आवारा कुत्तों को नसबंदी के बाद आश्रय स्थलों से छोड़ दिया जाए : न्यायालय
पारुल नरेश
- 22 Aug 2025, 05:56 PM
- Updated: 05:56 PM
नयी दिल्ली, 22 अगस्त (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने दिल्ली-एनसीआर (राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र) में आवारा कुत्तों को आश्रय स्थलों से छोड़ने पर रोक संबंधी अपने निर्देश को “बहुत कठोर” बताते हुए शुक्रवार को इसमें संशोधन किया।
शीर्ष अदालत ने आदेश दिया कि पकड़े गए आवारा कुत्तों को नसबंदी और कृमिहरण के बाद वापस उन्हीं क्षेत्रों में छोड़ दिया जाए, जहां से उन्हें उठाया गया था।
न्यायमूर्ति विक्रम नाथ की अध्यक्षता वाली तीन न्यायाधीशों की विशेष पीठ ने आवारा कुत्तों से जुड़े मामले का दायरा दिल्ली-एनसीआर से आगे बढ़ाते हुए सभी राज्यों और केंद्र-शासित प्रदेशों को इसमें पक्षकार बनाने का निर्देश दिया।
इस पीठ में न्यायमूर्ति नाथ के अलावा न्यायमूर्ति संदीप मेहता और न्यायमूर्ति एनवी अंजारिया भी शामिल हैं।
हालांकि, पीठ ने स्पष्ट किया कि नगर निगम अधिकारी दिल्ली, गाजियाबाद, नोएडा, फरीदाबाद और गुरुग्राम के सभी इलाकों से आवारा कुत्तों को उठाने और उनके लिए तुरंत आश्रय स्थल बनाने के 11 अगस्त के निर्देश का पालन करना जारी रखेंगे।
उसने कहा कि आवारा कुत्तों को सड़कों से उठाकर आश्रय स्थलों में स्थायी रूप से स्थानांतरित करने के दो न्यायाधीशों की पीठ के 11 अगस्त के निर्देश को फिलहाल स्थगित रखा जाएगा।
पीठ ने कहा, “पकड़े गए आवारा कुत्तों की नसबंदी की जाएगी, उनका कृमिहरण एवं टीकाकरण किया जाएगा और उन्हें उसी क्षेत्र में वापस छोड़ दिया जाएगा, जहां से उन्हें उठाया गया था।”
पीठ ने स्पष्ट किया कि रेबीज से संक्रमित या रेबीज से संक्रमित होने की आशंका वाले और आक्रामक व्यवहार वाले आवारा कुत्तों पर यह आदेश लागू नहीं होगा।
उसने कहा कि आवारा कुत्तों की पूरी आबादी को सड़कों से हटाकर आश्रय स्थलों में रखने का कोई भी निर्देश देने से पहले नगर निकायों के पास उपलब्ध मौजूदा बुनियादी ढांचे और मानव संसाधनों का पता लगाना जरूरी है।
पीठ ने कहा, “मौजूदा बुनियादी ढांचे का मूल्यांकन किए बिना सभी आवारा कुत्तों को सड़कों से उठाकर आश्रय स्थल/बाड़े में रखने का निर्देश देने से दुविधापूर्ण स्थिति पैदा हो सकती है, क्योंकि ऐसे निर्देशों का पालन करना असंभव हो सकता है।”
मामले में समग्र दृष्टिकोण अपनाने की जरूरत को रेखांकित करते हुए न्यायालय ने 11 अगस्त के अपने निर्देशों में संशोधन किया। उसने कहा, “11 अगस्त 2025 के फैसले में दिए गए निर्देश, जिसके तहत उपचारित और टीकाकृत कुत्तों को (आश्रय स्थलों से) छोड़ने पर रोक लगाई गई थी, हमारी राय में बहुत कठोर प्रतीत होते हैं।”
शीर्ष अदालत ने नगर निकायों को प्रत्येक नगरपालिका वार्ड में आवारा कुत्तों के लिए समर्पित भोजन क्षेत्र बनाने के निर्देश दिए, जहां लोग उन्हें खाना खिला सकें।
पीठ ने कहा कि संबंधित नगरपालिका वार्ड में आवारा कुत्तों की आबादी और सघनता को ध्यान में रखते हुए भोजन क्षेत्र बनाए या चिह्नित किए जाने चाहिए।
उसने कहा, “निर्धारित भोजन क्षेत्रों के पास नोटिस बोर्ड लगाए जाने चाहिए, जिन पर इस बात का स्पष्ट जिक्र हो कि आवारा कुत्तों को केवल ऐसे क्षेत्रों में ही खाना खिलाया जाएगा। आवारा कुत्तों को किसी भी सूरत में सड़कों पर खाना खिलाने की अनुमति नहीं दी जाएगी।”
पीठ ने कहा कि निर्देशों का उल्लंघन कर सड़कों पर आवारा कुत्तों को खाना खिलाते पाए जाने वाले लोगों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जाएगी।
न्यायालय ने यह निर्देश जारी करते समय आवारा कुत्तों को अनियमित तरीके से भोजन दिए जाने के कारण होने वाली अप्रिय घटनाओं से जुड़ी रिपोर्ट का हवाला दिया।
उसने सड़कों और सार्वजनिक जगहों पर आवारा कुत्तों को खाना खिलाने की प्रथा को समाप्त करने पर जोर दिया, क्योंकि इससे वहां से गुजरने वाले राहगीरों को काफी परेशानियों का सामना करना पड़ता है।
पीठ ने प्रत्येक नगरपालिका प्राधिकरण को निर्देशों के उल्लंघन की घटनाओं की शिकायत करने के लिए एक समर्पित हेल्पलाइन बनाने का भी आदेश दिया।
उसने कहा कि हेल्पलाइन पर शिकायत मिलने के बाद संबंधित व्यक्ति या संगठन के खिलाफ उचित कार्रवाई की जानी चाहिए।
पीठ ने कहा, “कोई भी व्यक्ति या संगठन उपरोक्त निर्देशों के प्रभावी कार्यान्वयन में कोई बाधा या रुकावट पैदा नहीं करेगा।”
उसने कहा कि सरकारी अधिकारी के काम में किसी भी तरह की अड़चन डालने पर उल्लंघनकर्ता को मुकदमे का सामना करना पड़ेगा।
पीठ ने आवारा कुत्तों को आश्रय स्थलों में स्थानांतरित करने के निर्देश को चुनौती देने वाले प्रत्येक कुत्ता प्रेमी और एनजीओ को शीर्ष अदालत की रजिस्ट्री में सात दिन के भीतर क्रमश: 25,000 रुपये और दो लाख रुपये जमा करने का निर्देश दिया।
उसने कहा कि ऐसा न करने पर संबंधित कुत्ता प्रेमी और एनजीओ को मामले में आगे पेश होने की अनुमति नहीं दी जाएगी।
पीठ ने कहा, “जमा की गई राशि का इस्तेमाल संबंधित नगर निकायों के तत्वावधान में आवारा कुत्तों के लिए बुनियादी ढांचे और सुविधाओं के निर्माण में किया जाना चाहिए।”
न्यायालय ने पशु जन्म नियंत्रण (एबीसी) नियमों के अनुपालन के मकसद से नगर निकायों के अधिकारियों को आज की तारीख तक उपलब्ध कुत्ता आश्रय स्थलों, पशु चिकित्सकों, कुत्ते पकड़ने वाले कर्मियों, विशेष रूप से संशोधित वाहनों और पिंजरों जैसे संसाधनों के पूर्ण आंकड़ों के साथ एक हलफनामा दायर करने का निर्देश दिया।
उसने कहा कि इच्छुक पशु प्रेमियों को आवारा कुत्तों को गोद लेने के लिए संबंधित नगर निकाय में आवेदन करने की छूट होनी चाहिए और यह सुनिश्चित करना आवेदक की जिम्मेदारी होगी कि गोद लिया गया कुत्ता सड़कों पर वापस न आए।
पीठ ने कहा कि विभिन्न उच्च न्यायालयों में समान मुद्दों से संबंधित कई याचिकाएं या स्वत: संज्ञान याचिकाएं लंबित हैं।
उसने कहा, “लिहाजा, रजिस्ट्री सभी उच्च न्यायालयों के रजिस्ट्रार जनरल से ऐसी लंबित रिट याचिकाओं के बारे में जानकारी मांगेगी। इसके बाद ये रिट याचिकाएं मुख्य मामले के साथ विचार के लिए इस न्यायालय में स्थानांतरित हो जाएंगी।”
पीठ ने सभी राज्यों और केंद्र-शासित प्रदेशों को पक्षकार बनाया तथा कहा कि एबीसी नियम पूरे देश में समान रूप से लागू होते हैं।
पीठ ने मामले की अगली सुनवाई आठ हफ्ते बाद निर्धारित की।
शीर्ष अदालत ने यह आदेश 28 जुलाई को मीडिया में आई एक रिपोर्ट पर स्वतः संज्ञान लेते हुए पारित किया, जिसमें कहा गया था कि दिल्ली में आवारा कुत्तों के काटने से रेबीज संक्रमण फैल रहा है, खासकर बच्चों में।
भाषा पारुल