न्यायालय ने गुरुग्राम के डीएलएफ क्षेत्र में ‘अनधिकृत’ निर्माण पर यथास्थिति बनाए रखने का निर्देश दिया
आशीष पवनेश
- 05 Apr 2025, 04:15 PM
- Updated: 04:15 PM
नयी दिल्ली, पांच अप्रैल (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने गुरुग्राम के अधिकारियों को डीएलएफ के एक से पांचवें चरण में अनधिकृत निर्माण के खिलाफ तोड़फोड अभियान पर यथास्थिति बनाए रखने को कहा है। इनमें आवासीय संपत्तियां भी शामिल हैं जिन्हें वाणिज्यिक परिसरों में परिवर्तित कर दिया गया है।
न्यायमूर्ति जे के माहेश्वरी और न्यायमूर्ति अरविंद कुमार की पीठ शुक्रवार को डीएलएफ कुतुब एन्क्लेव आरडब्ल्यूए की याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें हरियाणा सरकार के नगर एवं ग्राम नियोजन विभाग के मकान, दुकान समेत विभिन्न ढांचों को ध्वस्त करने के अधिकार को चुनौती दी गई है।
पीठ ने हरियाणा सरकार के अधिकारियों को नोटिस जारी किया और कहा कि सुनवाई की अगली तारीख तक मौजूदा यथास्थिति पक्षों द्वारा बनाए रखी जाएगी। शीर्ष अदालत ने अधिकारियों से चार सप्ताह के भीतर जवाब मांगा।
रेजिडेंट्स वेलफेयर एसोसिएशन (आरडब्ल्यूए) की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह और अन्य वकीलों ने दलील दी कि डीएलएफ आवासीय चरण 2008 से गुरुग्राम नगर निगम (एमसीजी) के अधिकार क्षेत्र में हैं और केवल नगर निगम के पास ढांचों को ध्वस्त करने सहित कोई भी कार्रवाई शुरू करने का अधिकार है।
पीठ ने कहा, ‘‘आज यथास्थिति बनाए रखने के आदेश के मद्देनजर, हम यह स्पष्ट करते हैं कि याचिकाकर्ता भी किसी भी निर्माण को नहीं गिराएंगे।’’
आरडब्ल्यूए ने पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय के 13 फरवरी के आदेश को चुनौती दी है, जिसमें अधिकारियों को डीएलएफ इलाके के आवासीय क्षेत्रों में अनधिकृत निर्माण, परिवर्तन और व्यावसायीकरण के खिलाफ ‘‘शीघ्र कार्रवाई’’ करने का निर्देश दिया गया था और 19 अप्रैल तक कार्रवाई रिपोर्ट मांगी गई थी।
उच्च न्यायालय ने अपने आदेश में कहा, ‘‘यह पूरी तरह से स्पष्ट है कि कुछ समूहों/भू-माफियाओं की एक शक्तिशाली लॉबी स्थानीय प्रशासन/आधिकारिक प्रतिवादियों के साथ सक्रिय मिलीभगत से विकसित कॉलोनी के मूल स्वरूप को बर्बाद कर रही है, वह भी केवल इसलिए क्योंकि अधिकारियों ने आंखें मूंद ली हैं और अवैध और अनधिकृत निर्माण/अवैध विकास की अनुमति दे रहे हैं।’’
उच्च न्यायालय के समक्ष याचिकाकर्ताओं ने 2018 की कार्रवाई रिपोर्ट (उक्त निर्माणों के खिलाफ शिकायतों पर) के साथ-साथ जिला नगर योजनाकार (प्रवर्तन) द्वारा जारी ज्ञापन के आधार पर कार्रवाई की मांग की थी।
इसके बाद नगर एवं ग्राम नियोजन विभाग ने 4,000 से अधिक कारण बताओ नोटिस जारी किए तथा डीएलएफ के पांच चरणों में 2,000 से अधिक मकान मालिकों के परिसरों की बहाली के आदेश दिए।
उच्च न्यायालय के आदेश के बाद आरडब्ल्यूए ने उच्चतम न्यायालय का रुख किया और दलील दी कि उच्च न्यायालय ने विरोधाभासी आदेश जारी किए हैं।
आरडब्ल्यूए ने कहा कि 2012 में उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया था कि डीएलएफ क्षेत्र से संबंधित मामलों में नगर एवं ग्राम नियोजन विभाग का कोई अधिकार क्षेत्र नहीं है। आरडब्लूए ने कहा कि फरवरी में अदालत ने कहा था कि इसी विभाग को अनधिकृत निर्माण में शामिल लोगों के खिलाफ कार्रवाई शुरू करनी होगी।
भाषा आशीष