शीर्ष अदालत ने बंगाल में 25,753 शिक्षकों, अन्य की नियुक्ति को अमान्य ठहराने वाले आदेश पर रोक लगाई
धीरज माधव
- 07 May 2024, 09:45 PM
- Updated: 09:45 PM
नयी दिल्ली, सात मई (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने मंगलवार को कलकत्ता उच्च न्यायालय के उस आदेश पर रोक लगा दी, जिसमें राज्य के सरकारी और सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलों में स्कूल सेवा आयोग (एसएससी) द्वारा की गई 25,753 शिक्षकों और गैर-शिक्षण कर्मचारियों की नियुक्ति को अमान्य कर दिया गया था।
हालांकि, शीर्ष अदालत ने केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) को अपनी जांच जारी रखने और राज्य मंत्रिमंडल के सदस्यों की भी जांच करने की अनुमति दी।
प्रधान न्यायाधीश डी.वाई. चंद्रचूड़, न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा की पीठ ने हालांकि, केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) से कहा कि वह जांच के दौरान किसी संदिग्ध को गिरफ्तार करने जैसी कोई जल्दबाजी भरी कार्रवाई न करे।
शीर्ष अदालत ने साथ ही स्पष्ट कर दिया कि राज्य के जिन शिक्षक और गैर-शिक्षण कर्मचारियों की नियुक्ति उच्च न्यायालय ने रद्द कर दी थीं, उन्हें उस स्थिति में अपने वेतन और अन्य भत्ते वापस करने होंगे अगर वह इस निष्कर्ष पर पहुंचती है कि उनकी भर्ती अवैध थी।
पीठ ने कहा, ‘‘हमारा मानना है कि मामले का शीघ्र निपटान न्याय के हित में होगा। हम तदनुसार निर्देश देते हैं कि कार्यवाही को 16 जुलाई, 2024 को सुनवाई और अंतिम निपटान के लिए सूचीबद्ध किया जाए।’’
शीर्ष अदालत ने अपने आदेश में कहा, ‘‘इस बीच, हम इस न्यायालय द्वारा नौ नवंबर, 2023 के आदेश में दिए गए अंतरिम संरक्षण को जारी रखने के इच्छुक हैं, जो इस स्पष्ट शर्त के अधीन है कि कोई भी व्यक्ति अवैध रूप से नियुक्त पाया गया है और वर्तमान आदेश के परिणामस्वरूप पदस्थापित रहा तो उसे वेतन की पूरी राशि वापस इस आदेश की तारीख और इस अदालत के अंतिम निर्णय से वापस करनी पड़ सकती है।’’
इसमें कहा गया है कि जिस मुद्दे पर बारीकी से विश्लेषण किया जाना चाहिए वह यह है कि क्या जो गलत तरीके से नियुक्ति की गई है, उसे (ईमानदारी से नियुक्ति पाए लोगों से) अलग किया जा सकता है। पीठ ने कहा, अगर ऐसा संभव है तो पूरी प्रक्रिया को रद्द करना गलत होगा।
शीर्ष अदालत ने कहा कि इस बात का भी ध्यान रखना चाहिए कि नौंवीं-10वीं कक्षा को पढ़ा रहे शिक्षक बड़ी संख्या में प्रभावित होंगे। पीठ ने आदेश में कहा, ‘‘यह मानते हुए कि इस तरह का पृथक्करण संभव है, इस अदालत को पृथक्करण निर्धारित करने के लिए तौर-तरीके निर्धारित करने होंगे।’’
इससे पहले न्यायालय ने कथित भर्ती घोटाले को “व्यवस्थागत धोखाधड़ी” करार देते हुए कहा कि अधिकारियों की जिम्मेदारी थी कि वे 25,753 शिक्षकों और गैर-शिक्षण कर्मचारियों की नियुक्ति से संबंधित डिजिटल रिकॉर्ड संभाल कर रखते।
प्रधान न्यायाधीश ने राज्य सरकार की ओर से पेश वकीलों से कहा, “सरकारी नौकरियां बहुत कम हैं... अगर जनता का विश्वास उठ गया तो कुछ भी नहीं बचेगा। यह व्यवस्थागत धोखाधड़ी है। सरकारी नौकरियां आज बहुत कम हैं और उन्हें सामाजिक विकास के रूप में देखा जाता है। अगर नियुक्तियों पर भी सवाल उठने लगें, तो व्यवस्था में क्या बचेगा? लोगों का विश्वास खत्म हो जाएगा, आप इसे कैसे स्वीकार कर सकते हैं?”
पीठ ने कहा कि राज्य सरकार के पास यह दिखाने के लिए कुछ भी नहीं है कि उसके अधिकारियों ने डेटा संभाल कर रखा। पीठ ने डेटा की उपलब्धता के बारे में भी पूछा।
पीठ ने राज्य सरकार के वकीलों से कहा, “या तो आपके पास डेटा है या नहीं है। डिजिटल रूप में दस्तावेज संभाल कर रखना आपकी जिम्मेदारी थी। अब यह जाहिर हो चुका है कि डेटा नहीं है। आपको यह बात पता ही नहीं है कि आपके सेवा प्रदाता ने किसी अन्य एजेंसी की सेवा ली है। आपको उसके ऊपर निगरानी रखनी चाहिए थी।”
शीर्ष अदालत ने कहा कि मामले में शीघ्र सुनवाई की जरूरत है और याचिकाओं को 16 जुलाई को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया जाए।
शीर्ष अदालत ने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता की दलीलों पर संज्ञान लिया कि उच्च न्यायालय के फैसले पर रोक लगाने से चल रही सीबीआई जांच में बाधा आ सकती है और स्पष्ट किया कि केंद्रीय एजेंसी द्वारा जांच सरकारी अधिकारियों और अन्य के खिलाफ बिना किसी दंडात्मक कार्रवाई के जारी रहेगी।
राज्य सरकार का पक्ष रख रहे वरिष्ठ अधिवक्ता राकेश द्विवेदी और एनके कौल ने उच्च न्यायालय द्वारा नियुक्तियों को रद्द करने के खिलाफ दलील दी।
सुनवाई के दौरान वरिष्ठ वकील दुष्यंत दवे ने कलकत्ता उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायधीश अभिजीत गंगोपाध्याय के खिलाफ टिप्पणी की और उच्च अदालत के आदेश पर रोक लगाने की मांग की।
इसपर पीठ ने कहा, ‘‘ मान्वयर दवे, हम माननीय गंगोपाध्याय के आचरण पर सुनवाई नहीं कर रहे हैं। हम यहां सुबह से ही मामले की विस्तृत पक्ष सुन रहे हैं। कृपया कुछ शालीनता बनाए रखें।’’
प्रधान न्यायधीश सुनवाई के दौरान एक बार नाराज हो गए और उन्होंने कहा कि अगर व्यवस्थित सुनवाई नहीं होने दी गई तो वह नोटिस जारी करेंगे और मामले को जुलाई में सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करेंगे।
न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने कहा, ‘‘ हम यहां न्यायमूर्ति गंगोपाध्याय के आचरण की समीक्षा करने के लिए नहीं हैं।’’उन्होंने कहा कि अधिवक्ताओं को मामले के कानूनी पक्ष की चिंता करनी चाहिए और उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के खिलाफ आरोप लगाने से कोई फायदा नहीं होगा।
पीठ ने अपने आदेश में कहा, ‘‘हमारा विचार है कि याचिकाकर्ताओं (राज्य सरकार और अन्य) की दलीलें आगे विचार करने लायक हैं।’’
पीठ कलकत्ता उच्च न्यायालय के 22 अप्रैल के फैसले को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी। उच्च न्यायालय ने पश्चिम बंगाल के सरकारी और सहायता प्राप्त स्कूलों में 25,753 शिक्षकों व गैर-शिक्षण कर्मचारियों की नियुक्ति को अमान्य घोषित कर दिया था।
कलकत्ता उच्च न्यायालय ने नियुक्तियों को रद्द करने के साथ-साथ सीबीआई को नियुक्ति प्रक्रिया की जांच करने और तीन महीने में एक रिपोर्ट सौंपने का भी निर्देश दिया था।
राज्य स्तरीय चयन परीक्षा (एसएलएसटी)-2016 द्वारा विज्ञापित 24,640 रिक्त पदों के लिए 23 लाख से अधिक उम्मीदवारों ने परीक्षा दी। चयन प्रक्रिया में अनियमितताओं का आरोप लगाने वाले कुछ याचिकाकर्ताओं के वकील फिरदौस शमीम ने कहा था कि 24,640 रिक्तियों के लिए कुल 25,753 नियुक्ति पत्र जारी किए गए थे।
भाषा धीरज