रास में विपक्ष ने वंदे मातरम् में दो अंतरे रखने के निर्णय को तुष्टीकरण बताने पर जतायी कड़ी आपत्ति
माधव मनीषा
- 10 Dec 2025, 03:29 PM
- Updated: 03:29 PM
नयी दिल्ली, 10 दिसंबर (भाषा) राज्यसभा में बुधवार को कांग्रेस सहित विपक्षी दलों के सदस्यों ने राष्ट्रगीत वंदे मातरम् को ‘तुष्टीकरण’ के कारण संक्षिप्त करने के सत्तारूढ़ भाजपा के नेताओं के दावों को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि इतिहास को विकृत करके पेश नहीं किया जाना चाहिए और इससे आजादी की लड़ाई में कुर्बानी देने वालों का अपमान होता है।
कांग्रेस के जयराम रमेश ने चर्चा में भाग लेते हुए कहा कि लोग इतिहास में राजनीति को घुसा रहे हैं। उन्होंने कहा कि कुछ लोग ‘हिस्टोरियन (इतिहासकार) बनना चाहते हैं किंतु ‘डिस्टोरियन (विकृत करने वाले)’ बन गये हैं।
राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम्’ की रचना के 150 बरस पूरे होने पर उच्च सदन में मंगलवार को इस चर्चा की शुरूआत करते हुए भाजपा के वरिष्ठ नेता एवं गृह मंत्री अमित शाह ने कहा था कि यदि राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम् के दो टुकड़े न किए जाते तो देश का विभाजन भी नहीं होता।
कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने कहा कि बाबू राजेन्द्र प्रसाद ने 28 सितंबर 1937 को सरदार वल्लभ भाई पटेल को एक पत्र लिखकर कहा था कि वंदे मातरम् को लेकर समाज के विभिन्न वर्गों में जो राय है उसे देखते हुए कांग्रेस की कार्य समिति (सीडब्ल्यूसी) में कोई रुख अपनाया जाए। रमेश ने कहा कि क्या यह कहा जा सकता है कि राजेन्द्र प्रसाद और सरदार पटेल उस समय तुष्टीकरण कर रहे थे?
कांग्रेस नेता ने कहा कि नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने 16 अक्टूबर 1937 को गुरुदेव रवीन्द्र नाथ टैगोर को एक पत्र लिखकर उनसे पूछा कि वंदे मातरम् को लेकर कांग्रेस कार्य समिति में पार्टी का क्या रुख होना चाहिए? उन्होंने कहा कि 19 अक्टूबर 1937 को गुरुदेव ने इसका जवाब दिया था। उन्होंने कहा कि नेता जी ने 17 अक्टूबर 1937 को जवाहरलाल नेहरू को भी पत्र लिखा था।
रमेश ने कहा कि 28 अक्टूबर 1937 को कोलकाता में सीडब्ल्यूसी में वंदे मातरम् को लेकर जो प्रस्ताव हुआ, उस समय महात्मा गांधी, सरदार पटेल, नेताजी, पंडित जवाहर लाल नेहरू, मौलाना अबुल कलाम आजाद आदि बड़े बड़े नेता मौजूदा थे। उन्होंने सवाल किया कि इन बड़े नेताओं पर तुष्टीकरण का आरोप कैसे लगाया जा सकता है?
कांग्रेस सांसद ने कहा कि वंदे मातरम् मूल रूप से 1875 में लिखा गया और 1882 में इसमें कुछ और अंश जोड़े गये। उन्होंने कहा कि वंदे मातरम् के रचयिता बंकिमचंद्र चटर्जी का मानना था कि विज्ञान एवं आध्यात्मिकता का मिलन आवश्यक है।
उन्होंने कहा कि वंदे मातरम् पर चर्चा के जरिये गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर को बदनाम करने की कोशिश की जा रही है। उन्होंने कहा कि बंकिम चंद्र जातिवाद को भारतीय समाज के लिए एक शाप मानते थे।
रमेश ने कहा कि भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी ने पाकिस्तान में जाकर जिन्ना की सराहना की थी तो क्या वह तुष्टिकरण नहीं था? उन्होंने कहा कि इस पूरी चर्चा का मकसद नेहरू को बदनाम करना है।
उन्होंने कहा कि जो लोग बार बार नेहरू का नाम ले रहे हैं वह उन लोगों का अपमान कर रहे हैं जिन्होंने स्वतंत्रता के लिए तब अपनी कुर्बानी दी ‘जब आप लोग ब्रिटिशरों के साथ मिलजुल कर काम करने को तैयार थे।’
तृणमूल कांग्रेस के रीताब्रता बनर्जी ने चर्चा में भाग लेते हुए अपनी बात बांग्ला में रखी और कहा कि ऋषि बंकिम चंद्र चटर्जी ने पूरे भारत में स्वतंत्रता की अलख जलायी थी और स्वयं गुरुदेव टैगोर ने यह कहा था। उन्होंने कहा कि संसद में इस पर चर्चा कराये जाने का मकसद विशुद्ध राजनीतिक है।
भाकपा के संदोष कुमार पी ने कहा कि ‘वंदे मातरम’ का नारा लगाते हुए भगत सिंह, राजगुरू और खुदीराम बोस हंसते हंसते फांसी के फंदे पर झूल गए थे।
उन्होंने कहा कि तथ्यों को तोड़ने मरोड़ने के लिए संसद का इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए और न ही किसी की भी गरिमा कम करने के लिए ‘वंदे मातरम्’ का उपयोग किया जाना चाहिए।
संदोष ने कहा कि अतीत को थाम कर एक दूसरे पर आरोप लगाने के बजाय देश की समस्याओं का समाधान निकाला जाना चाहिए और ‘वंदे मातरम्’ देश हित में इसी तरह अपने कर्तव्य पूरे करते रहने की प्रेरणा देता है।
बीजू जनता दल के मानस रंजन मंगराज ने कहा कि वंदे मातरम् पर चर्चा कराना अच्छी बात है पर यह भी ध्यान रखना चाहिए कि विकास का लाभ सभी को मिले।
झामुमो की महुआ माझी ने कहा कि ‘वंदे मातरम्’ के केवल दो पदों को ही रखने के फैसले को लेकर किसी पर भी दोषारोपण नहीं करना चाहिए बल्कि यह देखना चाहिए कि यह फैसला कई नेताओं ने मिल कर लिया था।
उन्होंने कहा कि पंडित जवाहरलाल नेहरू पर तुष्टिकरण के आरोप लगाए जाते हैं जो इतिहास के किसी भी कालखंड से मेल नहीं खाते। अगर तुष्टिकरण का सिलसिला जारी रहता तो बांग्लादेश अस्तित्व में नहीं आता।
भाजपा के रामचंद्र जांगड़ा ने कहा कि वंदे मातरम् की रचना बांग्ला में की गई थी। ‘‘तब भारत की भौगोलिक रचना अलग थी जिसमें रहने वाले सात करोड़ लोगों को ध्यान में रख कर बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने लिखा ‘सप्त कोटि कंठ....। गुलामी के दौर में मातृभूमि को नमन करते हुए उन्होंने कहा कि मां, तू अबला कैसे हो सकती है। उन्होंने राष्ट्र निर्माण के लिए ज्ञान विज्ञान सहित सभी विधाओं को जरूरी बताते हुए मातृ वंदना की है।’’
आम आदमी पार्टी की स्वाति मालीवाल ने कहा ‘‘वंदे मातरम् हमारे स्वतंत्रता संग्राम की पहली धड़कन है जिसने हमें दुनिया के सबसे ताकतवर साम्राज्य से लड़ने की शक्ति दी। यह भारतीय राष्ट्रीयता की ध्वनि बन गया। भारत अपने शहीदों के अंतिम शब्द कभी नहीं भूल सकता। आज भी हमारे बच्चों की पहली राष्ट्र वंदना वंदे मातरम् होती है।’’
चर्चा में भाग लेते हुए भारतीय जनता पार्टी के नरहरि अमीन ने कहा कि वंदे मातरम् भारतीय साहित्य का एक उत्कृष्ट रत्न है। उन्होंने कहा कि आजादी के आंदोलन से लेकर आज तक इस गीत का भारतीयों के हृदय में विशेष स्थान है।
भाजपा की रमिलाबेन बेचारभाई बारा ने चर्चा में भाग लेते हुए अपनी बात गुजराती में कही। उन्होंने कहा कि इस चर्चा के समय को लेकर प्रश्न उठाना उचित नहीं है।
भाषा
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