सांसदों को ‘व्हिप के झंझट’ से मुक्त कराने के लिए कांग्रेस सांसद तिवारी ने संसद में विधेयक पेश किया
धीरज पारुल
- 07 Dec 2025, 11:26 PM
- Updated: 11:26 PM
(आसिम कमाल)
नयी दिल्ली, सात दिसंबर (भाषा) कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी ने लोकसभा में एक विधेयक पेश किया है, जिसमें “अच्छे कानून बनाने” के लिए संसद सदस्यों को “व्हिप के झंझट” से मुक्ति दिलाकर विधेयकों और प्रस्तावों पर स्वतंत्र रूप से मतदान की अनुमति देने का अनुरोध किया गया है।
शुक्रवार को ‘दल-बदल रोधी कानून’ में संशोधन के लिए गैर-सरकारी विधेयक पेश करने वाले तिवारी ने कहा कि इस विधेयक का मकसद यह पता लगाना है कि लोकतंत्र में प्राथमिकता किसकी होनी चाहिए - उस मतदाता की, जो अपने प्रतिनिधि को चुनने के लिए घंटों धूप में खड़ा होता है, या उस राजनीतिक दल की, जिसके व्हिप का पालन करने के लिए प्रतिनिधि मजबूर हो जाते हैं।”
तिवारी ने इससे पहले 2010 और 2021 में भी यह विधेयक पेश किया था। इसका उद्देश्य संसद सदस्यों को अविश्वास और विश्वास प्रस्तावों जैसे सरकार की स्थिरता से जुड़े प्रस्तावों, स्थगन प्रस्ताव, वित्त विधेयकों और वित्तीय मामलों को छोड़कर अन्य विधेयकों व प्रस्तावों पर स्वतंत्र रूप से मतदान करने की स्वतंत्रता देना है।
तिवारी ने ‘पीटीआई-भाषा’ से कहा, “यह विधेयक इस उद्देश्य से पेश किया गया है कि सांसदों को अपने विवेक, अपने निर्वाचन क्षेत्र और सामान्य समझ के आधार पर फैसले लेने की स्वतंत्रता मिलनी चाहिए। एक निर्वाचित प्रतिनिधि को अपनी पार्टी के व्हिप का पालन करने के बजाय निर्वाचन क्षेत्र के लोगों के हिसाब से काम करना चाहिए।”
उन्होंने कहा, “पार्टी के व्हिप के चलते प्रतिनिधि का कोई महत्व नहीं रह जाता। लिहाजा उसे पूरी तरह से स्वतंत्र रूप से सोचने और काम करने का अधिकार मिलना चाहिए।”
तिवारी ने कहा, ‘‘यह विधेयक विधायिका में विवेक, निर्वाचन क्षेत्र और सामान्य ज्ञान की अहमियत को वापस लाने का प्रयास करता है, ताकि एक निर्वाचित प्रतिनिधि वास्तव में उन लोगों के प्रतिनिधि के रूप में काम करे, जिन्होंने उसे चुना है, न कि अपनी पार्टी की ओर से जारी व्हिप के मोहरे के रूप में, जो जनप्रतिनिधियों को केवल संख्या बल और पीठ के इशारे पर नाचने वाली कठपुतली तक सीमित कर देता है।’’
विधेयक के उद्देश्य और कारणों की व्याख्या में कहा गया है कि इसमें संविधान की दसवीं अनुसूची में संशोधन का अनुरोध किया गया है, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि किसी सांसद की सदस्यता केवल तभी समाप्त की जा सकती है, जब वह विश्वास प्रस्ताव, अविश्वास प्रस्ताव, स्थगन प्रस्ताव, वित्त विधेयक या वित्तीय मामलों से संबंधित मुद्दों पर पार्टी के दिशा-निर्देशों के विपरीत मतदान करे या मतदान से दूर रहे।
विधेयक के उद्देश्य और कारणों की व्याख्या में कहा गया है, “अगर किसी सांसद का राजनीतिक दल उक्त प्रस्तावों, विधेयक या वित्तीय मामलों पर सभापति के पास कोई निर्देश भेजता है, तो उन्हें (सभापति) जितना जल्दी संभव हो सके, सदन में इसकी जानकारी देनी चाहिए।”
विधेयक में कहा गया है, “ऐसी जानकारी साझा करते समय सदन के अध्यक्ष या सभापति को यह भी विशेष रूप से सूचित करना चाहिए कि अगर किसी सांसद ने राजनीतिक दल के निर्देश की अवहेलना की, तो उसकी सदस्यता अपने आप समाप्त हो जाएगी; और सदस्य को अपनी सदस्यता समाप्त होने के बाद, सभापति या सदन के अध्यक्ष के समक्ष अपील करने का अधिकार होगा।”
विधेयक में कहा गया है कि यह अपील सदस्यता खत्म होने की घोषणा की तिथि से 15 दिन के अंदर की जानी चाहिए, और सभापति या सदन के अध्यक्ष को 60 दिन के अंदर अपील पर फैसला करना चाहिए।
तिवारी ने कहा कि विधेयक का उद्देश्य दोहरे लक्ष्य को प्राप्त करना है।
उन्होंने कहा कि एक लक्ष्य यह है कि सरकार की स्थिरता पर प्रभाव न पड़े और दूसरा यह है कि सांसदों व विधायकों को वैधानिक स्वतंत्रता का इस्तेमाल करने का अवसर मिले।
तिवारी ने कहा, “किसी मंत्रालय का संयुक्त सचिव कानून का मसौदा तैयार करता है। यह मसौदा संसद में पेश किया जाता है, एक मंत्री इसे समझाने के लिए एक तैयार बयान पढ़ता है। इसके बाद इसे औपचारिक चर्चा के लिए पेश किया जाता है और फिर व्हिप के जरिये थोपे गए दबाव के कारण सत्तापक्ष के सदस्य आमतौर पर इसके पक्ष में मतदान करते हैं और विपक्षी सदस्य इसके खिलाफ वोट देते हैं।”
जब यह पूछा गया कि क्या विधेयक का उद्देश्य व्हिप के झंझट को खत्म करना और अच्छे कानून बनाने को बढ़ावा देना है, तो तिवारी ने कहा, “जी, बिल्कुल।”
तिवारी ने एक न्यायिक अधिकरण स्थापित करने की भी अपील की, जिसमें 10वीं अनुसूची के मामलों को सुनने के लिए उच्चतम न्यायालय की एक खंडपीठ हो।
उन्होंने कहा कि किसी भी मामले से जुड़ी अपील पांच न्यायाधीशों की पीठ के पास भेजी जाए और इसके बाद खुली अदालत में एक वैधानिक पुनरीक्षण की प्रक्रिया हो।
विधेयक के उद्देश्यों और कारणों के विवरण में कहा गया है कि 10वीं अनुसूची के अधिनियमन के 25 वर्ष बाद, इसमें कुछ अनुकूलन और अधिक सुदृढ़ीकरण की जरूरत है, ताकि यह आज हमारी लोकतांत्रिक प्रक्रिया के लिए अधिक प्रासंगिक हो सके।
लोकसभा और राज्यसभा सदस्यों को उन विषयों पर विधेयक पेश करने की अनुमति है, जिन पर उन्हें लगता है कि सरकार को कानून लाना चाहिए। कुछ मामलों को छोड़कर, प्रस्तावित कानूनों पर सरकार के जवाब के बाद ज्यादातर निजी विधेयक वापस ले लिए जाते हैं।
भाषा धीरज