लोकसभा चुनाव से पहले सीएए के लागू होने से बंगाल में राजनीतिक पैंतरेबाजी का मंच तैयार
संतोष अविनाश
- 12 Mar 2024, 06:21 PM
- Updated: 06:21 PM
(प्रदीप्त तापदार)
कोलकाता, 12 मार्च (भाषा) लोकसभा चुनाव से ठीक पहले नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) के लागू होने से सांप्रदायिक धुव्रीकरण तेज होने का अनुमान है जो पश्चिम बंगाल में चुनावी दिशा को काफी हद तक प्रभावित करेगा और इस स्थिति का राजनीतिक फायदा उठाने के लिए भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) दोनों तैयार दिखते हैं।
वर्ष 2019 में संसद द्वारा पारित सीएए का उद्देश्य पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से 31 दिसंबर, 2014 से पहले भारत आए गैर-मुस्लिम प्रवासियों को नागरिकता प्रदान करने में तेजी लाना है।
सीएए से जुड़े नियमों की अधिसूचना सोमवार को जारी होने के साथ इन देशों में उत्पीड़न के शिकार गैर-मुस्लिम प्रवासी (हिंदू, सिख, जैन, बौद्ध, पारसी और ईसाई) अब भारतीय नागरिकता प्राप्त करने के पात्र हैं।
बंगाल भाजपा आगामी चुनाव में सीएए को एक महत्वपूर्ण मुद्दे के रूप में देखती है, खासकर मतुआ-प्रभुत्व वाले निर्वाचन क्षेत्रों में पार्टी को इससे लाभ मिलने की उम्मीद है।
इसके विपरीत टीएमसी नेता चुनावी विमर्श को गढ़ने में सीएए की क्षमता को तो स्वीकार करते हैं, लेकिन भाजपा की कथित ‘बंगाली विरोधी’ भावनाओं के खिलाफ अपने रुख को उजागर करने के लिहाज से इसका लाभ उठाने की भी मंशा रखते हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों की राय है कि 12-15 निर्वाचन क्षेत्रों में सीएए का काफी असर पड़ सकता है, खासकर मतुआ और अल्पसंख्यक प्रभाव वाले क्षेत्रों में।
पश्चिम बंगाल से घुसपैठियों को बाहर निकालने के लिए राष्ट्रीय नागरिक पंजी (एनआरसी) की मांग की जा रही थी जो बांग्लादेश के साथ 2000 किमी से अधिक लंबी सीमा साझा करता है।
सीएए पर अमल 2019 के लोकसभा चुनावों में भी भाजपा का एक प्रमुख चुनावी मुद्दा था और इसका उसे सकारात्मक परिणाम मिला तथा भाजपा को राज्य में 18 सीट मिलीं।
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने सोमवार को कहा कि अगर सीएए भारत में कुछ समूहों के साथ भेदभाव करता है या किसी भी तरह से उनके नागरिक अधिकारों को प्रतिबंधित करता है, तो वह इसका कड़ा विरोध करेंगी।
ममता ने चिंता व्यक्त की कि सीएए देशभर में एनआरसी के लागू किये जाने का मार्ग प्रशस्त कर सकता है।
टीएमसी प्रमुख ममता ने कहा, ‘‘हम हर कीमत पर एनआरसी को लागू करने का विरोध करेंगे। मुझे केवल इस बात की चिंता है कि क्या नए सीएए नियम हमारे नागरिकों के पिछले अधिकारों को अमान्य कर देंगे...। ’’
पर्यवेक्षकों का कहना है कि सीएए कुछ निर्वाचन क्षेत्रों में भाजपा की संभावनाओं को बढ़ा सकता है, लेकिन यह जवाबी प्रतिक्रिया पैदा कर सकता है खासकर अल्पसंख्यक समूहों के बीच।
टीएमसी के अंदरूनी सूत्रों का अनुमान है कि अल्पसंख्यक वोटों को मजबूत करने और बंगालियों के प्रति भाजपा की कथित कटुता के विमर्श को मजबूती से रखने की स्थिति में सीएए से लाभ मिल सकता है।
राजनीतिक पर्यवेक्षकों के अनुसार, सीएए का मुद्दा मतुआ-बहुल सीट जैसे बोंगांव, राणाघाट (जो वर्तमान में भाजपा के पास है) और कृष्णानगर एवं शरणार्थी-बहुल सीट के कुछ हिस्सों पर प्रभाव डालेगा, लेकिन दक्षिण बंगाल और उत्तरी बंगाल की अल्पसंख्यक-बहुल सीट पर इसका विपरीत प्रभाव पड़ेगा, जहां भाजपा ने 2019 में जीत हासिल की थी।
तृणमूल सीएए को लागू करने और राज्य के कुछ हिस्सों में हाल ही में आधार कार्ड रद्द करने के बीच एक संबंध मानती है। टीएमसी इसे बंगाल में संभावित रूप से एनआरसी को लागू करने की पूर्व पीठिका के रूप में देखती है।
एक टीएमसी नेता ने कहा, ‘‘सीएए के कार्यान्वयन से न केवल अल्पसंख्यक समुदायों का समर्थन सुदृढ़ होगा, बल्कि भ्रष्टाचार के मुद्दों को लेकर हमारी आलोचना करने वाले बंगाली अभिजात वर्ग के कुछ हिस्से और बिना उचित दस्तावेज के हाशिए पर रहने वाले वर्गों के बीच भी पैठ बढ़ेगी।’’
इसके अलावा, टीएमसी नेता अगस्त 2019 में असम में अंतिम एनआरसी सूची के प्रकाशन के परिणाम को रणनीतिक रूप से एक अहम मोड़ मानते हैं। वे इस बात पर जोर देते हैं कि कैसे हिंदुओं और बंगाली हिंदुओं सहित बड़ी संख्या में व्यक्तियों को बाहर रखे जाने से टीएमसी को अपने पक्ष में राजनीतिक कथानक को गढ़ने में मदद की।
टीएमसी का दावा है कि भाजपा को ‘बंगाली विरोधी’ चित्रित करके उसने भाजपा के चुनावी लाभ का सफलतापूर्वक मुकाबला किया।
एक टीएमसी नेता ने नाम का खुलासा नहीं करने की शर्त पर कहा, ‘‘सीएए और एनआरसी के खिलाफ हमारे अभियानों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जिससे अंततः बाद के विधानसभा चुनावों में भाजपा की हार हुई।’’
हालांकि, भाजपा को लगता है कि वह न केवल राज्य के शरणार्थी समुदाय, विशेषकर मतुआ समुदाय के लोगों की पसंद बनेगी, बल्कि इससे बहुसंख्यक वोटों को एकजुट करने में भी मदद मिलेगी।
भाजपा के राज्य प्रवक्ता समिक भट्टाचार्य ने कहा, ‘‘हमें उम्मीद है कि शरणार्थी समुदाय और हिंदुओं का एक बड़ा वर्ग जिनकी पिछली पीढ़ियों को धार्मिक उत्पीड़न के कारण पलायन करना पड़ा था, जमीनी हकीकत को समझेगा।’’
केंद्रीय मंत्री और मतुआ समुदाय के नेता शांतनु ठाकुर का मानना है कि अपने वादों को पूरा करने के बाद मतुआ समुदाय भाजपा को सामूहिक वोट देगा।
उन्होंने कहा, “सीएए के कार्यान्वयन का कम से कम 10-12 निर्वाचन क्षेत्रों पर सीधा प्रभाव पड़ेगा और हमें मतुआ और शरणार्थी समुदाय के प्रभुत्व वाली सभी सीट जीतने का भरोसा है।’’
मतुआ समुदाय को सीएए के कार्यान्वयन से सबसे अधिक लाभ मिलने की उम्मीद है और उन्होंने इसे अपना ‘दूसरा स्वतंत्रता दिवस’ करार दिया है।
मतुआ समुदाय राज्य की अनुसूचित जाति की आबादी का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। 1950 के दशक से पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) में धार्मिक उत्पीड़न के कारण मतुआ समुदाय भागकर पश्चिम बंगाल की ओर पलायन करने लगा।
मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) को लगता है कि सीएए लोकसभा चुनाव से पहले मतदाताओं के ध्रुवीकरण की एक चाल है।
राजनीतिक चिंतक सब्यसाची बसु रॉय चौधरी ने कहा कि एनआरसी के लागू होने की आशंका को सीएए और बढ़ा देगा, जो एक स्वाभाविक निष्कर्ष है।
उन्होंने कहा, ‘‘सीएए के लागू होने से भाजपा को अनिवार्य रूप से फायदा नहीं होगा क्योंकि इससे एनआरसी के लागू करने जैसी संभावित अनुवर्ती कार्रवाई को लेकर भ्रम पैदा हो सकता है, जिससे अल्पसंख्यकों और हिंदू समुदाय के एक वर्ग में भय है।’’
भाषा संतोष