पूरी भर्ती प्रक्रिया ‘दागदार’, 25,753 शिक्षकों, अन्य कर्मचारियों की नियुक्ति रद्द करते हैं: न्यायालय
धीरज नेत्रपाल
- 03 Apr 2025, 08:58 PM
- Updated: 08:58 PM
नयी दिल्ली, तीन अप्रैल (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने बृहस्पतिवार को पश्चिम बंगाल सरकार को बड़ा झटका देते हुए राज्य सरकार द्वारा संचालित और राज्य सहायता प्राप्त स्कूलों में 25,753 शिक्षकों एवं अन्य कर्मचारियों की नियुक्ति को अवैध करार दिया और कहा कि पूरी चयन प्रक्रिया ‘‘त्रुटिपूर्ण एवं दागदार’’ थी।
प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) संजीव खन्ना और न्यायमूर्ति संजय कुमार की पीठ ने 22 अप्रैल, 2024 के कलकत्ता उच्च न्यायालय के फैसले को बरकरार रखा, जिसमें नियुक्तियों को रद्द कर दिया गया था और कहा गया था कि दागी अभ्यर्थियों को अपने को मिला ‘‘वेतन/प्राप्त भुगतान’’ वापस करना चाहिए।
सीजेआई द्वारा लिखे गए 41 पन्ने के फैसले में कहा गया, ‘‘यह एक ऐसा मामला है जिसमें पूरी चयन प्रक्रिया को दूषित और सुधारने से परे दागदार बना दिया गया। बड़े पैमाने पर हेरफेर और धोखाधड़ी, साथ ही तथ्यों को छिपाने के प्रयास ने चयन प्रक्रिया को सुधार और आंशिक शोधन से परे नुकसान पहुंचाया है। चयन की विश्वसनीयता और वैधता खत्म हो गई है।’’
फैसले में कहा गया, ‘‘हमें उच्च न्यायालय के इस निर्देश में हस्तक्षेप करने का कोई वैध आधार या कारण नहीं मिला कि जहां भी दागी अभ्यर्थियों की नियुक्ति हुई है, उनकी सेवाएं समाप्त कर दी जानी चाहिए और उन्हें प्राप्त वेतन/भुगतान वापस करने के लिए कहा जाना चाहिए। चूंकि उनकी नियुक्तियां फर्जीवाड़े का परिणाम थीं, इसलिए यह धोखा देने के बराबर है। इसलिए, हमें इस निर्देश को बदलने का कोई औचित्य नहीं दिखता।’’
न्यायालय ने बेदाग अभ्यर्थियों के लिए कहा कि चयन प्रक्रिया को ‘‘घोर उल्लंघन और अवैधताओं’’ के कारण अमान्य घोषित करना सही था, क्योंकि इसने संविधान के अनुच्छेद 14 (कानून के समक्ष समानता) और 16 (सार्वजनिक रोजगार के मामलों में अवसर की समानता) का उल्लंघन किया था।
शीर्ष अदालत ने कहा, ‘‘ऐसे में, इन अभ्यर्थियों की नियुक्तियां रद्द की जाती हैं। हालांकि, जो अभ्यर्थी पहले से ही कार्यरत हैं, उन्हें किए गए किसी भी भुगतान को वापस करने के लिए कहने की आवश्यकता नहीं है। परंतु, उनकी सेवाएं समाप्त कर दी जाएँगी। इसके अलावा, पूरी परीक्षा प्रक्रिया और परिणाम शून्य घोषित होने के बाद किसी भी अभ्यर्थी को नियुक्त नहीं किया जा सकता।’’
न्यायालय ने ऐसे कर्मचारियों को राहत दी जो दागी अभ्यर्थियों की श्रेणी में नहीं थे और पहले अन्य राज्य विभागों या स्वायत्त निकायों में काम कर चुके थे।
पीठ ने फैसले में कहा, ‘‘ऐसे मामलों में, उनकी नियुक्तियां रद्द की जाती हैं, लेकिन इन अभ्यर्थियों को अपने पिछले विभागों या स्वायत्त निकायों में सेवा जारी रखने के लिए आवेदन करने का अधिकार होगा।’’
शीर्ष अदालत ने राज्य सरकार को उनकी नौकरी संबंधी अर्जियों पर तीन महीने के भीतर कार्रवाई करने का निर्देश दिया।
पीठ ने फैसले में कहा, ‘‘इसके अलावा, उनकी पिछली नियुक्ति की समाप्ति और उनके फिर से शामिल होने के बीच की अवधि को सेवा में विराम नहीं माना जाएगा। उनकी वरिष्ठता और अन्य अधिकार सुरक्षित रहेंगे, और वे वेतन वृद्धि के लिए पात्र होंगे।’’
फैसले में कहा गया कि लेकिन विवादित नियुक्ति के तहत नियोजित अवधि के दौरान राज्य या स्वायत्त निकायों द्वारा उन्हें कोई वेतन नहीं दिया जाएगा।
अदालत ने कहा, ‘‘इसके अलावा, यदि आवश्यक हो तो, इस अवधि में नियुक्त व्यक्तियों के लिए अतिरिक्त पदों का सृजन किया जा सकता है।’’
दिव्यांग अभ्यर्थियों के मुद्दे पर विचार करते हुए पीठ ने कहा कि उच्च न्यायालय ने मानवीय आधार पर सोमा दास नामक अभ्यर्थी को पद पर बने रहने की अनुमति दी थी।
शीर्ष अदालत ने कहा, ‘‘हम इस निष्कर्ष में हस्तक्षेप नहीं करेंगे, लेकिन हम यह स्पष्ट करते हैं कि अन्य दिव्यांग अभ्यर्थी समान लाभ के हकदार नहीं होंगे, क्योंकि यह कानूनी सिद्धांतों और कानून के शासन के विपरीत होगा। हालांकि, उनकी दिव्यांगता को ध्यान में रखते हुए, इन अभ्यर्थियों को जारी रखने की अनुमति दी जाएगी और नयी चयन प्रक्रिया तथा नियुक्तियां पूरी होने तक उन्हें वेतन मिलेगा।’’
अदालत ने कहा कि यदि आवश्यक हुआ तो दिव्यांग अभ्यर्थियों को आयु में छूट और अन्य रियायतों के साथ नयी चयन प्रक्रिया में भाग लेने की अनुमति दी जाएगी।
पीठ ने कहा, ‘‘इसी तरह, अन्य अभ्यर्थी जो विशेष रूप से दागी नहीं हैं, वे भी उचित आयु छूट के साथ भर्ती प्रक्रिया में भाग लेने के पात्र होंगे। हमारी राय में, ऐसा निर्देश उचित और न्यायसंगत होगा, क्योंकि यह इन उम्मीदवारों को नयी चयन प्रक्रिया में भाग लेने की अनुमति देगा, जिसे अब रिक्तियों को भरने के लिए शुरू किया जाना चाहिए।’’
शीर्ष अदालत ने हालांकि नयी चयन प्रक्रिया के लिए कोई समयसीमा तय नहीं की।
न्यायालय ने कहा कि उसकी टिप्पणियां और निष्कर्ष जारी आपराधिक कार्यवाही को प्रभावित नहीं करेंगे।
पीठ ने कहा, ‘‘तदनुसार, हम संपूर्ण चयन प्रक्रिया को रद्द करने के चुनौती दिए गए फैसले को बरकरार रखते हैं लेकिन उच्च न्यायालय द्वारा जारी निर्देशों में कुछ संशोधन किए हैं।’’
इसने कहा कि वह सीबीआई जांच पर राज्य सरकार द्वारा उठाए गए मुद्दे पर अलग से विचार करेगी।
ओएमआर शीट से छेड़छाड़ और अन्य अनियमितताओं का हवाला देते हुए उच्च न्यायालय ने पश्चिम बंगाल में राज्य सरकार द्वारा संचालित और सरकारी-सहायता प्राप्त स्कूलों में 25,753 शिक्षकों और गैर-शिक्षण कर्मचारियों की नियुक्ति को अमान्य कर दिया था।
यह मामला पश्चिम बंगाल एसएससी द्वारा आयोजित 2016 की भर्ती प्रक्रिया में कथित अनियमितताओं से जुड़ा है, जिसमें 24,640 पदों के लिए 23 लाख अभ्यर्थी शामिल हुए थे और कुल 25,753 नियुक्ति पत्र जारी किए गए थे।
शीर्ष अदालत ने इसे ‘‘व्यवस्थित धोखाधड़ी’’ करार दिया था।
पश्चिम बंगाल के पूर्व शिक्षा मंत्री पार्थ चटर्जी और तृणमूल कांग्रेस के विधायक माणिक भट्टाचार्य एवं जीवन कृष्ण साहा भर्ती घोटाले में जांच के दायरे में आने वाले आरोपियों में शामिल हैं।
भाषा धीरज