डीजेबी में जवादेही की कमी, 2015-16 से अबतक 28,400 करोड़ रुपये दिए : दिल्ली वित्त सचिव
धीरज रंजन
- 08 Apr 2024, 06:06 PM
- Updated: 06:06 PM
नयी दिल्ली, आठ अप्रैल (भाषा) दिल्ली सरकार के प्रधान वित्त सचिव ने उच्च न्यायालय को सूचित किया कि दिल्ली जल बोर्ड (डीजेबी) को वित्तवर्ष 2015-16 से अबतक 28,400 करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं लेकिन उसने शर्तों के अनुरूप इस धन का इस्तेमाल नहीं किया है।
प्रधान वित्त सचिव ने शीर्ष अदालत को यह जानकारी आम आदमी पार्टी (आप) सरकार की उस याचिका के जवाब में दी है जिसमें आरोप लगाया गया कि वह जल निकाय को धन आवंटित नहीं कर रहे हैं।
वरिष्ठ सरकारी अधिकारी ने यह भी आरोप लगाया कि वैधानिक निकाय में जवाबदेही की कमी है।
शीर्ष अदालत ने पांच अप्रैल को दिल्ली सरकार के प्रधान सचिव (वित्त) को डीजेबी को धन जारी करने के लिए कहा था और आप सरकार द्वारा दाखिल याचिका पर सुनवाई करते हुए राष्ट्रीय राजधानी में पेयजल की आपूर्ति के लिए जिम्मेदार निकाय को पक्षकार बनाया था।
प्रधान न्यायधीश डी वाई चंद्रचूड़, न्यायमूर्ति आशीष चंद्र वर्मा की पीठ के समक्ष दाखिल हलफनामे में वित्त विभाग के प्रधान सचिव ने अरविंद केजरीवाल सरकार द्वारा किए गए दावों के जवाब में दिल्ली के निवासियों द्वारा सामना की जा रही जल आपूर्ति और सीवेज लाइनों के रखरखाव से संबंधित ‘गंभीर समस्याओं’ के विषय पर मुख्य सचिव की 15 मार्च की रिपोर्ट का व्यापक रूप से जिक्र किया गया।
अधिकारी ने अपने हलफनामा में कहा, ‘‘वित्त वर्ष 2015-16 से राजकोष (यानी जीएनसीटीडी) से 28,400 करोड़ रुपये से अधिक राशि दिए जाने के बावजूद कोई जवाबदेही नहीं है, और धन का उपयोग मंजूरी शर्तों के अनुसार नहीं किया गया है, जैसा कि कैग (भारत के नियंत्रक और महालेखापरीक्षक) ने अपनी रिपोर्ट में संकेत दिया है।’’
उन्होंने बताया, ‘‘यह और भी चिंताजनक हो जाता है कि तुलन पत्र तैयार न होने के कारण कैग ऑडिट में देरी हुई है, इस संबंध में डीजेबी के आचरण की भी जांच की जरूरत है।’
याचिका को खारिज करने का अनुरोध करते हुए वित्त सचिव ने इसे विभिन्न आधारों पर पूरी तरह से ‘‘अस्थिर, गलत धारणा वाला और तथ्यों और कानूनी प्रावधानों से इतर’’ बताया। उन्होंने यह भी कहा कि याचिका उचित प्रक्रिया का पालन किए बिना दायर किया गया है।
वित्त सचिव ने मुख्य सचिव की रिपोर्ट का हवाला देते हुए हलफनामे में कहा, ‘‘जल शुल्क (और इस प्रकार सीवर शुल्क, क्योंकि उनकी गणना जल शुल्क के 60 प्रतिशतके रूप में की जाती है) में 01.02.2018 से वृद्धि नहीं की गई है (जो हर साल 10 प्रतिशत की वृद्धि के साथ संशोधित होती थी) और 01.01.2015 से सेवा शुल्क में वृद्धि नहीं की गई है, जिससे डीजेबी की वित्तीय स्थिति प्रभावित हो रही है।’’
इसमें कहा गया है कि अकेले घरेलू उपभोक्ताओं के लिए जल शुल्क की दर में वृद्धि नहीं करने से प्रति वर्ष लगभग 1,200 करोड़ रुपये के संभावित राजस्व का नुकसान हो रहा है।
हलफनामे में कहा गया, ‘‘जुलाई, 2023 में बकाया वाले उपभोक्ताओं की संख्या लगभग 11 लाख थी जो जनवरी, 2024 में बढ़कर 14 लाख से अधिक हो गई। इसका अर्थ है कि उपभोक्ता जानबूझकर एक और योजना की उम्मीद में अपना बकाया जमा नहीं कर रहे हैं जैसा कि पहले घोषित किया गया था।’’
इसमें कहा गया, ‘‘एक ओर डीजेबी पर ऋण और उस पर ब्याज 73,000 करोड़ रुपये के आंकड़े को पार कर गया है और दिल्ली जल बोर्ड ने जीएनसीटीडी को बार-बार सूचित किया है कि वह जीएनसीटीडी को अपना कर्ज चुकाने की स्थिति में नहीं है।साथ ही डीजेबी वित्तीय ईमानदारी लाने के लिए वैधानिक प्रावधानों का पालन नहीं कर रहा है।’’
हलफनामे में कहा गया है कि मुख्य सचिव की रिपोर्ट पर अभी भी दिल्ली के जल मंत्री के कार्यालय से निर्देश का इंतजार है जिन्होंने याचिका दायर की थी।
इसमें कहा गया, ‘‘डीजेबी को विभिन्न स्रोतों से कुल 76,923.82 करोड़ रुपये प्राप्त हुए हैं और इसमें से छोड़कर 75,313.42 करोड़ रुपये खर्च किये गये और दिल्ली जल बोर्ड के बैंक खातों में अब भी 1610.40 करोड़ रुपये शेष है। लेकिन विभिन्न बैंकों से ‘बैलेंस क्लोजिंग’ प्रमाणपत्रों के अभाव में ऑडिट के दौरान डीजेबी द्वारा दिखाई गई शेष राशि की पुष्टि नहीं हो सकी।’’
याचिका में किए गए दावों पर सवाल उठाते हुए हलफनामे में कहा गया कि डीजेबी एक सरकारी नहीं बल्कि दिल्ली जल बोर्ड अधिनियम, 1998 के तहत गठित वैधानिक निकाय है।
इसमें कहा गया है कि इसलिए, मौजूदा मामला विधानसभा द्वारा बजट में आवंटित धनराशि जारी करने के बारे में नहीं है, बल्कि एक ऐसा मामला है जिसमें दिल्ली सरकार प्रशासनिक विभाग की सिफारिश पर डीजेबी को ‘‘पूंजीगत ऋण, सहायता अनुदान, सब्सिडी, एवं अन्य तरीके’से धन प्रदान करती है।
प्रधान सचिव ने कहा कि सरकार द्वारा उनपर लगाए गए आरोप सही नहीं है।
हलफनामे में कहा गया है कि 2015-16 से 2023-24 के बीच डीजेबी को 29,172 करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं, अकेले वित्तवर्ष 2023-24 के लिए 4,572.90 करोड़ रुपये जारी किए गए हैं।
शीर्ष न्यायालय इस मामले पर अब 10 अप्रैल को सुनवाई करेगी।
इससे पहले 20 मार्च को अरविंद केजरीवाल सरकार ने नौकरशाही और दिल्ली की आप सरकार के बीच तनातनी के बीच इस मुद्दे पर शीर्ष अदालत का रुख किया था।
भाषा धीरज