भोजशाला विवाद में हिंदू पक्ष ने कहा: स्मारक का मूल धार्मिक स्वरूप बहाल करे एएसआई
राजकुमार
- 08 May 2026, 10:14 PM
- Updated: 10:14 PM
इंदौर, आठ मई (भाषा) मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय में भोजशाला मंदिर-कमाल मौला मस्जिद मामले की सुनवाई के दौरान हिंदू पक्ष ने मुस्लिम पक्ष के तर्कों का खंडन करते हुए शुक्रवार को कहा कि उसकी दायर जनहित याचिका कोई दीवानी मुकदमा नहीं है।
हिंदू पक्ष ने अदालत से गुहार लगायी कि वह भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) को 11वीं सदी के इस संरक्षित स्मारक का 'मूल धार्मिक स्वरूप' बहाल करने का निर्देश दे क्योंकि एएसआई की मौजूदा व्यवस्था से उसके बुनियादी अधिकारों का हनन हो रहा है।
धार की भोजशाला को हिंदू समुदाय वाग्देवी (देवी सरस्वती) का मंदिर मानता है, जबकि मुस्लिम पक्ष इस स्मारक को कमाल मौला मस्जिद बताता है। यह विवादित परिसर एएसआई द्वारा संरक्षित है।
याचिकाकर्ताओं में शामिल संगठन 'हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस' के वकील विष्णु शंकर जैन ने विवादित स्मारक को लेकर एएसआई के सात अप्रैल 2003 के एक आदेश को न्यायमूर्ति विजय कुमार शुक्ला और न्यायमूर्ति आलोक अवस्थी की खंडपीठ के समक्ष चुनौती दी और स्मारक में केवल हिंदुओं को उपासना का अधिकार दिए जाने की गुहार लगायी ।
एएसआई के इस आदेश के तहत विवादित परिसर में हर मंगलवार को हिंदुओं और हर शुक्रवार को मुस्लिमों को उपासना की अनुमति दी गई है।
जैन ने कहा कि एएसआई का यह आदेश प्राचीन स्मारक तथा पुरातत्वीय स्थल और अवशेष अधिनियम 1958 के प्रावधानों का खुला उल्लंघन करता है।
उन्होंने कहा कि इस कानून के एक प्रावधान में स्पष्ट तौर पर कहा गया है कि अगर केंद्र सरकार द्वारा संरक्षित कोई स्मारक पूजास्थल या तीर्थस्थल है, तो उसका उपयोग उसके स्वरूप के विपरीत किसी भी उद्देश्य के लिए नहीं किया जाएगा।
जैन ने कहा,''एएसआई के 2003 के आदेश के आधार पर जारी व्यवस्था से हमारे उपासना के अधिकारों के साथ ही बुनियादी अधिकारों का भी उल्लंघन हो रहा है।''
उन्होंने कहा कि एएसआई पर विवादित स्मारक के 'मूल धार्मिक स्वरूप' के अनुरूप कार्य करने का वैधानिक दायित्व है।
जैन ने मुस्लिम पक्ष की इस आपत्ति को खारिज किया कि भोजशाला विवाद को लेकर 'हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस' की जनहित याचिका वस्तुतः एक दीवानी मुकदमा है और इसे उच्च न्यायालय की रिट कार्यवाही के बजाय किसी दीवानी अदालत में चलाया जाना चाहिए।
उन्होंने कहा,''यह कोई दीवानी मुकदमा नहीं है और इसमें तथ्यों से संबंधित कोई विवादित प्रश्न नहीं हैं।''
मुस्लिम पक्ष का कहना है कि धार का विवादित स्मारक देश की आजादी की तारीख यानी 15 अगस्त 1947 को मस्जिद के रूप में वजूद में था, लिहाजा उपासना स्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम 1991 के प्रावधानों के तहत इसका धार्मिक स्वरूप बदला नहीं जा सकता।
जैन ने इस दलील को खारिज करते हुए कहा कि भोजशाला पर यह कानून लागू नहीं होता क्योंकि वह एएसआई द्वारा संरक्षित स्मारक है।
हिंदू पक्ष के एक अन्य याचिकाकर्ता कुलदीप तिवारी के वकील मनीष गुप्ता ने मुस्लिम पक्ष के दावों पर सवाल उठाए और कहा कि विवादित स्मारक में कोई मीनार या वजूखाना (नमाज से पहले हाथ-मुंह धोने का स्थान) नहीं है, ऐसे में इसे मस्जिद कैसे कहा जा सकता है?
उन्होंने भोजशाला के जैन मंदिर होने के दावे को भी खारिज किया और कहा कि यह स्मारक परमार राजवंश के राजा भोज द्वारा 1034 में स्थापित सरस्वती मंदिर है।
मामले में अगली सुनवाई 11 मई को होगी।
उच्च न्यायालय भोजशाला मंदिर-कमाल मौला मस्जिद परिसर के धार्मिक स्वरूप को लेकर दायर पांच याचिकाओं और एक रिट अपील पर छह अप्रैल से नियमित सुनवाई कर रहा है।
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