जातिगत गणना का फैसला कांग्रेस के अवसरवादिता और निष्क्रियता के इतिहास को उजागर करेगा : भाजपा
धीरज पवनेश
- 01 May 2025, 08:57 PM
- Updated: 08:57 PM
नयी दिल्ली, एक मई (भाषा)सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने बृहस्पतिवार को कहा कि अगली जनगणना में जातिगत गणना को शामिल करने का केंद्र का फैसला हाशिए पर पड़े वर्गों को सशक्त बनाने, देश की सामाजिक-आर्थिक नींव को मजबूत करने और कांग्रेस के अवसरवादिता और निष्क्रियता के लंबे इतिहास को उजागर करने के लिए एक ‘‘ऐतिहासिक और साहसिक’’ कदम है।
भाजपा के अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) मोर्चा के अध्यक्ष के.लक्ष्मण ने इस फैसले को सामाजिक न्याय की दिशा में एक कदम बताते हुए कहा कि इस कदम का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि जातिगत गणना आधिकारिक जनगणना के हिस्से के रूप में ‘‘संरचित, पारदर्शी और कानूनी रूप से सही तरीके’’ से की जाए, न कि कांग्रेस शासित राज्यों में किए गए ‘‘खंडित और संदिग्ध राज्य स्तरीय सर्वेक्षणों’’ के माध्यम से।
उन्होंने यहां जारी एक बयान में कहा, ‘‘ (प्रधानमंत्री नरेन्द्र)मोदी सरकार का जातिगत गणना कराने का फैसला ऐतिहासिक और साहसिक कदम है जो हाशिए पर पड़े लोगों को सशक्त करेगा, देश की सामाजिक और आर्थिक नींव को मजबूत करेगा और कांग्रेस पार्टी के अवसरवादिता और निष्क्रियता के लंबे इतिहास को उजागर करेगा।’’
लक्ष्मण ने कहा कि यह सामाजिक न्याय, सुविज्ञ नीति निर्माण और भारत के सामाजिक ताने-बाने को मजबूत करने की दिशा में एक ‘‘साहसिक और पारदर्शी कदम’’ है।
उन्होंने आरोप लगाया कि कांग्रेस और उसके सहयोगियों ने जातिगत गणना के मुद्दे का इस्तेमाल केवल ‘‘राजनीतिक हथियार’’ के रूप में किया है।
भाजपा नेता ने कहा कि हाशिए पर पड़े लोगों के कल्याण के लिए काम करने का उनका (कांग्रेस का)कभी भी कोई ‘‘वास्तविक इरादा’’ नहीं रहा।
उन्होंने कहा, ‘‘कांग्रेस ने जातिगत गणना की मांग को राजनीतिक नारे के तौर पर इस्तेमाल किया है और अपने घोषणापत्रों और जनसभाओं में इसका वादा किया। लेकिन, सत्ता में आने के बाद कांग्रेस लगातार इसे पूरा करने में विफल रही।’’
लक्ष्मण ने कहा कि कांग्रेस के नेतृत्व वाली संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) सरकार के दौरान 2010 में जातिगत गणना पर विचार करने के लिए मंत्रियों का एक समूह बनाया गया था, लेकिन पूर्ववर्ती सरकार ने ‘‘केवल सर्वेक्षण कराने का विकल्प चुना, न कि पूर्ण, पारदर्शी गणना कराने का।’’
उन्होंने आरोप लगाया, ‘‘सामाजिक-आर्थिक और जाति गणना (एसईसीसी) के आंकड़े कभी भी पूरी तरह से जारी नहीं किए गए और यह प्रक्रिया स्पष्टता और पारदर्शिता की कमी से प्रभावित रही।’’
भाषा धीरज