आचार्य विद्यासागर का जीवन धर्म, संस्कृति और राष्ट्र को समर्पित रहाः शाह
संजीव राजकुमार
- 06 Feb 2025, 07:25 PM
- Updated: 07:25 PM
(फाइल फोटो के साथ)
डोंगरगढ़ (छत्तीसगढ़), छह फरवरी (भाषा) केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने बृहस्पतिवार को कहा कि भारत के संतों ने देश की संस्कृति, एकता को बनाए रखने और ज्ञान के प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
शाह ने कहा कि आजादी के बाद जब देश और सरकार पश्चिमी विचारों से प्रभावित होने लगी, तब जैन संत आचार्य विद्यासागर महाराज ही एकमात्र ऐसे संत थे, जिन्होंने भारत, भारतीयता, भारतीय संस्कृति, हमारे धर्म और हमारी भाषाओं को संरक्षण देने का कार्य किया।
उन्होंने कहा कि आचार्य विद्यासागर का जीवन धर्म, संस्कृति और राष्ट्र को समर्पित रहा। उन्होंने कहा कि पूरे देश को एक करने का काम जैन आचार्यों और मुनियों ने किया है।
शाह छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव जिले के डोंगरगढ़ शहर में आचार्य विद्यासागर जी महामुनिराज के ‘प्रथम समाधि स्मृति महोत्सव’ को संबोधित कर रहे थे।
केंद्रीय गृह मंत्री ने भारत की संत परंपरा बहुत समृद्ध होने का दावा करते हुए कहा कि देश को जब जिस भूमिका की ज़रूरत पड़ी, संत परंपरा ने उस भूमिका का निर्वहन किया।
उन्होंने कहा, ‘‘संतों ने ज्ञान का सृजन किया, देश को एकता के सूत्र में बांधा और जब गुलामी का कालखंड था, तब संतों ने भक्ति के माध्यम से राष्ट्र चेतना की लौ जलाए रखी। आज़ादी के बाद जब देश पाश्चात्य विचारों से प्रभावित होकर चलने लगा, तब विद्यासागर जी महाराज एकमात्र आचार्य थे जिन्होंने भारत, भारतीयता और भारतीय संस्कृति से खुद को जोड़े रखा।’’
शाह ने कहा, ‘‘जैन मुनियों ने पूरे देश को एक करने में अपना महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है। उत्तर प्रदेश के हस्तिनापुर से लेकर कर्नाटक के श्रवणबेलगोला तक, बिहार के राजगीर से लेकर गुजरात के गिरनार तक हर जगह पैदल घूम कर अपने कर्मों से अपने त्याग का संदेश दिया। आचार्य जी ने हमें सिखाया कि हमारी पहचान हमारी संस्कृति में निहित है।’’
उन्होंने कहा, ‘‘आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज एक युग पुरुष थे, जिन्होंने एक नए विचार और नए युग का प्रवर्तन किया। कर्नाटक में जन्मे आचार्य गुरुवर श्री विद्यासागर जी महामुनिराज अपने कर्मों से भारत, भारतीय संस्कृति, भारतीय भाषाएं और भारत की पहचान के ज्योतिर्धर बने। शायद ही यह सम्मान किसी ऐसे धार्मिक संत को मिला होगा, जिन्होंने धर्म के साथ-साथ देश की पहचान की व्याख्या विश्व भर में की हो।’’
शाह ने कहा कि आचार्य विद्यासागर जी महाराज मानते थे कि देश की भाषाई विविधता सच्ची शक्ति है तथा जिस देश में अनेक भाषाएं, लिपियां और बोलियां हों और अलग-अलग प्रकार के व्याकरण और गाथाएं हों, वह देश सांस्कृतिक रूप से उतना ही समृद्ध माना जाता है।
केंद्रीय गृह मंत्री ने कहा कि उन्हें कई बार आचार्य श्री विद्यासागर जी का सानिध्य मिला और हर बार आचार्य जी ने भारतीय भाषाओं के संवर्धन, देश के गौरव का विश्वभर में प्रसार और देश की पहचान ‘इंडिया’ की बजाय ‘भारत’ से होने पर जोर दिया।
शाह ने कहा,‘‘जी-20 सम्मेलन के निमंत्रण पत्र पर ‘प्राइम मिनिस्टर ऑफ भारत’ लिख कर, मोदी जी ने विद्यासागर जी के विचारों को जमीन पर उतारने का काम किया। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने आचार्य जी के विचार को जरा भी राजनीति किए बगैर जमीन पर उतारा और उनके संदेश का अनुकरण करने का काम किया।’’
शाह ने कहा कि यह बोलने वाले बहुत लोग मिलते हैं कि धर्म, राष्ट्र और समाज के लिए जीवन का हर क्षण समर्पित होना चाहिए, लेकिन पूरा जीवन इसी तरह जीने वाले लोग कभी-कभार ही दिखते हैं और आचार्य जी का जीवन ऐसा ही रहा।
उन्होंने कहा कि आचार्य जी ने ‘अहिंसा परमो धर्म:’ के सिद्धांत की समय अनुकूल व्याख्या कर पूरे विश्व में इसे स्थापित करने का काम किया तथा जैन धर्म के सिद्धांत के अनुरूप इस बात का ख्याल रखा कि उनके शिष्य भी उन्हीं सिद्धांतों पर जीवन व्यतीत करें।
केंद्रीय मंत्री ने कहा, ‘‘'प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में भारत ‘वसुधैव कुटुंबकम’ और ‘अहिंसा परमो धर्म:’ के सिद्धांतों का प्रचार कर रहा है।’’
शाह ने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी और आचार्य जी के बीच बहुत ही आत्मीय संवाद रहा है।
उन्होंने कहा कि इस अवसर के लिए स्मारक सिक्का और विशेष लिफाफा की स्वीकृति देने के लिए वह मोदी जी के प्रति आभार व्यक्त करते हैं।
उन्होंने कहा कि आचार्य जी का प्रस्तावित समाधि स्मारक ‘विद्यायतन’ युगों-युगों तक आचार्य जी के सिद्धांतों, संदेशों और उपदेशों के प्रचार का स्थान बनकर रहेगा।
शाह ने कहा कि इस अवसर पर मध्यप्रदेश के डिंडोरी जिले में निःशुल्क कन्या विद्यालय का भी शिलान्यास किया गया है। इस विद्यालय में कौशल विकास और रोजगार दोनों सम्मिलित होंगे और अध्यापन कार्य मातृभाषा में होगा।
केन्द्रीय गृह मंत्री ने कहा कि आचार्य विद्यासागर जी महाराज ने ‘मूकमाटी’ नामक हिन्दी महाकाव्य की रचना की, जिस पर अनेक लोगों ने शोध और निबंध लिखे हैं।
उन्होंने कहा कि सभी भारतीय भाषाओं के संरक्षण और संवर्धन के आचार्य जी के संदेश का पालन करते हुए उनके अनुयायियों ने ‘मूकमाटी’ का कई भाषाओं में अनुवाद किया है।
उनके अनुसार ‘मूकमाटी’ में धर्म, दर्शन, नीति और अध्यात्म को बहुत गहराई से समझाया गया है और इसमें शरीर की क्षणभंगुरता का वर्णन एवं राष्ट्र प्रेम का भी संदेश है।
इस दौरान शाह श्री 1008 सिद्धचक्र विधान विश्व शांति महायज्ञ में शामिल हुए। उन्होंने इस अवसर पर आचार्य श्री विद्यासागर जी की स्मृति में 100 रुपए का स्मारक सिक्का, डाक विभाग का पांच रूपए का विशेष लिफाफा, 108 चरण चिन्हों एवं चित्र का लोकार्पण तथा प्रस्तावित समाधि स्मारक ‘विद्यायतन’ का शिलान्यास किया।
कार्यक्रम के बाद गृह मंत्री शाह चंद्रगिरि स्थित प्रतिभास्थली पहुंचे, जहां उन्होंने जैन संतों के सानिध्य में भोजन ग्रहण किया। इसके बाद वह प्रसिद्ध मां बम्लेश्वरी मंदिर पहुंचे और दर्शन कर पूजा-अर्चना की।
इस अवसर पर छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय और उप-मुख्यमंत्री विजय शर्मा एवं अन्य लोग मौजूद थे।
जैन संत आचार्य विद्यासागर ने पिछले वर्ष 18 फरवरी को डोंगरगढ़ के चंद्रगिरी तीर्थ में सल्लेखना के बाद अंतिम सांस ली थी।
सल्लेखना एक जैन धार्मिक प्रथा है, जिसमें आध्यात्मिक शुद्धि के लिए स्वैच्छिक मृत्यु तक उपवास किया जाता है।
भाषा संजीव