गुजरात सरकार ने यूसीसी की आवश्यकता के आकलन और मसौदा विधेयक के लिए समिति बनाई
खारी पवनेश
- 04 Feb 2025, 06:29 PM
- Updated: 06:29 PM
गांधीनगर, चार फरवरी (भाषा) गुजरात की भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) सरकार ने राज्य में समान नागरिक संहिता (यूसीसी) की आवश्यकता का आकलन करने और इसका मसौदा विधेयक तैयार करने के लिए मंगलवार को उच्चतम न्यायालय की सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति रंजना देसाई की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया।
विपक्ष ने कहा कि यह निर्णय आगामी स्थानीय निकाय चुनावों से पहले महत्वपूर्ण मुद्दों से ध्यान भटकाने के इरादे से लिया गया है, जबकि सरकार ने दावा किया कि यदि यूसीसी लागू किया जाता है तो आदिवासी समुदायों के अधिकारों की रक्षा होगी।
मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल ने यहां संवाददाताओं से बातचीत में कहा कि सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति देसाई की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय समिति 45 दिन के भीतर अपनी रिपोर्ट सौंपेगी, जिसके बाद यूसीसी के कार्यान्वयन के बारे में निर्णय लिया जाएगा।
एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि समिति रिपोर्ट तैयार करने के लिए मुस्लिम समुदाय सहित धार्मिक नेताओं से भी मुलाकात करेगी।
मुख्यमंत्री पटेल ने कहा, ‘‘यूसीसी की आवश्यकता का आकलन और इसका मसौदा विधेयक तैयार करने के लिए, हमने उच्चतम न्यायालय की सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति के नेतृत्व में एक समिति बनाने का फैसला किया है।’’
समिति के अन्य सदस्यों में भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) के सेवानिवृत्त अधिकारी सीएल मीणा, अधिवक्ता आर.सी. कोडेकर, वीर नर्मद दक्षिण गुजरात विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति दक्षेश ठाकर और सामाजिक कार्यकर्ता गीता श्रॉफ शामिल हैं।
भाजपा शासित उत्तराखंड ने पहले ही यूसीसी लागू कर दिया है।
मुख्यमंत्री पटेल ने कहा कि गुजरात सरकार देशभर में समान नागरिक संहिता लागू करने के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के संकल्प को पूरा करने के लिए प्रतिबद्ध है।
उन्होंने बताया कि पांच सदस्यीय समिति यूसीसी से संबंधित विभिन्न पहलुओं की समीक्षा करेगी और अपनी रिपोर्ट तैयार करने के लिए विभिन्न क्षेत्रों के लोगों की राय लेगी।
मुख्यमंत्री ने कहा कि रिपोर्ट देखने के बाद ‘‘उचित निर्णय’’ लिया जाएगा।
गृह राज्य मंत्री हर्ष संघवी ने कहा कि यूसीसी लागू हुआ तो यह आदिवासियों के अधिकारों की रक्षा करेगा।
संघवी ने कहा, ‘‘उत्तराखंड सरकार द्वारा लागू किया गया यूसीसी देश के सामने एक आदर्श प्रस्तुत करता है क्योंकि यह आदिवासियों के रीति-रिवाजों और परंपराओं की रक्षा करता है। हमारे (केंद्रीय) गृह मंत्री अमित शाह ने भी झारखंड में स्पष्ट किया है कि यूसीसी आदिवासियों द्वारा अपनाई जाने वाली परंपराओं की रक्षा करेगा।’’
उन्होंने कहा कि समिति रिपोर्ट तैयार करने के लिए मुस्लिम नेताओं सहित धार्मिक नेताओं से भी मुलाकात करेगी।
श्रॉफ और ठाकर ने कहा कि राज्य सरकार का रुख संवेदनशील है और यह दिखाता है कि वह कानूनों में कमियों को दूर करने और सभी के वास्ते न्याय सुनिश्चित करने के लिए प्रतिबद्ध है।
राज्य विधानसभा में विपक्ष के नेता अमित चावड़ा ने कहा कि भाजपा की ज्यादा दिलचस्पी ‘‘अल्पसंख्यक बनाम बहुसंख्यक की राजनीति’’ में है।
उन्होंने दावा किया, ‘‘गुजरात में 14 प्रतिशत आदिवासी हैं। यूसीसी आदिवासी समाज की संस्कृति, रीति-रिवाज, धार्मिक परंपराओं और विवाह संस्कार को प्रभावित करेगा। इसी तरह, गुजरात का जैन समुदाय और देवीपूजक भी इससे प्रभावित होंगे।’’
कांग्रेस नेता ने कहा कि भारतीय संविधान ने भी कुछ समुदायों को अपने रीति-रिवाज और संस्कृति को आगे बढ़ाने की स्वतंत्रता दी है।
उन्होंने दावा किया, ‘‘यूसीसी का क्रियान्वयन केंद्र सरकार के अधिकार क्षेत्र में है, न कि राज्य के। चूंकि पूरे गुजरात में भाजपा में अंदरूनी लड़ाई जारी है और यहां की सरकार हर तरह से नाकाम रही है, इसलिए यह घोषणा शहरी निकाय चुनावों से पहले लोगों का ध्यान भटकाने की कोशिश है।’’
आम आदमी पार्टी की गुजरात इकाई के प्रमुख इसुदान गढ़वी ने कहा कि जब भी चुनाव होता है, भाजपा यूसीसी का मुद्दा उठाती है।
उन्होंने दावा किया, ‘‘आज भी, मालधारी समुदाय में घरेलू विवाद के 80 प्रतिशत मामले उसके नेताओं द्वारा सुलझाए जाते हैं। आदिवासी समाज में बहुविवाह प्रथा है और अगर यूसीसी लागू होता है तो ये सब खत्म हो जाएगा। इसलिए, हमारा मानना है कि यूसीसी ईसाइयों, सिखों, मुसलमानों के लिए अड़चन बनने जा रहा है।’’
उन्होंने कहा कि अगर गुजरात में यूसीसी लागू होता है, तो भाजपा एक भी आदिवासी सीट नहीं जीत पाएगी।
गढ़वी ने कहा, ‘‘मैं भाजपा को यह भी बताना चाहूंगा कि हर चीज को हिंदू-मुस्लिम या वोट बैंक की राजनीति के नजरिए से देखना सही नहीं है।’’
उन्होंने दावा किया कि शहरी निकाय चुनाव नजदीक आने के कारण यह मुद्दा उठाया गया है, विधानसभा चुनाव से पहले फिर से इसे उठाया जा सकता है।
ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) नेता दानिश सिद्दीकी ने कहा कि यूसीसी का इस्तेमाल मुस्लिम समुदाय को निशाना बनाने के लिए किया जा रहा है और यह भी कहा कि उन्हें सरकार द्वारा गठित समिति से बहुत ज्यादा उम्मीद नहीं है जो बिना किसी पूर्वाग्रह के अलग-अलग विचारों पर गौर करेगी।
उन्होंने कहा कि अगर आदिवासियों को प्रस्तावित कानून से बाहर रखा जाता है, तो यह यूसीसी नहीं कहलाएगा।
उन्होंने इस बात पर बल दिया, ‘‘हम पैनल के समक्ष अपना पक्ष रखेंगे। भाजपा बहुविवाह को लेकर मुसलमानों पर तो निशाना साधती है तो उसे यह पता होना चाहिए कि अन्य समुदायों में भी यह प्रथा प्रचलित है। जब एक समुदाय को (बहुविवाह की) अनुमति दी जाती है और अन्य को नहीं, तो यह यूसीसी नहीं कहलाएगा।’’
समिति की सदस्य गीता श्रॉफ ने कहा कि उनका ‘‘दृढ़तापूर्वक’’ मानना है कि एक समान कानून से कई लाभ होंगे। उन्होंने कहा, ‘‘पिछले 30 वर्षों में मैंने देखा कि किस तरह न्याय की लड़ाई के लिए महिलाओं और बच्चों को कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। यूसीसी इन कठिनाइयों को दूर करेगा।’’
ठाकर ने कहा कि पर्सनल लॉ के कारण महिलाओं पर विशेष रूप से प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है, और उच्चतम न्यायालय ने शाह बानो मामले में निर्देश दिया था कि ऐसे मामलों में विरोधाभासों को दूर किया जाना चाहिए और एक समान कानून बनाया जाना चाहिए।
उन्होंने कहा, ‘‘यहां तक कि संविधान सभा ने भी मार्गदर्शक सिद्धांत तैयार किए हैं जिनमें इसके लिए प्रावधान हैं। हम जानते हैं कि उत्तराखंड ने समान नागरिक संहिता लागू की है।’’
भाषा खारी