सामुदायिक वन संसाधन प्रबंधन के लिए वन विभाग नोडल एजेंसी नहीं: केंद्र
अमित प्रशांत
- 17 Aug 2025, 04:34 PM
- Updated: 04:34 PM
नयी दिल्ली, 17 अगस्त (भाषा) जनजातीय मामलों के मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि सामुदायिक वन संसाधन प्रबंधन योजनाएं (सीएफआरएमपी) ग्राम सभाओं द्वारा, उनकी सामुदायिक वन संसाधन प्रबंधन समितियों (सीएफआरएमसी) के माध्यम से, वन अधिकार अधिनियम और उसके नियमों के अनुसार तैयार की जानी चाहिए, वन विभाग या किसी अन्य एजेंसी द्वारा नहीं।
छत्तीसगढ़ के मुख्य सचिव को 14 अगस्त को लिखे पत्र में मंत्रालय ने राज्य के वन विभाग और जनजातीय विकास विभाग द्वारा सीएफआर प्रबंधन पर मार्गदर्शन मांगे जाने के संबंध में हाल ही में भेजे गए पत्र का जवाब दिया।
मंत्रालय ने कहा कि 12 सितंबर, 2023 को जारी दिशा-निर्देशों के साथ-साथ वन अधिकार नियमों के नियम 4(1)(ई) और 4(1)(एफ) में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि ग्राम सभा द्वारा गठित सीएफआरएमसी, अपनी ओर से सीएफआरएमपी तैयार करने के लिए जिम्मेदार है।
मंत्रालय की यह प्रतिक्रिया छत्तीसगढ़ के प्रधान मुख्य वन संरक्षक (पीसीसीएफ) द्वारा 15 मई को जारी एक परिपत्र पर उठे विवाद के बीच आयी है। उसमें कहा गया था कि जब तक जनजातीय मामलों के मंत्रालय (एमओटीए) से एक मॉडल योजना प्राप्त नहीं हो जाती, तब तक वन विभाग सामुदायिक वन भूमि का प्रबंधन करेगा।
परिपत्र में यह भी निर्देश दिया गया है कि कोई भी विभाग, गैर सरकारी संगठन (एनजीओ) या निजी संगठन सीएफआरआर द्वारा आवंटित वन क्षेत्रों में तब तक कोई कार्य नहीं करेगा, जब तक कि ऐसी कोई योजना उपलब्ध न करा दी जाए।
हालांकि, जनजातीय मामलों के मंत्रालय ने अब स्पष्ट किया है कि यद्यपि वह सीएफआर प्रबंधन के लिए दीर्घकालिक दृष्टि दस्तावेज पर काम कर रहा है, तथापि वह पूरे देश में भूदृश्यों और स्थानीय संदर्भों की विविधता को मान्यता देता है।
उसने कहा कि इसलिए, हो सकता है कि एक "एकल मानकीकृत मसौदा योजना व्यावहारिक नहीं हो।’’
इसके बजाय, मंत्रालय ने सिफारिश की है कि ग्राम सभाएं अपनी स्वयं की सीएफआरएमपी विकसित करने के लिए केंद्र सरकार की एक प्रमुख योजना, धरती आबा-जनजातीय ग्राम उत्कर्ष अभियान (डीए-जेजीयूए) के संचालन दिशानिर्देशों में दिए गए सांकेतिक ढांचे का उपयोग करें। इन योजनाओं को स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार संशोधित और अनुकूलित किया जा सकता है।
संयुक्त सचिव अनंत प्रकाश पांडे द्वारा हस्ताक्षरित पत्र में इस बात पर भी जोर दिया गया है कि वन विभाग की भूमिका ‘‘इस प्रक्रिया में एक सुविधाकर्ता’’ की है। उसने यह भी सुझाव दिया कि क्षेत्रीय स्तर के मामलों के समाधान के लिए मुख्य सचिव की अध्यक्षता में राज्य स्तरीय निगरानी समिति की बैठकें नियमित रूप से आयोजित की जाएं।
आठ जुलाई को लिखे एक अलग पत्र में छत्तीसगढ़ के आदिवासी विकास विभाग ने जनजातीय कार्य मंत्रालय को पत्र लिखकर पीसीसीएफ के परिपत्र पर स्पष्टीकरण मांगा था।
विभाग ने बताया कि सीएफआर मामलों के लिए नोडल एजेंसी के रूप में वन विभाग को निर्दिष्ट करना, जैसा कि 15 मई के परिपत्र में उल्लिखित है, सामान्य प्रशासन विभाग के 1 जून, 2020 के आदेश द्वारा पहले ही संशोधित किया जा चुका है। उस आदेश में स्पष्ट किया गया था कि वन विभाग की भूमिका समन्वय सहायता तक सीमित है, जबकि आदिवासी और अनुसूचित जाति विकास विभाग राज्य में वन अधिकार अधिनियम को लागू करने के लिए नोडल एजेंसी बना हुआ है।
आठ जुलाई के पत्र में यह भी उल्लेख किया गया है कि छत्तीसगढ़ एफआरए को लागू करने में अग्रणी रहा है और डीए-जेजीयूए पहल के तहत सीएफआरएमपी विकसित करने के प्रयास जारी हैं।
जनजातीय मामलों के मंत्रालय के 14 अगस्त के पत्र में स्पष्ट किया गया है कि एक बार ग्राम सभा द्वारा सीएफआरएमपी को मंजूरी मिलने के बाद, जिला स्तरीय समिति या जिला स्तरीय निगरानी समिति की यह ज़िम्मेदारी बन जाती है कि वह इसे वन विभाग की कार्य योजनाओं, सूक्ष्म योजनाओं या प्रबंधन योजनाओं के साथ एकीकृत करे। इसमें कहा गया है कि समुदाय द्वारा तैयार की गई योजनाएं और पहल व्यापक संरक्षण और प्रबंधन व्यवस्थाओं के लिए प्रमुख सुझाव के रूप में काम कर सकती हैं।
कार्यकर्ताओं ने चिंता जतायी है कि छत्तीसगढ़ वन विभाग का हालिया परिपत्र वन प्रशासन को लोकतांत्रिक बनाने के एफआरए के मूल उद्देश्य को कमजोर करता है।
भाषा अमित