बंगाल स्कूल भर्ती : कलकत्ता उच्च न्यायालय ने 25,000 से अधिक नियुक्तियों को किया रद्द
सुभाष माधव
- 22 Apr 2024, 10:01 PM
- Updated: 10:01 PM
कोलकाता, 22 अप्रैल (भाषा) कलकत्ता उच्च न्यायालय ने पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा संचालित और उससे सहायता प्राप्त विद्यालयों में, राज्य स्तरीय चयन परीक्षा-2016 (एसएलएसटी) की भर्ती प्रक्रिया के जरिए हुई शिक्षकों और गैर-शिक्षण कर्मियों की 25,753 नियुक्तियों को रद्द करने का सोमवार को आदेश दिया तथा चयन प्रक्रिया को ‘‘अमान्य एवं अवैध’’ करार दिया।
न्यायमूर्ति देबांग्शु बसाक और न्यायमूर्ति मोहम्मद शब्बार राशिदी की खंडपीठ ने केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) को (रद्द की गई) नियुक्ति प्रक्रिया की जांच करने तथा तीन महीनों में एक रिपोर्ट सौंपने का निर्देश दिया।
इस घटनाक्रम पर कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कहा कि सभी नियुक्तियों को रद्द करने का अदालत का फैसला अवैध है और उनकी सरकार आदेश को उच्चतम न्यायालय में चुनौती देगी।
वहीं, भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के वरिष्ठ नेता शुभेंदु अधिकारी ने अदालत के फैसले का स्वागत करते हुए कहा कि इससे साबित हो गया है कि ‘‘तृणमूल कांग्रेस सरकार भ्रष्टाचार में शामिल है।’’
पश्चिम बंगाल स्कूल सेवा आयोग (एसएससी) के अध्यक्ष सिद्धार्थ मजूमदार ने सोमवार को कहा, ‘‘उच्च न्यायालय का पूरा आदेश पढ़ने के बाद हम उच्चतम न्यायालय का रुख करेंगे।’’
कुल 24,640 रिक्त पदों के लिए 23 लाख से अधिक अभ्यर्थी 2016 की एसएलएसटी परीक्षा में शामिल हुए थे।
अदालत में कुछ याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश हुए वकील फिरदौस शमीम ने कहा कि इन रिक्तियों के लिए कुल 25,753 नियुक्ति पत्र जारी किए गए थे। खंडपीठ ने आदेश पर रोक लगाने के कुछ अपीलकर्ताओं के अनुरोध को भी खारिज कर दिया।
उच्चतम न्यायालय के निर्देश पर उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश ने पीठ का गठन किया था। पीठ ने एसएलएसटी-2016 के जरिए नौवीं, दसवीं, 11वीं और 12वीं कक्षाओं के शिक्षकों तथा ग्रुप-सी और डी पदों पर एसएससी द्वारा नियुक्ति के लिए उम्मीदवारों के चयन से संबंधित 350 याचिकाओं तथा अपीलों पर विस्तारपूर्वक सुनवाई की।
मामले में सुनवाई 20 मार्च को पूरी हुई थी और पीठ ने फैसला सुरक्षित रख लिया था।
उच्च न्यायालय ने चयन प्रक्रिया के जरिये की गई सभी नियुक्तियों को संविधान के अनुच्छेद 14 (कानून के समक्ष समानता) और अनुच्छेद 16 (किसी भी सरकारी पद पर नौकरी में भेदभाव रोकने) का हनन करने वाला करार दिया। अदालत ने इन नियुक्तियों को ‘‘अमान्य एवं अवैध’’ करार दिया और रद्द कर दिया।
पीठ ने 282 पन्नों के अपने फैसले में सीबीआई को उसके द्वारा दर्ज किये गए सभी चार मामलों में आगे की जांच करने और खाली ‘‘ओएमआर शीट’’ (उत्तर पुस्तिका) जमा करने के बाद नियुक्ति पाने वाले सभी व्यक्तियों से पूछताछ करने का निर्देश दिया।
अदालत ने कहा कि यदि जरूरत पड़े तो सीबीआई उनमें से प्रत्येक को हिरासत में लेकर पूछताछ करे। पीठ ने कहा कि अस्थायी अवधि के लिए पद सृजित करने के सिलसिले में सीबीआई जांच जरूरी है ताकि घोटाले की प्रकृति और दायरा तथा इसमें शामिल लोगों को उजागर किया जा सके।
उच्च न्यायालय ने कहा कि यह स्तब्ध करने वाली बात है कि राज्य सरकार के मंत्रिमंडल स्तर पर, इस चयन प्रक्रिया में फर्जी तरीके से प्राप्त की गई नौकरियों को बरकरार रखने का निर्णय लिया गया, जबकि इस बात की भलीभांति जानकारी थी कि ये नियुक्तियां पैनल का कार्यकाल समाप्त होने के बाद की गई थीं।
अदालत के फैसले पर राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप शुरू हो गया। ममता ने आरोप लगाया कि यह आदेश चुनाव के बीच भाजपा के निर्देश के अनुसार पारित किया गया। वहीं, शुभेंदु अधिकारी ने कहा कि पार्टी ‘‘इस भ्रष्ट सरकार की निंदा करती है, जिसके मंत्री एवं पार्टी (तृणमूल) नेता नौकरियां बेचते हैं।’’
उन्होंने कहा, ‘‘सभी नियुक्तियों को रद्द करने का अदालत का फैसला अवैध है। हम उन लोगों के साथ खड़े हैं जिनकी नौकरियां चली गई हैं। हम यह सुनिश्चित करेंगे कि आपको न्याय मिले और आदेश को ऊपरी अदालत में चुनौती देंगे।’’
बाद में, करणदिघी में एक रैली को संबोधित करते हुए मुख्यमंत्री ने कहा, ‘‘सभी फैसलों को स्वीकार करना अनिवार्य नहीं है। हम आदेश को उच्चतम न्यायालय में चुनौती देंगे। यह आदेश चुनावों के बीच भाजपा के निर्देशों के अनुसार पारित किया गया।’’
भाजपा पर न्यायिक प्रणाली का दुरूपयोग करने का आरोप लगाते हुए ममता ने कहा, ‘‘इसने अदालतों को पार्टी के विस्तारित कार्यालयों में तब्दील कर दिया है। यदि भाजपा जनहित याचिका दायर करती है, तो त्वरित कार्रवाई की जाती है और लोगों को जेल भेज दिया जाता है। जब अन्य लोग दायर करते हैं तो कोई कार्रवाई शुरू नहीं की जाती है।’’
भाजपा की प्रदेश इकाई के प्रवक्ता समिक भट्टाचार्य ने कहा कि मुख्यमंत्री राज्य के मुखिया के रूप में अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकतीं। उन्होंने कहा, ‘‘हम उनसे स्पष्टीकरण मांगते हैं कि राज्य में ऐसा घोटाला कैसे हुआ। इस फैसले से हजारों परिवार प्रभावित हुए हैं।’’
इस बीच, कलकत्ता उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश अभिजीत गंगोपाध्याय ने अदालत के फैसले को उचित करार देते हुए मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से तत्काल इस्तीफे की मांग की।
सीबीआई ने उच्चतम न्यायालय के निर्देश के अनुसार, इस मामले की जांच पूरी की और एक रिपोर्ट उच्च न्यायालय को सौंपी थी।
केंद्रीय जांच एजेंसी ने राज्य के पूर्व शिक्षा मंत्री पार्थ चटर्जी और कथित घोटाले के वक्त एसएससी में विभिन्न पदों पर रहे कुछ पदाधिकारियों को भी गिरफ्तार किया है।
भाषा सुभाष