पुणे की विशेष अदालत ने दाभोलकर हत्याकांड में दो को आजीवन कारावास की सजा सुनाई, तीन बरी
खारी माधव
- 10 May 2024, 05:54 PM
- Updated: 05:54 PM
पुणे, 10 मई (भाषा) पुणे में तर्कवादी डॉ. नरेंद्र दाभोलकर की गोली मारकर हत्या करने के 11 साल बाद एक विशेष दो हमलावरों को दोषी ठहराते हुए शुक्रवार को आजीवन कारावास की सजा सुनाई और सबूतों के अभाव में कथित मुख्य साजिशकर्ता वीरेंद्र सिंह तावड़े को सहित तीन अन्य को बरी कर दिया गया।
गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) से जुड़े मामलों की सुनवाई करने वाले अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश (विशेष न्यायालय) पी.पी. जाधव ने लोगों से खचाखच भरे अदालत कक्ष में आदेश पढ़ते हुए कहा कि अभियोजन पक्ष ने शूटर सचिन अंदुरे और शरद कालस्कर के खिलाफ हत्या तथा साजिश के आरोप साबित कर दिए हैं।
अदालत ने दोषियों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई और प्रत्येक पर पांच-पांच लाख रुपये का जुर्माना लगाया।
अदालत ने सबूतों के अभाव में आरोपी कान-नाक-गला (ईएनटी) रोग सर्जन तावड़े, संजीव पुनालेकर और विक्रम भावे को बरी कर दिया।
मोटरसाइकिल सवार लोगों ने अंधविश्वास के खिलाफ लड़ाई लड़ने वाले कार्यकर्ता डॉ. नरेंद्र दाभोलकर की 20 अगस्त 2013 को उस समय गोली मारकर हत्या कर दी थी जब वह पुणे के ओंकारेश्वर पुल पर सुबह की सैर पर निकले थे।
अदालत ने कहा कि मामले में आतंकवाद विरोधी कानून यूएपीए की कुछ धाराएं लगाई गईं, लेकिन जांच अधिकारी की लापरवाही के कारण ये आरोप साबित नहीं हो पाये।
न्यायाधीश ने कहा कि तावड़े पर मामले का साजिशकर्ता होने का आरोप लगाया गया और उनके खिलाफ संदेह की पर्याप्त गुंजाइश थी, लेकिन अभियोजन पक्ष संदेह को सबूत में बदलने में विफल रहा यही वजह है कि तावड़े को सभी आरोपों से बरी कर दिया गया है।
न्यायाधीश ने कहा, ‘‘भले ही भावे और पुनालेकर के मामले में संदेह की गुंजाइश हो, लेकिन कोई सबूत नहीं है और इसलिए दोनों को सबूत के अभाव में सभी आरोपों से बरी कर दिया गया है।’’
उन्होंने कहा कि अंदुरे और कालस्कर पर दाभोलकर की गोली मारकर हत्या करने का आरोप लगाया गया और धारा 302 (हत्या) और 34 (सामान्य इरादा) के तहत आरोप सही साबित हुए।
न्यायाधीश ने कहा कि इन धाराओं के लिए मृत्युदंड और आजीवन कारावास का प्रावधान है तथा बचाव एवं अभियोजन पक्ष से अपनी-अपनी दलीलें रखने को कहा।
अभियुक्त की ओर से पेश अधिवक्ता वीरेंद्र इचलकरंजीकर ने कहा यह मामला दुर्लभतम श्रेणी का नहीं है, जिस पर सरकारी अधिवक्ता प्रकाश सूर्यवंशी ने कहा कि अभियोजन पक्ष मृत्युदंड की मांग नहीं कर रहा है।
दलीलें सुनने के बाद न्यायाधीश ने अंदुरे और कालस्कर को आजीवन कारावास की सजा सुनाई और उन पर पांच-पांच लाख रुपये का जुर्माना लगाया।
न्यायाधीश ने इस बात पर भी गौर किया कि मुकदमे के दौरान दाभोलकर की हत्या को उचित ठहराते हुए कुछ बयान दिए गए और कहा कि यह अफसोसजनक है।
उन्होंने कहा, ‘‘किसी भी व्यक्ति की हत्या एक दुर्भाग्यपूर्ण बात है। हालांकि, मुकदमे के दौरान बचाव पक्ष के अधिवक्ता की ओर से इस कृत्य को सही ठहराने वाले कुछ बयान आए जो अफसोसजनक थे और अभियुक्तों के अधिवक्ताओं को इस बारे में सोचना चाहिए।’’
फैसले पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए दाभोलकर की बेटी मुक्ता ने कहा कि हत्या का मुख्य साजिशकर्ता अभी भी फरार है और वे इस आदेश के खिलाफ उच्च न्यायालय में अपील करेंगे।
उनके बेटे हामिद दाभोलकर ने कहा कि अगर हत्या के मुख्य साजिशकर्ता को न्याय के कटघरे में नहीं लाया गया तो ऐसी घटनाएं दोहराई जाएंगी।
उन्होंने कहा कि आरोपपत्र से यह स्पष्ट है कि दाभोलकर की हत्या वैचारिक कारणों से की गई थी।
मुकदमे के दौरान अभियोजन पक्ष ने 20 गवाहों जबकि बचाव पक्ष ने दो गवाहों से सवाल-जवाब किए।
शुरुआत में इस मामले की जांच पुणे पुलिस कर रही थी, लेकिन बंबई उच्च न्यायालय के आदेश के बाद 2014 में सीबीआई ने मामले को अपने हाथ में ले लिया और जून 2016 में हिंदू दक्षिणपंथी संगठन सनातन संस्था से जुड़े ईएनटी सर्जन तावड़े को गिरफ्तार कर लिया।
अभियोजन पक्ष के अनुसार तावड़े हत्या के मुख्य साजिशकर्ताओं में से एक थे।
उसने दावा किया कि सनातन संस्था दाभोलकर की संस्था महाराष्ट्र अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति द्वारा किए गए कार्यों का विरोध करती थी। तावड़े और कुछ अन्य आरोपी इसी संस्थान से जुड़े हुए थे।
सीबीआई ने अपने आरोपपत्र में शुरुआत में भगोड़े सारंग अकोलकर और विनय पवार को शूटर बताया था लेकिन बाद में सचिन अंदुरे और शरद कालस्कर को गिरफ्तार किया और एक पूरक आरोपपत्र में दावा किया कि उन्होंने दाभोलकर को गोली मारी थी।
इसके बाद, केंद्रीय एजेंसी ने अधिवक्ता संजीव पुनालेकर और विक्रम भावे को कथित सह-साजिशकर्ता के तौर पर गिरफ्तार किया।
बचाव पक्ष के अधिवक्ताओं में शामिल वीरेंद्र इचलकरंजीकर ने मुकदमे के दौरान शूटर की पहचान को लेकर सीबीआई के लापरवाह रवैये पर सवाल उठाए थे।
आरोपियों पर भारतीय दंड संहिता की धाराओं 120 बी (साजिश), 302 (हत्या), शस्त्र अधिनियम की संबंधित धाराओं और यूएपीए की धारा 16 (आतंकवादी कृत्य के लिए सजा) के तहत मामला दर्ज किया गया।
तावड़े, अंदुरे और कालस्कर जेल में बंद हैं जबकि पुनालेकर और भावे जमानत पर बाहर हैं।
दाभोलकर की हत्या के बाद अगले चार साल में तीन अन्य ऐसे ही कार्यकर्ताओं की हत्याएं हुईं, जिनमें कम्युनिस्ट नेता गोविंद पानसरे (कोल्हापुर, फरवरी 2015), कन्नड विद्वान एवं लेखक एम.एम. कलबुर्गी (धारवाड़, अगस्त 2015) और पत्रकार गौरी लंकेश (बेंगलुरु, सितंबर 2017) की हत्याएं शामिल हैं।
ऐसा अंदेशा था कि इन चारों मामलों के अपराधी एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं।
भाषा
खारी