बिहार में गंगा प्रदूषण: एनजीटी ने कहा-निकलने वाले मलजल और शोधन में भारी अंतर
अमित माधव
- 06 May 2024, 10:23 PM
- Updated: 10:23 PM
नयी दिल्ली, छह मई (भाषा) राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) ने बिहार में गंगा में प्रदूषण की रोकथाम एवं नियंत्रण से संबंधित एक मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि निकलने वाले मलजल (सीवेज) और उसके शोधन में भारी अंतर है और केवल दो जिले में सीवेज का शोधन किया जा रहा है।
नदी के प्रदूषण के संबंध में बिहार के 38 जिलों से ताजा रिपोर्ट मांगते हुए एनजीटी ने कहा कि राज्य प्राधिकारियों द्वारा गंगा नदी और उसकी सहायक नदियों के बाढ़ क्षेत्र के सीमांकन के लिए "एक भी प्रभावी कदम नहीं" उठाया गया है।
अधिकरण ने राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन (एनएमसीजी) से भी इस बारे में सवाल किये कि बाढ़ और चक्रवात संभावित क्षेत्र में 824 करोड़ रुपये के सीवेज शोधन संयंत्र के निर्माण की अनुमति क्यों दी गई।
एनजीटी अध्यक्ष न्यायमूर्ति प्रकाश श्रीवास्तव की पीठ ने राज्य में जिलेवार अपशिष्ट शोधन की स्थिति के सारांश पर गौर किया और कहा, "उपरोक्त रिपोर्ट विभिन्न स्रोतों से उत्पन्न सीवेज और उसके शोधन में एक बड़ा अंतर दर्शाती है जो गंगा नदी और सहायक नदियों के उच्च स्तर के प्रदूषण का कारण हो सकता है।"
पीठ में न्यायिक सदस्य न्यायमूर्ति सुधीर अग्रवाल और विशेषज्ञ सदस्य ए सेंथिल वेल भी शामिल थे। पीठ ने समीक्षा पर गौर करते हुए कहा कि राज्य में अनुमानित 170 करोड़ लीटर प्रति दिन (एमएलडी) सीवेज निकलता है और पटना एवं भागलपुर को छोड़कर, किसी भी जिले में सीवेज (मलजल) का शोधन नहीं किया जा रहा।
एक मई को पारित एक आदेश में, पीठ ने राज्य द्वारा पहले प्रस्तुत की गई जिला-वार रिपोर्ट में कई विसंगतियों का उल्लेख किया। उसने कहा, "हमें सहायक नदियों या गंगा नदी के नमूनों के संबंध में कोई पूर्ण जल गुणवत्ता विश्लेषण रिपोर्ट नहीं मिली है। केवल मल ‘कोलीफॉर्म’ से संबंधित रिपोर्ट को रिकॉर्ड पर रखा गया है जो अपेक्षित मापदंडों से कहीं अधिक है।"
अधिकरण ने कहा, "इसलिए, राज्य या जिला अधिकारियों को निर्देश दिया जाता है कि वे उस बिंदु पर नमूने लेकर जल नमूना विश्लेषण रिपोर्ट प्रस्तुत करें जहां सहायक नदी गंगा नदी में मिलती है और साथ ही राज्य में गंगा नदी के प्रवेश और (उसके) निकास बिंदु से भी बिंदु नमूने लिये जाएं।’’
बाढ़ क्षेत्रों के सीमांकन में "कठिनाई" के बारे में बिहार राज्य के वकील की दलीलों पर ध्यान देते हुए, अधिकरण ने कहा कि वकील ने कोई "ठोस कारण" नहीं बताया और "राज्य प्राधिकारियों द्वारा गंगा नदी और उसकी सहायक नदियों के बाढ़ क्षेत्र के सीमांकन के लिए एक भी प्रभावी कदम नहीं उठाया गया है।"
मौजूदा स्थिति के समाधान के लिए, उसने संबंधित प्राधिकारियों से भारतीय सर्वेक्षण विभाग से 'एक-मीटर समोच्च मानचित्र' प्राप्त करने और बाढ़ क्षेत्र के सीमांकन के लिए उचित कदम उठाने को कहा।
हरित अधिकरण ने कहा कि एनएमसीजी द्वारा दीघा (पटना में) में एक एसटीपी (मलजल शोधन संयंत्र) के निर्माण के लिए 824 करोड़ रुपये जारी किए गए थे, लेकिन ठेकेदार की पर्यावरण और सामाजिक मूल्यांकन रिपोर्ट के अनुसार, संयंत्र बाढ़ और चक्रवात के प्रति संवेदनशील था।
उसने कहा, "एनएमसीजी के वकील ने यह निर्देश प्राप्त करने के लिए समय मांगा है कि ऐसे स्थान पर दीघा एसटीपी स्थापित करने की अनुमति क्यों दी गई है। यदि आवश्यकता पड़ी, तो एनएमसीजी, अन्य सभी संबंधित प्राधिकारियों के परामर्श से, ऐसे स्थान पर एसटीपी की स्थापना की अनुमति देने के अपने निर्णय की छह सप्ताह के भीतर समीक्षा कर सकता है।’’
अधिकरण ने कहा, "सभी 38 जिलों द्वारा ताजा रिपोर्ट पेश की जाए।"
मामले की अगली सुनवायी की तिथि 15 अक्टूबर निर्धारित की गई।
अधिकरण ने पिछले साल पांच राज्यों में गंगा और उसकी सहायक नदियों के प्रदूषण का मुद्दा उठाया था।
बंगाल की खाड़ी में मिलने से पहले गंगा उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल से होकर बहती है।
भाषा अमित