दिल्ली चुनाव: दंगों से प्रभावित क्षेत्र के लोग जीवन को पटरी पर लाने का अब भी कर रहे प्रयास
नोमान दिलीप
- 03 Feb 2025, 05:28 PM
- Updated: 05:28 PM
(नेहा मिश्रा और मोहित सैनी)
नयी दिल्ली, तीन फरवरी (भाषा) उत्तर पूर्वी दिल्ली में हुए दंगों के पांच साल बाद भी इससे प्रभावित क्षेत्र में रहने वाले लोग अपने जीवन को पटरी पर लाने की कोशिश कर रहे हैं। हिंसा के वक्त जलाई गई दुकानों और घरों को भले ही फिर से बना दिया गया है, मगर क्षेत्र में रहने वाले हिंदू और मुस्लिम समुदाय के बीच आपसी विश्वास का संकट अब भी बरकरार है।
साल 2020 के फरवरी महीने में विधानसभा चुनाव के नतीजे आने के कुछ दिनों बाद भड़के दंगों में 53 लोगों की मौत हुई थी और 700 से ज्यादा लोग जख्मी हुए थे। दिल्ली में पांच फरवरी को एक बार फिर विधानसभा चुनाव होने हैं।
नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) के समर्थकों और विरोधियों के बीच हुई झड़प के बाद भड़की सांप्रदायिक हिंसा से मुस्तफाबाद विधानसभा क्षेत्र के अंतर्गत आने वाला शिव विहार का इलाका बुरी तरह से प्रभावित हुआ था।
इस इलाके में 30 साल पहले रहने आए 68 वर्षीय दुकानदार हरपाल सिंह कहते हैं, “ अब इलाका शांत है, लेकिन भरोसा खत्म हो गया है। लोग बिना किसी विवाद के अपने-अपने इलाकों में रहते हैं, लेकिन अब वे एक-दूसरे पर भरोसा नहीं करते।”
उन्होंने कहा, “ जब मैं यहां आया था, तब यह इलाका हिंदू बहुल था। धीरे-धीरे मुस्लिम परिवार भी यहां आकर बसने लगे। अब लगभग 90 प्रतिशत हिंदू अपनी संपत्ति बेचकर यहां से जा चुके हैं।”
सिंह ने कहा कि लोग अब भी अपनी संपत्ति बेचकर जा रहे हैं, क्योंकि उन्हें डर है कि हिंसा फिर से न हो जाए। कुछ मुस्लिम परिवार भी इलाका छोड़कर चले गए हैं।
मोहम्मद जावेद अली ने भी ऐसी ही बातें कहीं।
इलाके में वाहनों की मरम्मत की दुकान चलाने वाले 36 वर्षीय अली ने कहा, “दंगों से पहले लोग मिलजुलकर रहते थे। अब वे एक-दूसरे से बात तो करते हैं, लेकिन भरोसा खत्म हो गया है। लोग एक-दूसरे के साथ रहते हैं, लेकिन अब कोई किसी पर भरोसा नहीं करता।”
शिव विहार में संकरी गलियां, टूटी सड़कें और हर जगह कूड़े के ढेर हैं और यह राष्ट्रीय राजधानी की समृद्ध कॉलोनियों से काफी दूर है।
लोग निराश हैं और वे इन बुनियादी सुविधाओं के अभाव के साथ अपनी रोजमर्रा की जिंदगी गुजारते हैं, लेकिन उन्हें उम्मीद है कि बदलाव होगा, जो शायद पांच फरवरी को होने वाले विधानसभा चुनाव के बाद हो।
सिंह के अनुसार, 2020 के दंगों के बाद राहत प्रयास अपर्याप्त थे।
उन्हें दंगों के दौरान आठ दिनों तक पास के शिव मंदिर में शरण लेनी पड़ी थी। उन्होंने आरोप लगाया, "अधिकांश राहत मुस्लिम परिवारों को दी गई।"
सिंह के अनुसार, हिंदू शिव विहार फेज-10 में चले गए और मुसलमान बगल के फेज-6 में चले गए, जो कभी मुख्य रूप से हिंदू बहुल था और अब वहां केवल तीन हिंदू परिवार रहते हैं।
उन्होंने कहा, “ जलकर खाक हो चुकी दुकानों और इमारतों का पुनर्निर्माण हो चुका है और अब वे निशान अतीत का हिस्सा बन चुके हैं। हालांकि, बुनियादी ढांचे का विकास अब भी नहीं हो पाया है। चुनाव के कारण लोग इस इलाके में आ रहे हैं, लेकिन वास्तविक विकास की जरूरत है।”
इलाके के कई लोगों के लिए दंगों के जख्म अब भी ताजा हैं। राजनीतिक नेताओं द्वारा विकास और न्याय दिलाने के वादे उनके जख्मों को कम करने में कोई मदद नहीं कर पाए हैं। शिव विहार के कई मतदाता चुनाव को बदलाव के अवसर के रूप में देखते हैं।
उनतीस वर्षीय गृहिणी सुनीता शर्मा ने कहा, "हम हमेशा अतीत में नहीं रह सकते। हमारे बच्चे बेहतर भविष्य के हकदार हैं। मुझे उम्मीद है कि इस बार जो भी जीतेगा, वह विकास और शांति पर ध्यान केंद्रित करेगा।"
अली ने ‘आप’ सरकार से निराशा जताते हुए कहा, "पिछले तीन वर्षों में ‘आप’ ने यहां कुछ काम किया है, लेकिन दंगों के दौरान उनके विधायक हाजी यूनुस गायब थे। वह स्थिति सुधरने के बाद ही आए।”
इस बार ‘आप’ ने मौजूदा विधायक हाजी यूनुस को टिकट नहीं दिया है और उनकी जगह आदिल अहमद खान को अपना उम्मीदवार बनाया है।
दंगों से हुए नुकसान की भरपाई पर चर्चा करते हुए कुछ मुसलमानों ने इस बात पर सहमति जताई कि सहायता दी गई थी।
सलमान अहमद (28) ने ‘पीटीआई-भाषा’ को बताया, "जिस परिवार के पास पहले कच्चा मकान था, अब उसके पास पक्का मकान है, जिसके पास एक मंजिला मकान था, अब उसके पास दो मंजिला मकान है और जिसके पास दो मंजिला मकान था, अब उसके पास तीन मंजिला मकान है।"
मुस्तफाबाद विधानसभा सीट से भारतीय जनता पार्टी ने पड़ोस की करावल नगर सीट के मौजूदा विधायक मोहन सिंह बिष्ट को टिकट दिया है, जबकि कांग्रेस ने पूर्व विधायक हसन अहमद के बेटे अली मेहदी को उतारा है।
हैदराबाद से सांसद असुदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम ने दंगों के आरोप में जेल में बंद ‘आप’ के पूर्व पार्षद ताहिर हुसैन को अपना उम्मीदवार बनाया है। उच्चतम न्यायालय ने हाल में हुसैन को पैरोल देते हुए पुलिस अभिरक्षा में 29 जनवरी से तीन फरवरी तक चुनाव प्रचार करने की अनुमति दी थी।
दिल्ली विधानसभा चुनाव के लिये मतगणना आठ फरवरी को होगी।
भाषा नोमान