आदित्यनाथ सरकार की स्कूल विलय नीति से उप्र में राजनीतिक विवाद छिड़ा
चंदन आनन्द रंजन नोमान
- 17 Aug 2025, 04:26 PM
- Updated: 04:26 PM
(चंदन कुमार)
लखनऊ, 17 अगस्त (भाषा) उत्तर प्रदेश में ऐसे स्कूलों को विलय करने की कवायद शुरू की गई, जिनमें बच्चों की संख्या कम है, लेकिन इसने राजनीतिक विवाद का रूप ले लिया है। इस मुद्दे को लेकर विरोध प्रदर्शन हुए, पोस्टर युद्ध छिड़ा, प्राथमिकियां दर्ज की गईं तथा विधानसभा में तीखी चर्चा हुई।
योगी आदित्यनाथ सरकार द्वारा जून में घोषित स्कूल विलय नीति के तहत, 50 से कम छात्रों वाले 10,000 से अधिक प्राथमिक और उच्च प्राथमिक विद्यालयों को एक किलोमीटर की परिधि में स्थित निकटवर्ती विद्यालयों में विलय किया जाएगा।
पिछले छह हफ़्तों से, इन विद्यालयों से जुड़ा मुद्दा थमने का नाम नहीं ले रहा है। मुद्दे को लेकर शुरुआती धरना-प्रदर्शन, अदालती दांव-पेच और पोस्टर युद्ध के बाद यह सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और विपक्षी दलों के बीच विवाद का विषय बन गया है।
यह मुद्दा हाल में संपन्न उत्तर प्रदेश विधानसभा के सत्र में भी प्रमुखता से उठा, जहां मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और उनकी सरकार ने इस फैसले का पुरजोर बचाव किया। फिर भी, ‘स्कूल विलय’ की नीति पर राजनीति जारी है।
अधिकारियों का कहना है कि यह छात्रों की बेहतरी के लिए है जिससे पर्याप्त स्कूलों में शिक्षक सुनिश्चित होंगे।
विपक्ष ने इसे सरकारी स्कूलों को बंद करने की साजिश करार दिया है जिससे ग्रामीण और हाशिए पर रहने वाले बच्चे शिक्षा प्रणाली से वंचित हो जाएंगे।
सरकारी स्कूलों में नामांकन में भारी गिरावट के बाद जून में इस नीति की औपचारिक घोषणा की गई। 2022-23 में नामांकन 1.92 करोड़ था, लेकिन वर्तमान शैक्षणिक सत्र में यह घटकर एक करोड़ से थोड़ा अधिक रह गया है।
इस योजना के तहत, शिक्षकों, स्मार्ट कक्षाओं और अन्य सुविधाओं का बेहतर उपयोग करने के लिए छोटे स्कूलों को बड़े "एकीकृत परिसरों" में मिलाने की प्रक्रिया शुरू की गई।
अपर मुख्य सचिव (बेसिक शिक्षा) दीपक कुमार ने कहा कि यह कदम हिमाचल प्रदेश और गुजरात के मॉडल का अनुसरण करता है और राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के अनुरूप है।
स्कूल मिलाने की इस नीति को शुरू में ही कानूनी चुनौतियों का सामना करना पड़ा। हालांकि, इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने इन याचिकाओं को खारिज कर दिया और कहा कि अधिनियम लचीलेपन की अनुमति देता है और अधिकारों के उल्लंघन का कोई सबूत नहीं मिला।
सरकार भले ही अदालत में जीत गई हो, लेकिन उसे राजनीतिक आलोचनाओं का सामना करना पड़ रहा है।
राज्य के मुख्य विपक्षी दल समाजवादी पार्टी (सपा) ने पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव के नेतृत्व में इस कदम के खिलाफ अभियान शुरू किया जिसे कांग्रेस और आम आदमी पार्टी समेत लगभग विपक्षी दलों का समर्थन मिला है। वहीं, मायावती के नेतृत्व वाली बहुजन समाज पार्टी (बसपा) भी सरकार के इस फैसले के विरोध में है।
यादव ने इसे पिछड़े वर्ग, दलित और अल्पसंख्यकों (पीडीए) को शिक्षा और उनकी राजनीतिक आवाज से वंचित करने की "गहरी साजिश" करार दिया।
लखनऊ में लगे सपा के एक पोस्टर में लिखा था, "यह कैसा रामराज्य है? स्कूल बंद करो, शराब की दुकानें खोलो।"
ग्रामीण ज़िलों में, जिन स्कूलों का विलय कर दिया गया था, उनके बच्चों के लिए सपा कार्यकर्ताओं ने अनौपचारिक शिक्षण केंद्र के तौर पर ‘पीडीए पाठशालाए’ शुरू कीं।
इनमें से कुछ में "ए फॉर अखिलेश" और "एम फॉर मुलायम सिंह यादव" जैसे "राजनीतिकृत अक्षर" इस्तेमाल किए गए थे, जिसके बाद सरकार ने पार्टी पर बच्चों का दुरुपयोग करके दुष्प्रचार करने का आरोप लगाया। सहारनपुर, , शाहजहांपुर, वाराणसी, मऊ, प्रयागराज और लखनऊ में सपा नेताओं के खिलाफ अनधिकृत कक्षाएं चलाने के आरोप में प्राथमिकी दर्ज की गई हैं। सपा इसे उत्पीड़न बता रही है, जबकि सरकार बच्चों की शिक्षा को राजनीतिकरण से बचाने के लिए इसे जरूरी बता रही है।
आम आदमी पार्टी के राज्यसभा सदस्य संजय सिंह ने "मधुशाला नहीं, पाठशाला चाहिए" नारे के साथ "स्कूल बचाओ" अभियान शुरू किया है।
सिंह ने ‘पीटीआई-भाषा’ से कहा, "हम इस कदम के खिलाफ कई जिलों में विरोध रैलियां कर रहे हैं। इस कदम से प्रभावित स्थानीय लोग हमारे साथ जुड़ रहे हैं। हम आने वाले दिनों में इस मुद्दे को उठाते रहेंगे ताकि इन लोगों को न्याय मिल सके।"
उन्होंने कहा कि पार्टी आगामी पंचायत चुनावों में इसे मुद्दा बनाएगी।
विधानसभा सत्र के पहले दिन, भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने लखनऊ में सपा के "पीडीए पाठशाला" अभियान पर तीखा पलटवार करते हुए पोस्टर लगाए।
भाजपा से विधान परिषद के सदस्य (एमएलसी) और प्रदेश महासचिव सुभाष यदुवंश द्वारा प्रायोजित इन पोस्टरों में आरोप लगाया गया था कि सपा की ‘पीडीए पाठशालाएं’ "ए फॉर अखिलेश और डी फॉर डिंपल" पढ़ा रही हैं।
भाजपा ने अखिलेश यादव से पूछा कि राज्य में कौन सा अभिभावक चाहेगा कि उसके बच्चे को ऐसा पाठ्यक्रम पढ़ाया जाए।
बढ़ते दबाव के बीच, राज्य के बेसिक शिक्षा मंत्री संदीप सिंह और भाजपा के अन्य नेताओं ने प्रेस वार्ता कर स्पष्टीकरण दिया। उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि किसी भी स्कूल को स्थायी रूप से बंद नहीं किया जा रहा है और सिर्फ ऐसे स्कूलों का विलय किया जा रहा जहां 50 से कम छात्र हैं।
सिंह ने स्पष्ट किया, "अगर विलय से आवागमन में दिक्कतें आती हैं, तो इसे वापस लिया जा सकता है।”
उन्होंने कहा खाली इमारतों को 15 अगस्त तक बाल वाटिकाओं (प्री-प्राइमरी स्कूल) में बदल दिया जाएगा तथा शिक्षकों का कोई भी पद समाप्त नहीं किया जाएगा और छात्र-शिक्षक अनुपात बनाए रखने के लिए ज़रूरत पड़ने पर नई नियुक्ति की जाएंगी।
मुख्यमंत्री आदित्यनाथ ने खुद विधानसभा में चर्चा में हिस्सा लिया और स्कूल "बंद" करने के आरोप को खारिज कर दिया और इस नीति को शिक्षा के आधुनिकीकरण के व्यापक अभियान का हिस्सा बताया।
उन्होंने कहा, "2017 से पहले, सरकारी स्कूलों में बुनियादी ढांचे का अभाव था और बच्चों के स्कूल छोड़ने की दर देश में सबसे ज़्यादा थी। आज, हम छात्र-शिक्षक अनुपात 22:1 बनाए रखने और बेहतर सुविधाएं प्रदान करने के लिए परिसरों का एकीकरण कर रहे हैं। यह शिक्षा को मजबूत कर रहा है, कमजोर नहीं।"
मुख्यमंत्री ने सरकारी स्कूलों में एलकेजी, यूकेजी और नर्सरी कक्षाओं की शुरुआत के साथ-साथ कुपोषित बच्चों के लिए 100 करोड़ रुपये के पोषण मिशन की भी घोषणा की।
यह नीति विधानसभा के मानसून सत्र की कार्यवाही में छाई रही, जहां सपा विधायकों ने सरकार पर शिक्षा की पहुंच बढ़ाने के बजाय उसे कम करने का आरोप लगाया।
विपक्ष के नेता माता प्रसाद पांडे ने आरोप लगाया कि 29,000 स्कूलों का विलय कर दिया गया है और 10,000 को बंद कर दिया गया है। उन्होंने दावा किया कि यह गरीबों को शिक्षा से वंचित करने का जानबूझकर किया गया एक प्रयास है।
सपा विधायकों ने इस मुद्दे को इन व्यापक आरोपों से भी जोड़ा कि भाजपा रोजगार सृजन और ग्रामीण विकास की उपेक्षा कर रही है।
मुख्यमंत्री ने पलटवार करते हुए सपा पर अपने कार्यकाल के दौरान "नकल माफिया" चलाने और बुनियादी ढांचे की ज़रूरतों की अनदेखी करने का आरोप लगाया।
रायबरेली के एक शिक्षक ने ‘पीटीआई-भाषा’ को बताया कि स्कूलों के दूर होने पर बच्चों के पढ़ाई छोड़ने आशंका रहती है।
भाषा चंदन आनन्द रंजन