संयुक्त समिति द्वारा अध्ययन के बावजूद वक्फ विधेयक का 'कठोर' चरित्र बना रहेगा: विपक्षी सदस्य
वैभव माधव
- 27 Jan 2025, 09:42 PM
- Updated: 09:42 PM
नयी दिल्ली, 27 जनवरी (भाषा) वक्फ विधेयक पर विचार कर रही संसद की संयुक्त समिति के विपक्षी सदस्यों ने सोमवार को दावा किया कि समिति के अध्ययन के बावजूद विधेयक का ‘कठोर’ चरित्र और मुसलमानों के धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप करने का प्रयास बना रहेगा।
सोमवार को समिति की बैठक में विधेयक में अपने प्रस्तावित संशोधनों को खारिज किए जाने के बाद विपक्षी सदस्यों ने समिति के अध्यक्ष जगदंबिका पाल पर समिति के कामकाज में ‘अलोकतांत्रिक’ होने का भी आरोप लगाया।
उन्होंने आरोप लगाया कि पाल ने केंद्र सरकार को संसद में उसके बहुमत का उपयोग करके इस धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र को भगवा रंग से रंगने में मदद की है।
द्रमुक सांसद ए राजा ने आरोप लगाया कि समिति की कार्यवाही को ‘मजाक’ बनाकर रख दिया गया है और ‘‘इस समय तक रिपोर्ट तैयार हो चुकी है।’’
उन्होंने कहा, ‘संसद की मंजूरी मिलने के बाद द्रमुक और मैं खुद नए कानून को रद्द करने के लिए उच्चतम न्यायालय जाएंगे।’’
हालांकि, पाल ने आरोपों का खंडन किया और कहा कि समिति ने सभी संशोधनों पर लोकतांत्रिक तरीके से विचार किया।
समिति के विपक्षी सदस्यों ने एक संयुक्त बयान में कहा, ‘‘विपक्षी सांसदों ने सोमवार को वक्फ (संशोधन) विधेयक के सभी 44 खंडों में संशोधन का प्रस्ताव रखा, जिसमें मौजूदा अधिनियम के अधिकांश प्रावधानों को बहाल करने की मांग की गई है।’’
उन्होंने दावा किया कि समिति द्वारा अपनी रिपोर्ट में प्रस्तावित कानून विधेयक के ‘कठोर’ चरित्र को बनाए रखेगा और मुसलमानों के धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप करने का प्रयास करेगा।
लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने 9 अगस्त को समिति का गठन किया था।
विपक्षी सदस्यों ने बयान में कहा, ‘‘चूंकि समिति विचार-विमर्श के अंतिम चरण में पहुंच गई है, इसलिए हम, विपक्ष के सदस्यों ने अपना विरोध दर्ज कराया - अध्यक्ष द्वारा कार्यवाही के संचालन की प्रकृति और नियमों तथा प्रक्रियाओं से घोर और गंभीर विचलन दोनों के मामले में। हम पहले ही लोकसभा अध्यक्ष और जनता के सामने ऐसी अपमानजनक घटनाओं को सामने ला चुके हैं।’’
संयुक्त वक्तव्य पर हस्ताक्षर करने वाले समिति के विपक्षी सदस्यों में ए राजा, कल्याण बनर्जी, गौरव गोगोई, असदुद्दीन ओवैसी, नसीर हुसैन, मोहिबुल्लाह, इमरान मसूद, एम एम अब्दुल्ला, मोहम्मद जावेद, अरविंद सावंत और मोहम्मद नदीमुल हक शामिल हैं।
इसमें कहा गया कि समिति के अध्यक्ष (पाल) ने संशोधनों को अस्वीकार करने की घोषणा की, जिससे ‘‘अल्पसंख्यकों को दिए गए संवैधानिक आश्वासनों की रक्षा करने के हमारे ईमानदार प्रयास विफल हो रहे हैं।’’
उन्होंने आरोप लगाया कि सोमवार की बैठक में सभी हितधारकों के लिए अध्यक्ष का अजीब कामकाज उन्हें संसद में बहुमत का उपयोग करके धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र को भगवा रंग देने में केंद्र सरकार की मदद करने के लिए एक चित्रकार के रूप में पेश करता है।
उन्होंने यह भी कहा, ‘‘हम, विपक्ष के सदस्य, संवैधानिक मूल्यों के लिए खड़े भारत के लोगों से अपील करते हैं कि वे हमारे पूर्वजों गांधी, नेहरू, आंबेडकर, वल्लभभाई पटेल और अन्य लोगों द्वारा धर्मनिरपेक्ष पहचान के साथ राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया में लगाए गए श्रम और दृढ़ विश्वास को संरक्षित करने और इस उपमहाद्वीप के सामाजिक सद्भाव को सुनिश्चित करने वाले अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा करने के लिए आगे आएं।’’
संयुक्त बयान के अनुसार, कार्यवाही के दौरान, 95 प्रतिशत हितधारकों ने विधेयक के खिलाफ गवाही दी और शेष 5 प्रतिशत सांप्रदायिक इकाई के तहत समिति के समक्ष उपस्थित हुए।
उन्होंने यह भी दावा किया कि दिल्ली और अन्य स्थानों पर आयोजित बैठकों का बिंदुवार ब्योरा सदस्यों को नहीं दिया गया और सदस्यों को संशोधनों पर अपने विचार रखने से रोक दिया गया।
विपक्षी सांसदों ने दावा किया कि अध्यक्ष ने खंड दर खंड चर्चा की अनुमति नहीं दी, जो कि प्रक्रिया का अनिवार्य तत्व है। उन्होंने यह भी कहा कि संयुक्त समिति द्वारा संबंधित राज्यों के हितधारकों के विचार सुनने के लिए पटना, कोलकाता और लखनऊ का दौरा करने के बाद, उनका पक्ष सुनने के बाद, अध्यक्ष ने उन हितधारकों को 15 दिन के भीतर अपने विचार प्रस्तुत करने का निर्देश दिया।
बयान के अनुसार, ‘‘ये दस्तावेज अभी तक सदस्यों के अवलोकन के लिए समिति के पास नहीं पहुंचे हैं। इस बीच, खंड दर खंड विचार के एजेंडे के साथ समिति की एक और बैठक 24 और 25 जनवरी को बुलाई गई थी। अचानक, 23 जनवरी की मध्यरात्रि को एजेंडा बदल दिया गया जिसका कारण अध्यक्ष को ही पता होगा। जम्मू और कश्मीर के हितधारकों ने अपने विचार व्यक्त किए और 25वीं बैठक बिना कोई कारण बताए रद्द कर दी गई।’’
विपक्षी सदस्यों ने कहा, ‘‘यह मुद्दा हमने 24 जनवरी को हुई बैठक में उठाया था, जिसके लिए हमें अलोकतांत्रिक तरीके से निलंबित कर दिया गया।’’
उन्होंने कहा, ‘‘हमारे पिछले अनुभवों से हम अच्छी तरह से जानते हैं कि अगली बैठक अध्यक्ष द्वारा अल्प सूचना पर बुलाई जा सकती है।’’
भाषा वैभव