उप्र के पीलीभीत लोकसभा क्षेत्र में सीएए एक प्रमुख चुनावी मुद्दा
देवेंद्र
- 10 Apr 2024, 07:08 PM
- Updated: 07:08 PM
(चंदन कुमार)
पीलीभीत (उप्र), 10 अप्रैल (भाषा) उत्तर प्रदेश के पीलीभीत संसदीय क्षेत्र में बांग्लादेश से आए हिंदू शरणार्थियों की बड़ी आबादी होने की वजह से नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) एक प्रमुख चुनावी मुद्दा बनकर उभरा है।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने हाल में यहां एक चुनावी रैली में अपने संबोधन में इसका (सीएए) उल्लेख भी किया था।
भारत-नेपाल सीमा पर स्थित, उत्तर प्रदेश के पीलीभीत में अनुमानित दो लाख बंगाली हिंदू शरणार्थियों ने अपना ठिकाना बनाया हुआ है और सीएए का उन पर सीधा प्रभाव पड़ने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता है।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने मंगलवार को यहां एक रैली में कांग्रेस और समाजवादी पार्टी (सपा) समेत विपक्षी दलों पर निशाना साधते हुए कहा था कि वे तुष्टिकरण के दबाव के कारण सीएए का विरोध कर रहे हैं।
उन्होंने यह भी कहा था कि हिंदू और सिख अपने खिलाफ हुए अत्याचारों के कारण विदेशी धरती से भागने को मजबूर हैं। उन्होंने पूछा था, ‘‘यदि भारत उन्हें नागरिकता नहीं देगा तो कौन उन्हें नागरिकता देगा?’’
उन्होंने पीलीभीत में रहने वाले हिंदू शरणार्थियों से नागरिकता के लिए आवेदन करने को कहा था और ‘‘गारंटी’’ दी कि थी ‘‘उन्हें उनकी समस्याओं से स्थायी रूप से मुक्ति मिल जाएगी।’’
मोदी ने कहा था, ‘‘आप गर्व से भारत के नागरिक के रूप में रह सकेंगे।’’
पीलीभीत में लगभग 18 लाख मतदाता हैं। पीलीभीत सीट पर 19 अप्रैल को लोकसभा चुनाव के पहले चरण में मतदान होगा।
उत्तर प्रदेश सरकार के लोक निर्माण मंत्री एवं भाजपा उम्मीदवार जितिन प्रसाद का मुकाबला समाजवादी पार्टी (सपा) सरकार में मंत्री रह चुके भगवत सरन गंगवार और बहुजन समाज पार्टी के नेता अनीस अहमद खान उर्फ फूल बाबू से है।
कुछ स्थानीय कार्यकर्ताओं ने बताया कि ‘‘भाजपा कार्यकर्ता सीएए के तहत नागरिकता के लिए आवेदन करने के लिए गृह मंत्रालय द्वारा शुरू किए गए पोर्टल पर बंगाली शरणार्थियों को पंजीकृत करने में भी मदद कर रहे हैं।’’
गरीबों को मुफ्त शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाएं प्रदान करने वाले एक गैर सरकारी संगठन से जुड़े हिंदू शरणार्थी विपिन कुमार बाउली ने ‘पीटीआई-भाषा’ से कहा, ‘‘यहां के बंगाली 60 और 70 के दशक के अंत में बांग्लादेश, तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान से आए थे। यह प्रवास विशेष रूप से 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के आसपास हुआ था जब हिंदुओं पर, जो वहां अल्पसंख्यक थे, गंभीर अत्याचार किए जा रहे थे।’’
उन्होंने कहा कि वर्तमान में बांग्लादेश से आए प्रवासियों की दूसरी और तीसरी पीढ़ी पूरे पीलीभीत में फैली हुई है।
जिला प्रशासन के अनुसार, ये प्रवासी जिले के न्यूरिया, माला और कालीनगर क्षेत्रों में ‘बंगाली कॉलोनियों’ में केंद्रित हैं। जहां कुछ निवासियों के निकट मतदाता पहचान पत्र है, वहीं बहुत कम के पास अपना निवास साबित करने के लिए पहचान पत्र है।
केंद्रीय गृह मंत्रालय ने 11 मार्च को नागरिकता संशोधन नियमों को अधिसूचित किया था जिससे सीएए का कार्यान्वयन हो सकेगा।
यह अधिनियम 2019 में संसद द्वारा पारित किया गया था।
सीएए के तहत, 31 दिसंबर 2014 तक बांग्लादेश, पाकिस्तान और अफगानिस्तान से भारत आए प्रताड़ित हिंदू, सिख, जैन, बौद्ध, पारसी और इसाइयों को नागरिकता दी जाएगी।
कालीनगर तहसील के महाराजपुर गांव के निवासी कदम दास ने कहा, ‘‘मेरे माता-पिता 70 के दशक की शुरुआत में बांग्लादेश से भागकर यहां आए थे। जब वे यहां आए थे तब मैं मुश्किल से पांच साल का था।’’
चार बच्चों के पिता, दास ने कहा कि उनके माता-पिता का प्रयास भारतीय नागरिकता प्राप्त करना था और सीएए से उन्हें नई उम्मीद मिली है।
दास ने एक प्लास्टिक का ‘फोल्डर’ पकड़ा हुआ था जिसमें तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान में जारी परिवार की आईडी और भारतीय नागरिकता के लिए केंद्रीय गृह मंत्रालय को लिखे गए पत्र जैसे महत्वपूर्ण दस्तावेज थे।
दास ने कहा, ‘‘इसे मेरे माता-पिता ने वर्षों तक संरक्षित करके रखा था। इस क्षेत्र के लगभग हर परिवार के पास ऐसा ‘फोल्डर’ है।’’
स्थानीय निजी स्कूल में गणित के शिक्षक एवं न्यूरिया में बंगाली कॉलोनी के निवासी प्रमोद दास ने कहा, ‘‘मेरे माता-पिता बांग्लादेश से थे लेकिन मेरा जन्म यहीं हुआ। मैं बड़ा हुआ, यहीं पढ़ाई की, मेरे स्थानीय दोस्त हैं और यहां तक कि मैंने यहीं नौकरी भी की।’’
उन्होंने कहा, ‘‘फिर भी, मैं एक स्थानीय नागरिक के बराबर नहीं हूं क्योंकि मेरे पास यह साबित करने के लिए कुछ भी नहीं है कि मैं भारतीय हूं। यह अनुचित लगता है और मैं किसी ऐसे व्यक्ति का समर्थन करने के पक्ष में हूं जो हमारे दर्द को समझता है।’’
राजनीतिक दलों के आंतरिक सर्वेक्षणों के अनुसार, बंगाली मतदाताओं ने पारंपरिक रूप से भाजपा नेता मेनका गांधी और उनके बेटे वरुण गांधी का समर्थन किया है जो इस सीट से कई बार चुने गए हैं।
वर्ष 2011 में एक बंगाली परिवार में वरुण गांधी की शादी ने भी यहां के बंगाली परिवारों में गांधी की मान्यता को बढ़ावा दिया। मेनका और वरुण गांधी की मां-बेटे की जोड़ी हालांकि पहली बार इस निर्वाचन क्षेत्र में लगभग 35 वर्ष बाद मैदान में नहीं होगी।
भाषा चंदन आनन्द