हकीमपुर में इतिहास अपने आप को दोहरा रहा :जहां कभी लोग आए थे, अब वहीं से लौट रहे
गोला नरेश
- 24 Nov 2025, 02:11 PM
- Updated: 02:11 PM
(प्रदीप्त तापदार)
हकीमपुर (बंगाल), 24 नवंबर (भाषा) हकीमपुर सीमा चौकी तक जाने वाली कीचड़ भरी पगडंडी एक वक्त में 1947 और फिर 1971 में शरणार्थियों के गुजरने का रास्ता हुआ करती थी और तब से दशकों से लोग इस रास्ते से देश में घुस रहे थे जिससे यह गांव सीमा पार हिंसा से बचकर भाग रहे लोगों के लिए एक शरणस्थली में बदल गया।
पश्चिम बंगाल के उत्तर 24 परगना जिले में बांग्लादेश से सटे हकीमपुर गांव के बुजुर्गों का कहना है कि इस नवंबर में इतिहास फिर से खुद को दोहरा रहा है। बस अब दिशा और संदर्भ बदल गए हैं।
पिछले कुछ दिनों से अवैध बांग्लादेशी नागरिक उसी सीमा चौकी की ओर वापस जा रहे हैं, जहां से दशकों पहले पड़ोसी देश से शरणार्थियों का बड़ा जत्था आया था।
सुरक्षा अधिकारियों, ग्रामीणों और प्रवासियों के ही अनुसार, इसकी वजह पश्चिम बंगाल में मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) की जारी प्रक्रिया है।
घर-घर जाकर किए जा रहे सत्यापन के कारण वर्षों से नकली दस्तावेज या फर्जी पहचान पत्र के साथ यहां रह रहे लोग जानते हैं कि वे जांच में पकड़े जाएंगे। कई लोग अधिकारियों के पहुंचने से पहले ही चुपचाप वापस लौटने का फैसला कर रहे हैं।
बांग्लादेश के 1974 के मुक्ति संग्राम के दौरान शरणार्थियों के लिए काम करने वाले 79 वर्षीय हरिपद मंडल ने कहा, ‘‘मैंने कभी हकीमपुर में ऐसा दृश्य नहीं देखा कि इतने अवैध बांग्लादेशी अपने देश लौटने का इंतजार कर रहे हों। यह अभूतपूर्व है।’’
वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार, 10,145 की आबादी और 2,322 मकानों वाला हकीमपुर हमेशा सीमा पार आवाजाही की यादों के साथ जीता आया है। 1971 में यही रास्ता हजारों लोगों को लेकर आया था, जो पाकिस्तान सेना के नरसंहार और ऑपरेशन सर्चलाइट से बचकर भाग रहे थे।
अनिमेष मजूमदार (84) ने याद किया, ‘‘हर आंगन शिविर था, हर घर शरण स्थल था।’’
उन्होंने कहा, ‘‘इतिहास अपने आप को दोहरा रहा है। बस दिशा बदल गयी है।’’
सीमा पार करने का इंतजार कर रहे शरणार्थियों का कहना है कि फैसला स्पष्ट है: एसआईआर टीमों के घर-घर जाकर सत्यापन करने के साथ ‘‘अधिकारियों से बचना अब संभव नहीं है।’’
शाहीदुल (32) ने कहा, ‘‘मैं बनगांव की ईंट भट्टी में काम करता था। पहचान पत्र उधार का है। मैं कानूनी दस्तावेज नहीं दिखा सकता। अब लौटना ही बेहतर है।’’
हकीमपुर में सुरक्षाकर्मियों का कहना है कि शरणार्थियों के लौटने की संख्या स्थिर और स्पष्ट है।
सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) के एक अधिकारी ने नाम न उजागर करने की शर्त पर बताया, ‘‘नवंबर के दूसरे सप्ताह से सीमा पार वापसी करने वालों की संख्या लगातार बढ़ रही है।’’
उन्होंने कहा, ‘‘ज़्यादातर शरणार्थी खुलेआम स्वीकार करते हैं कि वे सालों पहले काम के लिए अवैध रूप से आए थे। वे सभी अपनी वापसी के लिए एसआईआर को जिम्मेदार ठहराते हैं। यह स्वैच्छिक वापसी है, जबरदस्ती नहीं है।’’
भाषा गोला