विधि विशेषज्ञों ने न्यायमूर्ति वर्मा पर महाभियोग चलाने की बार एसोसिएशन की मांग को हास्यास्पद बताया
जितेंद्र दिलीप
- 24 Mar 2025, 10:41 PM
- Updated: 10:41 PM
नयी दिल्ली, 24 मार्च (भाषा) विधि विशेषज्ञों ने न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा के सभी फैसलों की समीक्षा करने और उनपर महाभियोग के लिए कदम उठाने की ‘इलाहाबाद हाई कोर्ट बार एसोसिएशन’ की मांग को सोमवार को ‘हास्यास्पद’, ‘समय पूर्व’ और ‘अनुचित’ करार दिया।
उच्चतम न्यायालय के कॉलेजियम ने न्यायमूर्ति वर्मा के तबादले की सिफारिश की है। न्यायमूर्ति वर्मा उनके दिल्ली के लुटियंस इलाके में स्थित आधिकारिक निवास में बड़ी मात्रा में नकदी पाये जाने के बाद जांच का सामना कर रहे हैं।
न्यायमूर्ति वर्मा से दिल्ली उच्च न्यायालय के सभी न्यायिक कार्य वापस ले लिये गये हैं और उन्हें इलाहाबाद उच्च न्यायालय भेज दिया गया है।
भारत के प्रधान न्यायाधीश संजीव खन्ना ने 22 मार्च को न्यायमूर्ति वर्मा के खिलाफ आरोपों की आंतरिक जांच करने के लिए तीन सदस्यीय समिति का गठन किया था।
इलाहाबाद उच्च न्यायालय बार एसोसिएशन ने सोमवार को न्यायमूर्ति वर्मा के प्रस्तावित तबादले का विरोध किया और कहा कि इलाहाबाद और दिल्ली के उच्च न्यायालयों के न्यायाधीश के रूप में उनके (वर्मा के) कार्यकाल के दौरान दिए गए फैसलों की समीक्षा की जानी चाहिए ताकि न्यायपालिका में जनता के विश्वास को फिर से बहाल किया जा सके।
वरिष्ठ अधिवक्ता अजीत सिन्हा ने एसोसिएशन की मांग पर टिप्पणी करते हुए कहा कि जब तक आंतरिक जांच में महाभियोग की सिफारिश को लेकर कोई निष्कर्ष नहीं निकलता, तब तक ऐसा नहीं किया जा सकता।
सिन्हा ने कहा, “जहां तक बात उनके (न्यायमूर्ति वर्मा) सभी फैसलों की समीक्षा के संबंध में है, तो यह मांग केवल संबंधित पक्ष कर रहे सकते हैं। ऐसा हर कोई नहीं कर सकता।”
वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने कहा कि वह बार एसोसिएशन की मांग से सहमत नहीं हैं, क्योंकि किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने में यह बेहद जल्दबाजी होगी।
वरिष्ठ अधिवक्ता शोएब आलम ने इस मुद्दे पर टिप्पणी करते हुए कहा, “न्यायमूर्ति वर्मा के एक दशक से अधिक लंबे कार्यकाल में सुनाए गए प्रत्येक निर्णय की समीक्षा करना और उसे रद्द करने की बार एसोसिएशन की मांग बेतुकी है और किसी भी कानून के तहत इसकी परिकल्पना नहीं की गई है।”
वरिष्ठ अधिवक्ता मनिंदर सिंह ने कहा कि जनता की राय या केवल आरोप न्यायाधीशों के फैसलों की जांच का आधार नहीं हो सकते और किसी न्यायाधीश पर मीडिया में आई खबरों के आधार पर महाभियोग नहीं चलाया जाना चाहिए।
सिंह ने कहा, “न्यायाधीश द्वारा सुनाए गए फैसले की किसी की मांग के आधार पर जांच नहीं की जा सकती। निर्णय या आदेश को केवल पीड़ित पक्ष द्वारा अपीलीय अदालतों के समक्ष चुनौती दी जा सकती है, वह भी तय समय सीमा के भीतर और वह भी तब, जब फैसला गलत, विकृत या कानून के अनुसार न हो।”
दिल्ली जिला न्यायपालिका की सेवानिवृत्त न्यायिक अधिकारी एवं अधिवक्ता कामिनी लाउ ने बार एसोसिएशन की मांग को अनुचित करार दिया।
भाषा जितेंद्र