आरजी कर मामले के दोषी को उचित सजा दी गई : कानून विशेषज्ञ
पारुल माधव
- 25 Jan 2025, 09:53 PM
- Updated: 09:53 PM
(अमिताभ रॉय)
कोलकाता, 25 जनवरी (भाषा) आरजी कर अस्पताल में एक प्रशिक्षु महिला चिकित्सक के साथ दुष्कर्म और हत्या के दोषी संजय रॉय को आजीवन कारावास की सजा देने के कोलकाता की एक अदालत के फैसले पर जारी बहस के बीच कानून विशेषज्ञ किसी भी अपराधी को मृत्युदंड न दिए जाने के अपने रुख पर कायम हैं।
उच्चतम न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश अशोक गांगुली ने ‘पीटीआई-भाषा’ से कहा कि मौत की सजा अलोकतांत्रिक और अपरिवर्तनीय है, लिहाजा एक स्वतंत्र, लोकतांत्रिक देश में ऐसी सजा नहीं दी जानी चाहिए।
संजय रॉय के लिए मौत की सजा की मांग को अनुचित करार देते हुए न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) गांगुली ने कहा कि दुनिया के 150 से अधिक देशों में मृत्युदंड देने का प्रावधान ही नहीं है। उन्होंने कहा कि यूरोप में ऐसा कोई देश नहीं है, जहां मौत की सजा देने की अनुमति हो और अमेरिका में भी ऐसे कई राज्य हैं, जहां मौत की सजा नहीं दी जाती है।
न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) गांगुली ने कहा, “हम हमेशा मृत्युदंड की मांग करते हैं, क्योंकि हमें लगता है कि यह आसान समाधान है, लेकिन तथ्य बताते हैं कि ऐसा नहीं है। निर्भया मामले में चार लोगों को मौत की सजा दी गई थी। इसके बावजूद बलात्कार और हत्या की घटनाओं में कमी नहीं आई है, अलबत्ता इनमें वृद्धि दर्ज की गई है।”
उन्होंने कहा, “मृत्युदंड एक निवारक उपाय के रूप में विफल साबित हुआ है। आरजी कर मामले में सत्र न्यायालय के न्यायाधीश ने मृत्युदंड न देकर सही किया, क्योंकि जांच अभी तक पूरी नहीं हुई है।”
सियालदह के अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश अनिर्बान दास ने आरजी कर मामले में 20 जनवरी को सुनाए गए फैसले में कहा था कि यह अपराध “दुर्लभ से भी दुर्लभतम” श्रेणी में नहीं आता। उन्होंने कहा था, “आधुनिक न्याय के दायरे में हमें ‘आंख के बदले आंख’, ‘दांत के बदले दांत’, ‘नाखून के बदले नाखून’ या ‘जीवन के बदले जीवन’ की सोच से ऊपर उठना चाहिए।”
न्यायाधीश ने कहा था कि एक सभ्य समाज की पहचान उसकी बदला लेने की क्षमता में नहीं, बल्कि सुधार, पुनर्वास और अंततः बदलने की क्षमता में निहित है।
वरिष्ठ वकील और सांसद विकास रंजन भट्टाचार्य ने कहा कि मौत की सजा का प्रावधान तुरंत खत्म किया जाना चाहिए। उन्होंने ‘पीटीआई-भाषा’ से कहा, “21वीं सदी के लोकतांत्रिक देश में मौत की सजा बर्बर और असभ्य है।”
भट्टाचार्य ने कहा कि अगर मृत्युदंड का प्रावधान हो, तो भी इसे दुर्लभतम मामलों में उच्चतम न्यायालय द्वारा दिया जाना चाहिए और न्यायाधीश को इस बात को लेकर न्यायिक रूप से आश्वस्त होना चाहिए कि उसके सामने पेश किए गए सबूतों के परिप्रेक्ष्य में अपराध दुर्लभतम श्रेणी में आता है।
उन्होंने कहा, “आरजी कर मामले में न्यायाधीश ने ऐसा नहीं पाया, लिहाजा दोषी को जो सजा दी गई है, वह सबसे उचित कठोरतम सजा है।”
पश्चिम बंगाल के पूर्व महाधिवक्ता जयंत मित्रा ने कहा कि वह पूरी तरह से मृत्युदंड के खिलाफ हैं और ‘आंख के बदले आंख’ या ‘दांत के बदले दांत’ की सोच में विश्वास नहीं रखते।
मित्रा ने ‘पीटीआई-भाषा’ से कहा, “मुझे खुशी है कि आरजी कर मामले में मौत की सजा नहीं दी गई, क्योंकि भविष्य में बहुत-सी बातें सामने आएंगी। उस व्यक्ति को जीना होगा, ताकि पूरी कहानी सामने आ सके।”
मित्रा ने कहा कि यह बात हजम नहीं होती कि एक अकेला व्यक्ति इतने जघन्य अपराध को अंजाम दे सकता है, जिसमें प्रशिक्षु महिला चिकित्सक के साथ हैवानियत के बाद उसकी हत्या कर दी गई। उन्होंने आशंका जताई कि घटना में और भी लोग शामिल हो सकते हैं।
न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) गांगुली ने कहा कि आरजी कर मामले में केंद्रीय अन्वेशण ब्यूरो (सीबीआई) की ओर से पूरक आरोपपत्र दाखिल किया जाना अभी बाकी है।
उन्होंने कहा कि सीबीआई ने उच्चतम न्यायालय के समक्ष पूरक आरोपपत्र दाखिल करने की बात कही है, ऐसे में जब तक जांच पूरी नहीं हो जाती, मौत की सजा नहीं दी जा सकती।
भाषा पारुल