बांग्लादेश में हिंदुओं पर हमले, बंगाल में अगले साल होने वाले चुनाव को लेकर राम नवमी का सियासी महत्व बढ़ा
पारुल सुभाष
- 31 Mar 2025, 05:00 PM
- Updated: 05:00 PM
(प्रदीप्त तापदार)
कोलकाता, 31 मार्च (भाषा) पड़ोसी देश बांग्लादेश में हिंदुओं के खिलाफ हिंसा की कथित घटनाओं और पश्चिम बंगाल में 2026 में होने वाले विधानसभा चुनावों के चलते राज्य में इस साल राम नवमी समारोह का पैमाना और सियासी महत्व, दोनों बढ़ गया है।
पारंपरिक रूप से धार्मिक आयोजन रहा राम नवमी समारोह सियासी रण क्षेत्र में तब्दील हो गया है, क्योंकि राज्य में सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) और विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के बीच ध्रुवीकरण और जवाबी-ध्रुवीकरण को लेकर होड़ मची हुई है।
भाजपा अगले साल होने वाले विधानसभा चुनावों से पहले, हिंदू वोटों को एकजुट करने की कोशिश कर रही है और उसने राम नवमी को अपने प्रचार अभियान का केंद्र बिंदु बनाया है।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) और विश्व हिंदू परिषद (विहिप) जैसे हिंदूवादी संगठनों ने छह अप्रैल से शुरू हो रहे हफ्ते भर के राम नवमी समारोह के लिए पश्चिम बंगाल के सभी ब्लॉक में शोभायात्रा निकालने और तीन करोड़ से अधिक लोगों को एकत्र करने का लक्ष्य रखा है।
भाजपा नेताओं के मुताबिक, ये शोभायात्राएं “बांग्लादेश में हिंदुओं पर हमले की घटनाओं” और तृणमूल कांग्रेस की “तुष्टिकरण की राजनीति” के खिलाफ प्रतीकात्मक प्रदर्शन के रूप में काम करेंगी।
केंद्रीय मंत्री और भाजपा की पश्चिम बंगाल इकाई के अध्यक्ष सुकांत मजूमदार ने ‘पीटीआई-भाषा’ से कहा, “बांग्लादेश में हिंदुओं पर हो रहे हमले सीमा के इस तरफ (भारत में) मौजूद लोगों के लिए आंखें खोलने वाले हैं। अगर हम अभी प्रतिरोध नहीं करेंगे, तो तृणमूल की तुष्टीकरण की राजनीति के चलते पश्चिम बंगाल में भी हिंदुओं का इसी तरह का हश्र हो सकता है।”
मजूमदार ने आरोप लगाया, “पश्चिम बंगाल में हिंदू, टीएमसी समर्थित जिहादियों के इसी तरह के हमलों का पहले से ही सामना कर रहे हैं।” उन्होंने कहा कि इस साल का राम नवमी समारोह ऐसे अत्याचारों का “जवाब” होगा।
विहिप के प्रदेश सचिव चंद्र नाथ दास ने राम नवमी समारोह के बढ़ते सियासी महत्व के तीन प्रमुख कारण गिनाए -- बंगाली श्रद्धालुओं का रिकॉर्ड संख्या में प्रयागराज के महाकुंभ मेले में शामिल होना और अयोध्या में राम मंदिर में दर्शन करना, बांग्लादेश में उत्पीड़न के शिकार अपने रिश्तेदारों के साथ राज्य के कई हिंदुओं के भावनात्मक जुड़ाव तथा अल्पसंख्यकों के तुष्टीकरण की राज्य सरकार की कथित नीतियों के खिलाफ बढ़ता असंतोष।
दास ने ‘पीटीआई-भाषा’ से कहा, “इस साल की राम नवमी ने लोगों को अपना गुस्सा जाहिर करने और विरोध जताने का मौका दिया है। यह समारोह अगले साल होने वाले विधानसभा चुनावों से पहले हिंदुओं को एकजुट करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम के रूप में काम करेगा। हिंदू समुदाय पर जितना अधिक हमला होगा, उसकी प्रतिक्रिया उतनी ही तीव्र होगी।”
आरएसएस के एक वरिष्ठ पदाधिकारी ने नाम न जाहिर करने की शर्त पर इसी तरह के विचार व्यक्त किए।
उन्होंने कहा, “हर क्रिया की समान और विपरीत प्रतिक्रिया होती है। अगर बांग्लादेश और पश्चिम बंगाल में हिंदुओं पर हमला किया जाता है, तो प्रतिक्रिया होगी। अगर हम राम नवमी को सफलतापूर्वक मनाते हैं, तो बांग्लादेश में भी हिंदुओं को तसल्ली होगी कि उन पर होने वाले अत्याचारों को अनदेखा नहीं किया गया है।”
पश्चिम बंगाल में 2024 में राम नवमी के उपलक्ष्य में 1,000 शोभायात्राएं निकाली गई थीं। इस साल इन शोभायात्रा का ग्रामीण क्षेत्रों में भी विस्तार किया जाएगा, जिसके चलते राज्य में लगभग 3,000 शोभायात्रा निकाले जाने की संभावना है।
विहिप के सूत्रों के अनुसार, कम से कम 100 शोभायात्रा में 35-35 हजार से अधिक लोगों के शामिल होने का अनुमान है, जबकि कई शोभायात्रा में प्रतिभागियों की संख्या 50,000 से अधिक रह सकती है।
भाजपा नेता इन शोभायात्राओं को प्रमुख जिलों में हिंदू वोटों को एकजुट करने की रणनीतिक कवायद के रूप में देख रहे हैं, जहां पार्टी का लक्ष्य 2021 के विधानसभा चुनावों के मुकाबले कहीं बेहतर प्रदर्शन करना है।
विधानसभा में विपक्ष के नेता शुभेंदु अधिकारी ने हाल ही में दावा किया था कि पिछले साल राम नवमी समारोह में 50 लाख हिंदुओं ने हिस्सा लिया था और इस वर्ष यह संख्या एक करोड़ से अधिक रहने की उम्मीद है।
शुभेंदु ने भाजपा की चुनावी जीत का भरोसा जताते हुए ऐलान किया, “2026 में पश्चिम बंगाल में हिंदू सरकार बनेगी।”
वहीं, तृणमूल कांग्रेस ने भाजपा पर पलटवार करते हुए उस पर धर्म को सियासी औजार के रूप में इस्तेमाल करने का आरोप लगाया है।
तृणमूल प्रवक्ता कुणाल घोष ने भाजपा और हिंदूवादी संगठनों के विचार को यह कहते हुए खारिज कर दिया, “जनता उन लोगों को स्वीकार नहीं करेगी, जो धर्म के नाम पर राजनीति करते हैं।”
पार्टी सांसद सौगत रॉय ने मतदाताओं के ध्रुवीकरण के भाजपा के कथित प्रयासों की आलोचना की। उन्होंने दावा किया, ‘‘भाजपा जानबूझकर धार्मिक उत्सवों का इस्तेमाल पश्चिम बंगाल के सांप्रदायिक सद्भाव को बिगाड़ने के लिए कर रही है। वे चुनाव से पहले लोगों को बांटना चाहते हैं।”
इस बीच, पश्चिम बंगाल प्रशासन ने राम नवमी और ईद के दौरान किसी भी तरह की सांप्रदायिक झड़प टालने के लिए सुरक्षा के व्यापक इंतजाम किए हैं।
हाल के वर्षों में राज्य में राम नवमी के अवसर पर शोभायात्राओं के दौरान कई सांप्रदायिक झड़पें हुई हैं। 2018 में आसनसोल में बड़े पैमाने पर हिंसा भड़की थी, जिसमें कई लोग मारे गए थे। इसी तरह का तनाव 2019, 2022 और 2023 में भी देखने को मिला था, जब मुर्शिदाबाद, हावड़ा और मालदा जिलों में सांप्रदायिक झड़पें हुई थीं।
बांग्लादेश में हिंदुओं के खिलाफ कथित हिंसा पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक बड़ा मुद्दा बनकर उभरी है। विभिन्न रिपोर्ट के मुताबिक, पड़ोसी देश में पिछले साल अगस्त में राजनीतिक उथल-पुथल के बाद वहां हिंदुओं के कई धार्मिक स्थलों और घरों में बड़े पैमाने पर तोड़फोड़ व आगजनी की गई।
भाजपा ने बांग्लादेश में हिंदुओं पर कथित अत्याचारों के खिलाफ राज्यभर में बड़े पैमाने पर प्रदर्शन किया है और तृणमूल पर वहां (बांग्लादेश में) उत्पीड़न का शिकार हुए हिंदुओं की पीड़ा को नजरअंदाज करने का आरोप लगाया है।
वरिष्ठ भाजपा नेता दिलीप घोष ने कहा, “बांग्लादेश में हमारे बंगाली हिंदू भाई-बहन संकट में हैं। हम यहां इस तरह का उत्पीड़न नहीं होने देंगे।”
हालांकि, तृणमूल नेताओं ने भाजपा पर आरोप लगाया है कि वह बांग्लादेश से जुड़े मुद्दे के जरिये राज्य में ध्रुवीकरण की कोशिश कर रही है।
राज्य सरकार में मंत्री फिरहाद हकीम ने कहा, “भाजपा वोट हासिल करने के लिए बांग्लादेश के सांप्रदायिक मुद्दों को पश्चिम बंगाल में लाने की कोशिश कर रही है। यह खतरनाक राजनीति है।”
राजनीतिक विश्लेषक सुमन भट्टाचार्य ने कहा, “अगर भाजपा और हिंदूवादी संगठन हिंदू एकता को लेकर गंभीर होते, तो वे दलितों और पिछड़े समुदायों पर हो रहे अत्याचारों के खिलाफ भी आवाज उठाते। सच तो यह है कि भाजपा अपने हिंदुत्व एजेंडे का प्रचार करके ब्राह्मणवादी वर्चस्व स्थापित करना चाहती है।”
भाषा पारुल