उच्चतम न्यायालय ने दिव्यांगों के लिए समावेशी केवाईसी प्रक्रिया का निर्देश दिया
देवेंद्र अविनाश
- 30 Apr 2025, 08:10 PM
- Updated: 08:10 PM
नयी दिल्ली, 30 अप्रैल (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने समावेशिता के अधिकारों को बरकरार रखते हुए बुधवार को डिजिटल केवाईसी (ग्राहक को जानो) दिशा-निर्देशों में बदलाव का निर्देश दिया ताकि दृष्टिबाधित और तेजाब हमले के पीड़ितों को बैंकिंग सेवाओं और कल्याणकारी योजनाओं समेत अन्य सेवाओं तक पहुंच मिल सके।
न्यायमूर्ति जे बी पारदीवाला और न्यायमूर्ति आर महादेवन की पीठ ने डिजिटल केवाईसी प्रक्रिया को दिव्यांगों के लिए समावेशी और सुलभ बनाने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के अलावा केंद्र और उसके विभागों को 20 महत्वपूर्ण निर्देश दिए।
पीठ ने कहा कि डिजिटल विभाजन को पाटना अब केवल नीतिगत विवेक का मामला नहीं रह गया है, बल्कि यह सम्मानजनक जीवन, स्वायत्तता और सार्वजनिक जीवन में समान भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए संवैधानिक अनिवार्यता है।
इसने कहा कि इसलिए, डिजिटल पहुंच का अधिकार जीवन और स्वतंत्रता के अधिकार का एक आंतरिक घटक बन जाता है, जिसके लिए सरकार को सक्रिय रूप से समावेशी डिजिटल पारिस्थितिकी तंत्र को तैयार और कार्यान्वित करना होगा।
पीठ ने दिव्यांगजनों के समक्ष आने वाली कठिनाइयों, विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वालों, पर प्रकाश डालते हुए कहा कि चूंकि स्वास्थ्य सेवा जैसी आवश्यक सेवाएं तेजी से डिजिटल मंचों के माध्यम से उपलब्ध हो रही हैं, इसलिए अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार की व्याख्या तकनीकी वास्तविकताओं के प्रकाश में की जानी चाहिए।
पीठ ने कहा, ‘‘डिजिटल विभाजन - जो डिजिटल बुनियादी ढांचे, कौशल और सामग्री तक असमान पहुंच की विशेषता है - न केवल दिव्यांग व्यक्तियों के लिए, बल्कि ग्रामीण आबादी के बड़े हिस्से, वरिष्ठ नागरिकों, आर्थिक रूप से कमजोर समुदायों और भाषाई अल्पसंख्यकों के लिए भी प्रणालीगत बहिष्कार को कायम रखता है। वास्तविक समानता के सिद्धांत के अनुसार डिजिटल परिवर्तन समावेशी और न्यायसंगत दोनों हो।’’
इसने कहा कि वेबसाइट, एप्लीकेशन और सहायक प्रौद्योगिकियों की कमी के कारण दिव्यांग व्यक्तियों को ऑनलाइन सेवाओं तक पहुंच बनाने में बाधाओं का सामना करना पड़ता है।
उच्चतम न्यायालय का फैसला दो याचिकाओं पर आया, जिसमें एक याचिका तेजाब हमले के पीड़ितों द्वारा दायर की गई थी, जो चेहरे की विकृति और आंखों में गंभीर जलन से पीड़ित हैं, इसके अलावा एक व्यक्ति 100 प्रतिशत दृष्टिबाधित है।
पीठ की ओर से फैसला लिखने वाले न्यायमूर्ति महादेवन ने कहा कि दूरदराज या ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को अक्सर खराब संपर्क, सीमित डिजिटल साक्षरता और क्षेत्रीय भाषाओं में सामग्री की कमी का सामना करना पड़ता है, जिससे उन्हें ई-गवर्नेंस और कल्याण वितरण प्रणालियों तक सार्थक पहुंच से वंचित होना पड़ता है।
न्यायालय ने 62 पृष्ठ के फैसले में कहा, ‘‘ऐसी परिस्थितियों में, संविधान के अनुच्छेद 14,15 और 38 के साथ अनुच्छेद 21 के तहत सरकार के दायित्वों में यह सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी शामिल होनी चाहिए कि डिजिटल बुनियादी ढांचा, सरकारी पोर्टल, ऑनलाइन शिक्षण मंच और वित्तीय प्रौद्योगिकियां सार्वभौमिक रूप से सुलभ, समावेशी और सभी कमजोर तथा हाशिए पर रहने वाली आबादी की जरूरतों के प्रति उत्तरदायी हों।’’
पीठ ने कहा कि डिजिटल केवाईसी ने सत्यापन प्रक्रियाओं को तेज और अधिक कुशल बनाकर आम जनता को लाभान्वित किया है, लेकिन दृष्टिबाधित और कम दृष्टि वाले व्यक्तियों को ऐसी प्रक्रियाओं तक पहुंच बनाने और उन्हें पूरा करने में बाधाओं का सामना करना पड़ रहा है।
शीर्ष अदालत ने हितधारकों को निर्देश जारी करते हुए कहा कि मंत्रालयों को सभी नियामक संस्थाओं - चाहे वे सरकारी हों या निजी - को समय-समय पर निर्धारित सुगम्यता मानकों का पालन करने का निर्देश देना चाहिए।
इसने कहा, ‘‘प्रतिवादी प्रत्येक विभाग में डिजिटल सुलभता अनुपालन के लिए जिम्मेदार एक नोडल अधिकारी की नियुक्ति करेंगे।’’
पीठ ने कहा कि सभी संस्थाओं को अनिवार्य रूप से प्रमाणित पेशेवरों द्वारा समय-समय पर सुगम्यता ऑडिट कराना होगा और किसी भी ऐप या वेबसाइट को डिजाइन करते समय या किसी भी नयी सुविधा को शुरू करते समय उपयोगकर्ता स्वीकृति परीक्षण चरण में दृष्टिबाधित व्यक्तियों को शामिल करना होगा।
शीर्ष अदालत ने आरबीआई को निर्देश दिया कि वह सभी संस्थाओं को दिशा-निर्देश जारी करे, ताकि डिजिटल केवाईसी या ई-केवाईसी की खातिर ग्राहकों की ‘‘लाइव तस्वीर’’ लेने के लिए ‘‘पलकें झपकाने’’ के अलावा वैकल्पिक तरीकों को अपनाया जा सके, ताकि समावेशिता और उपयोगकर्ता की सुविधा सुनिश्चित हो सके।
उच्चतम न्यायालय ने कई डिजिटल मंचों पर ‘स्क्रीन रीडर्स’ की असंगति को लेकर चिंता व्यक्त की। पीठ ने कहा कि ऐसी बाधाएं दिव्यांग व्यक्तियों की काम करने, सीखने और समाज के साथ जुड़ने की क्षमता में बाधा डालती हैं।
उच्चतम न्यायालय में याचिकाकर्ताओं ने केवाईसी प्रक्रियाओं को पूरा करने में अपनी असमर्थता को रेखांकित किया।
भाषा
देवेंद्र