’ पाया था और बाद में अपीलकर्ता को कारण बताओ नोटिस जारी करने का निर्देश दिया था।
उच्चतम न्यायालय ने गौर किया कि सीवुड्स द्वारा उच्च न्यायालय में प्रस्तुत हलफनामे में यह स्पष्ट किया गया था कि निदेशक मंडल को अपीलकर्ता द्वारा जारी किए गए अपमानजनक परिपत्र की कोई जानकारी नहीं थी।
अपीलकर्ता ने भी उच्च न्यायालय में हलफनामा दायर कर स्वीकार किया था कि ‘अपमानजनक’ परिपत्र जारी करने में गंभीर त्रुटि हुई थी, जो निवासियों की ओर से उन पर बनाए गए मानसिक दबाव के कारण जारी किया गया था।
अपील पर सुनवाई करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि उच्च न्यायालय में दायर हलफनामे में अपीलकर्ता ने बिना शर्त और स्पष्ट तौर पर माफी मांगी थी।
पीठ ने कहा, ‘‘हालांकि, उच्च न्यायालय ने माफी स्वीकार करने से इनकार कर दिया, क्योंकि हलफनामे को समग्र रूप से पढ़ने पर उसमें शिकायत किए गए कृत्यों के लिए किसी वास्तविक पश्चाताप का कोई संकेत नहीं मिला।’’
पीठ ने कहा कि उच्च न्यायालय ने अवमानना संबंधी अपने अधिकार क्षेत्र का प्रयोग उचित सावधानी के साथ नहीं किया।
भाषा संतोष