न्यायालय हत्या के मामले में मृत्युदंड पाए व्यक्ति की सजा पर पुनर्विचार करने पर सहमत हुआ
धीरज माधव
- 26 Aug 2025, 08:54 PM
- Updated: 08:54 PM
नयी दिल्ली, 26 अगस्त (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने एक नाबालिग से दुष्कर्म के बाद हत्या के मामले में मृत्युदंड पाए व्यक्ति की सजा पर पुनर्विचार करने को याचिकाकर्ता की इस दलील के आधार पर सहमत हो गया कि उसे सजा सुनाते समय 2022 में शीर्ष अदालत की ओर से तय मानदंडों का पालन नहीं किया गया है। न्यायमूर्ति विक्रम नाथ, न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने कहा कि यदि सजा के समय 2022 में शीर्ष अदालत द्वारा तय किये गए दंड संबंधी दिशानिर्देशों का पालन नहीं किया गया तो सजा के बिंदु पर मामले को फिर से खोला जा सकता है।
नागपुर के रहने वाले वसंत संपत दुपारे को अप्रैल 2008 में चार साल की बच्ची के साथ बलात्कार और हत्या का दोषी करार देते हुए मौत की सजा सुनाई गई थी।
शीर्ष अदालत ने दोषसिद्धि को बरकरार रखा, लेकिन सजा को लेकर 2017 में प्रस्तुत दृष्टिकोण को फिलहाल दरकिनार कर दिया और मामले को उचित निर्देशों के लिए प्रधान न्यायाधीश बी आर गवई के समक्ष भेज दिया।
अभियोजन पक्ष के मुताबिक दुपारे ने लड़की को चॉकलेट का प्रलोभन दिया और उससे दुष्कर्म किया। उसने बच्ची की हत्या करने के बाद पहचान छिपाने के इरादे से उसके चेहरे को विकृत कर दिया था।
दुपारे की याचिका को स्वीकार करते हुए, शीर्ष अदालत ने मनोज बनाम मध्य प्रदेश मामले में दिये गए 2022 के फैसले का हवाला दिया, जिसमें उसने कई दिशानिर्देश जारी किए थे और सुनवाई अदालत को मौत की सजा देने से पहले अभियुक्त की मनोरोग और मनोवैज्ञानिक आकलन रिपोर्ट प्राप्त करने का निर्देश दिया था।
पीठ ने 25 अगस्त को कहा, ‘‘हम मानते हैं कि भारत के संविधान का अनुच्छेद 32 इस न्यायालय को मृत्युदंड से संबंधित मामलों में सजा सुनाने के चरण को फिर से विचार करने का अधिकार देता है, जहां आरोपी को बिना यह सुनिश्चित किए कि मनोज (सुप्रा) में दिए गए दिशानिर्देशों का पालन किया गया है मृत्युदंड की सजा सुनाई गई है,।’’
दुपारे की सजा की पुष्टि उच्चतम न्यायालय ने 26 नवंबर, 2014 को की थी और उसकी पुनर्विचार याचिका भी तीन मई, 2017 को खारिज कर दी गई थी।
इसके बाद उसने महाराष्ट्र के राज्यपाल और राष्ट्रपति के समक्ष दया याचिकाएं दायर कीं, जिन्हें क्रमशः 2022 और 2023 में खारिज कर दिया गया।
भाषा धीरज