उत्तराखंड में कानूनी विशेषज्ञ यूसीसी के जमीनी स्तर पर सफल होने को लेकर संशय में
दीप्ति नोमान
- 30 Jan 2025, 08:43 PM
- Updated: 08:43 PM
देहरादून, 30 जनवरी (भाषा) उत्तराखंड की भाजपा सरकार ने भले ही आजाद भारत में पहली समान नागरिक संहिता लागू कर दी हो, लेकिन कानूनी विशेषज्ञ इस बात को लेकर संशय में हैं कि क्या यह पर्वतीय राज्य के रूढ़िवादी समाज में जमीन पर सफल होगी जहां अब भी सदियों पुराने पारंपरिक मूल्यों का पालन किया जाता है।
विशेषज्ञ इस बात पर सहमत हैं कि विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और ‘लिव-इन’ संबंधों को नियंत्रित करने वाले कानूनों में एकरूपता लाने का यूसीसी का मूल उद्देश्य बहुत अच्छा और संविधान की भावना के अनुरूप है लेकिन उन्हें उत्तराखंड जैसे पारंपरिक समाज में इसकी स्वीकार्यता को लेकर संदेह है।
कानूनी विशेषज्ञों की प्रमुख चिंता यूसीसी में ‘लिव-इन’ (सहवासी) संबंधों को संस्थागत रूप देने से हैं जहां इस प्रकार के संबंधों में रह रहे लोगों को विधिक रूप से विवाहित लोगों की तरह आधिकारिक रूप से उनका पंजीकरण कराना जरूरी है।
उत्तराखंड उच्च न्यायालय में वरिष्ठ अधिवक्ता दुष्यंत मैनाली ने 'पीटीआई भाषा' को बताया, “यूसीसी विवाह और ‘लिव-इन’ को एक-दूसरे के समान मानता है, जिसे संभवत: उत्तराखंड जैसे राज्य में सामाजिक स्वीकृति नहीं मिले जहां विवाह जैसी पारंपरिक संस्थाओं की जड़ें अब भी गहरी हैं।”
उन्होंने कहा कि इस बात में संदेह है कि उत्तराखंड जैसे राज्य में लोग अपने ‘लिव-इन’ संबंधों को पंजीकृत कराएंगे जहां अभी उनके बारे में खुलकर बात भी नहीं की जाती है।
मैनाली ने कहा, “दूसरी तरफ, अगर ‘लिव-इन’ संबंधों को अनिवार्य पंजीकरण के जरिए वैध बना दिया जाता है और लोग इस स्थिति का आनंद लेने लगते हैं, तो अधिक से अधिक लोग इसे पसंद करना शुरू कर सकते हैं क्योंकि यह कम जटिल है और इसमें रस्में और रिवाज भी शामिल नहीं हैं। इससे आगे चलकर विवाह की सदियों पुरानी संस्था के लिए भी ख़तरा हो सकता है।”
उनका मानना है कि दो वयस्कों के बीच ‘लिव-इन’ संबंध का अनिवार्य पंजीकरण अनावश्यक होने के अलावा उनकी गोपनीयता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का भी उल्लंघन करता है।
उन्होंने कहा, “अब लोग ‘लिव-इन” जोड़े से संबंधों को प्रमाणित करने के लिए प्रमाणपत्र मांगेंगे । अगर उनके पास दस्तावेज नहीं है तो अधिकारियों द्वारा उन्हें प्रताड़ित किया जा सकता है । इससे नैतिक पुलिसिंग जैसी चीजें बढ़ जाएंगी और चीजें और जटिल हो जाएंगी।”
अधिवक्ता ने कहा कि विवाह और तलाक जैसे विषय समवर्ती सूची में हैं जहां केंद्र और राज्य दोनों को कानून बनाने का अधिकार है, लेकिन यूसीसी के कई प्रावधान ऐसे हैं जिनका पहले से मौजूद केंद्रीय कानूनों से टकराव हो सकता है।
उन्होंने कहा कि ऐसे मामलों में संविधान के अनुच्छेद 254 के तहत केंद्रीय कानून ही माने जाएंगे जिससे उत्तराखंड का यूसीसी निष्प्रभावी हो जाएगा।
उत्तराखंड उच्च न्यायालय के एक अन्य वरिष्ठ अधिवक्ता कार्तिकेय हरि गुप्ता ने भी यूसीसी को लेकर मिलते-जुलते संदेह व्यक्त किए ।
उन्होंने कहा, “अगर यूसीसी कानून में कोई ऐसा खंड है जो किसी मौजूदा केंद्रीय कानून के अनुरूप नहीं है, तो वह खंड लागू नहीं किया जाएगा। केंद्रीय कानून के प्रतिकूल होने के कारण यह अमान्य होगा।"
गुप्ता ने कहा कि उत्तराखंड का यूसीसी अधिनियम राज्य का कानून है जो राज्य से बाहर रहने वाले उत्तराखंडवासियों पर भी लागू होगा। इस बात का निश्चित रूप से अदालत में परीक्षण किया जाएगा कि क्या ऐसा कानून स्वीकार्य है या नहीं।”
उन्होंने ‘लिव-इन’ के अनिवार्य पंजीकरण को 'बैडरूम में झांकने' जैसा बताया ।
यूसीसी की वकालत करने वालों द्वारा दिए जा रहे इस तर्क कि इससे दिल्ली में श्रद्धा वाल्कर के साथ हुई हैवानियत जैसे मामलों पर लगाम लगेगी, गुप्ता ने कहा, “विवाह के पंजीकरण को अनिवार्य किए जाने को एक दशक बीत चुका है । क्या इससे खराब वैवाहिक संबधों या महिलाओं के खिलाफ अत्याचारों पर रोक लग गयी है । कानून बनाने जैसी रणनीतियां अपराध को रोकने के लिए कभी पर्याप्त नहीं होतीं। उनका प्रभावी और निरंतर क्रियान्वयन मायने रखता है ।"
हालांकि, मैनाली ने सभी धर्मों में विवाह और तलाक के समान अधिकार देने, पुरुषों और महिलाओं की विवाह योग्य आयु तय करने तथा विवाह के अतिरिक्त अमान्य घोषित विवाह या ‘लिव-इन’ संबंधों से पैदा हुए सभी बच्चों को भी वैध बनाए जाने के यूसीसी के प्रावधानों की प्रशंसा की ।
उन्होंने कहा, “मानवीय कोण से देखा जाए तो ये प्रावधान प्रशंसनीय हैं।”
भाषा दीप्ति