मोहन यादव ने एनईपी पर छपे लेख को लेकर सोनिया गांधी की आलोचना की
दिमो राजकुमार
- 31 Mar 2025, 10:50 PM
- Updated: 10:50 PM
(फाइल फोटो के साथ)
भोपाल, 31 मार्च (भाषा) मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव ने सोमवार को राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) पर अखबार में छपे एक लेख को लेकर वरिष्ठ कांग्रेस नेता सोनिया गांधी की आलोचना की।
कांग्रेस संसदीय दल की अध्यक्ष गांधी ने ‘द हिंदू’ अखबार में छपे अपने लेख ‘आज भारतीय शिक्षा को नुकसान पहुँचाने वाले ‘3सी’ ’ में कहा कि हाई-प्रोफाइल एनईपी 2020 की शुरूआत ने एक ऐसी सरकार की वास्तविकता को छिपा दिया है जो भारत के बच्चों और युवाओं की शिक्षा के प्रति बेहद उदासीन है।
इस पर निशाना साधते हुए यादव ने कहा, "मध्यप्रदेश ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में एनईपी को लागू किया। मैं सोनिया गांधी द्वारा लिखे गए लेख की कड़े शब्दों में निंदा करता हूं। मुझे लगता है कि उन्होंने नई शिक्षा नीति को नहीं पढ़ा।’’
उन्होंने खरगोन जिले के महेश्वर में संवाददाताओं से कहा, ‘‘हमें अपने अतीत पर गर्व होना चाहिए। अगर कोई अतिशयोक्तिपूर्ण और सांप्रदायिक बात कहता है, तो वह सांप्रदायिक है। अगर हम शिवाजी महाराज की तुलना अकबर या औरंगजेब से करते हैं, तो हमारी जड़ें शिवाजी से जुड़ी होनी चाहिए। हमें अपने देश के नागरिकों के प्रति भावनाएं रखनी चाहिए।’’
उन्होंने कहा कि देश भगवान कृष्ण के प्रति उनकी भक्ति के लिए रहीम और रसखान का सम्मान करता है, लेकिन अंग्रेजों समेत कुछ शासकों का भारत के प्रति कोई लगाव नहीं था।
यादव ने कहा,‘‘आत्मनिर्भरता, (मानव)मूल्य भी शिक्षा से आने चाहिए। शिक्षा से जुड़कर अपनी संस्कृति पर गर्व होना चाहिए। हमें भविष्य की ओर भी लंबी छलांग लगानी चाहिए। उन सभी चीजों से दूर जाने की जरूरत है, जिन्होंने अतीत में देश को गुलाम बनाया। राष्ट्रीय शिक्षा नीति में यह सब करने का प्रयास किया गया है।’’
अपने लेख में गांधी ने कहा कि पिछले दशक में केंद्र सरकार के ट्रैक रिकॉर्ड ने स्पष्ट रूप से प्रदर्शित किया है कि वह शिक्षा में केवल तीन मुख्य एजेंडा मदों के सफल कार्यान्वयन से चिंतित हैं - केंद्र सरकार के पास सत्ता का केंद्रीकरण, शिक्षा में निवेश का व्यावसायीकरण और निजी क्षेत्र को आउटसोर्सिंग तथा पाठ्यपुस्तकों, पाठ्यक्रम और संस्थानों का सांप्रदायिकरण।
गांधी ने लेख में कहा,‘‘केंद्रीकरण, व्यावसायीकरण और सांप्रदायिकरण के लिए इस एकतरफा प्रयास के प्रभाव सीधे हमारे विद्यार्थियों पर पड़े हैं। भारत की सार्वजनिक शिक्षा प्रणाली का यह नरसंहार समाप्त होना चाहिए।’’
भाषा दिमो